# Ajay Singh @ Golu v. State of U.P. & Anr

- **Citation:** (2024) 3 ILRA 929
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2024-03-15
- **Case number:** Application U/S 482. No. 2173 of 2024
- **Bench:** Subhash Vidyarthi
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/ajay-singh-golu-v-state-of-u-p-anr-51713
- **Pages:** 6

## Headnote

G.A.

आपराकिि कवकि : र्ारतीय दंि संकहता, 1860 - िारा 147,
406, 420, 504, 506 - दंि प्रकक्रया संकहता, 1973 -
िारा 62, 64, 65, 87 - र्ैर िमािती वारंट िे कवरुद्ध - प्राथी
द्वारा आदेश कदिांि 16.01.2024 िी वैिता िो चुिौती दी र्ई,
किसिे अंतर्गत कवचारण न्यायालय िे समि िारी किए िािे िे उपरांत र्ी
प्राथी िी अिुपकस्ट्थकत िे आिार पर उसिे कवरुद्ध र्ैर-िमािती वारंट िारी
किया - न्यायालय िे ररिॉिग पर ऐसा िोई िारण िहीं दशागया कि प्राथी
पर समि िी सम्यि तामील हो चुिी थी और उसिे उपरांत र्ी वह
न्यायालय िे समक्ष उपकस्ट्थत िहीं हुआ - कबिा तामील िी पुकष्ट एवं कबिा
िमािती वारंट िारी किए सीिे र्ैर-िमािती वारंट पाररत िरिा न्यायालय
िे अकििारों िा दुरुपयोर् मािा र्या और ऐसा आदेश कवकि में संिायग
िहीं पाया र्या - प्राथी िो किदेकशत किया र्या कि वह न्याकयि मकिस्ट्रेट
िे समक्ष कियत कतकथ िो उपकस्ट्थत होिर िारा 88 दं.प्र.सं. िे अंतर्गत
कििी बंिपत्र एवं दो प्रकतर्ू किष्पाकदत िरे तथा कवचारण में सहयोर् िरे।
(पैरा 5, 18, 21, 23)

आवेदि स्ट्वीिार I (E-13)

प्रोद्धृत मामलों िी सूची:

## Text

3 All. Ajay Singh @ Golu Vs. State of U.P. & Anr.
929

(a) the proceedings in respect of
such person shall be commenced afresh,
and the witnesses re-heard;

(b) subject to the provisions of
clause (a), the case may proceed as if such
person had been an accused person when
the Court took cognizance of the offence
upon which the inquiry or trial was
commenced."

8. A bare reading of Section 319 (4)
Cr.P.C. indicates that where a person is
summoned under Section 319 (1) to face
the
trial,
the
proceedings
shall
be
commenced afresh and the witnesses reheard only in respect of such person and
not in respect of all the accused persons.
Therefore, the applicant having been an
accused since inception of the tiral and he
already having cross examined the witness
PW-1, he has no right to recall PW-1 for
cross examining him again after he was reexamined by the prosecution consequent to
another accused being summoned under
Section 319 Cr.P.C.

9. Although, it is correct that Section
311 Cr.P.C. confers wide powers on the
court to summon any witness at any stage
of the enquiry, trial or other proceeding but
that power has to be exercised only when it
is essential for just decision of the case.

10. In these circumstances, the
applicant has no right to seek further crossexamination of PW-1 and such crossexamination is not at all essential for just
decision of the case. There appears to be no
illegality in the impugned order. The
application lacks merit and the same is
accordingly dismissed.
----------
(2024) 3 ILRA 929
ORIGINAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: LUCKNOW 15.03.2024
BEFORE

THE HON'BLE SUBHASH VIDYARTHI, J.

Application U/S 482. No. 2173 of 2024

Ajay Singh @ Golu ...Applicant
Versus
State of U.P. & Anr. ...Opposite Parties

Counsel for the Applicant:
Annapurna Agnihotri

Counsel for the Opposite Parties:
G.A.

आपराकिि कवकि : र्ारतीय दंि संकहता, 1860 - िारा 147,
406, 420, 504, 506 - दंि प्रकक्रया संकहता, 1973 -
िारा 62, 64, 65, 87 - र्ैर िमािती वारंट िे कवरुद्ध - प्राथी
द्वारा आदेश कदिांि 16.01.2024 िी वैिता िो चुिौती दी र्ई,
किसिे अंतर्गत कवचारण न्यायालय िे समि िारी किए िािे िे उपरांत र्ी
प्राथी िी अिुपकस्ट्थकत िे आिार पर उसिे कवरुद्ध र्ैर-िमािती वारंट िारी
किया - न्यायालय िे ररिॉिग पर ऐसा िोई िारण िहीं दशागया कि प्राथी
पर समि िी सम्यि तामील हो चुिी थी और उसिे उपरांत र्ी वह
न्यायालय िे समक्ष उपकस्ट्थत िहीं हुआ - कबिा तामील िी पुकष्ट एवं कबिा
िमािती वारंट िारी किए सीिे र्ैर-िमािती वारंट पाररत िरिा न्यायालय
िे अकििारों िा दुरुपयोर् मािा र्या और ऐसा आदेश कवकि में संिायग
िहीं पाया र्या - प्राथी िो किदेकशत किया र्या कि वह न्याकयि मकिस्ट्रेट
िे समक्ष कियत कतकथ िो उपकस्ट्थत होिर िारा 88 दं.प्र.सं. िे अंतर्गत
कििी बंिपत्र एवं दो प्रकतर्ू किष्पाकदत िरे तथा कवचारण में सहयोर् िरे।
(पैरा 5, 18, 21, 23)

आवेदि स्ट्वीिार I (E-13)

प्रोद्धृत मामलों िी सूची:

1. केन्रीय जाांच ब्यरो बनाम आयान वसांह आवि, 2023 एसएससी ऑनलाइन
एससी 379

2. इन्र मोहन गोस्वामी िथा एक अन्य बनाम उिराांचल राज्य िथा अन्य
(2007) 12 एससीसी पृष्ठ 01

3. ववकास बनाम राजस्थान राज्य (2014) 3 एससीसी पृष्ठ 321
(Delivered by Hon'ble Subhash Vidyarthi,
J.)

1. प्रार्थी की विद्िान अधििक्ता सुश्री
अन्नपूणाग
अजग्नहोत्री
तर्था
विद्िान
930 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
अततररक्त शासकीय अधििक्ता श्री राकेश
कुमार ससिंह को सुना तर्था पत्रािली का
अिलोकन ककया।

2. िारा 482 दण्ड प्रकिया सिंहहता के
अन्तगगत प्रस्तुत इस प्रार्थगना पत्र द्िारा
प्रार्थी ने प्रर्थम सूचना ररपोटग सिंख्या 0164
सन 2022 अन्तगगत िारा 147, 406, 420,
504, 506 िा०दिं०सिं० र्थाना बिजनौर, जनपद
लखनऊ मध्य के अनुिम में प्रस्तुत आरोप
पत्र हदनािंककत 20.11.2022 तर्था उसके
आिार पर विद्िान न्यातयक मजजस्रेट
तृतीय,
लखनऊ
द्िारा
पाररत
आदेश
हदनािंककत
10.02.2023
जजसके
द्िारा
उपरोक्त अपराि का सिंज्ञान सलया तर्था
प्रार्थी को विचारण हेतु तलि ककया एििं
आदेश हदनािंक 16.01.2024, जजसके द्िारा
प्रार्थी के विरुद्ि गैर जमानती िारिंट जारी
ककया गया, की िैिता को चुनौती दी।

3. उपरोक्त आदेश की िैिता को
चुनौती इस आिार पर दी गयी है कक प्रार्थी
के विरुद्ि लगाये गये आरोप असत्य हैं।
माननीय सिोच्च न्यायालय के तनणगय
केंद्रीय िांच ब्यूरो बनाम आयुन स ंह आटद,
2023 ए ी ी ऑनलाइन ए ी 379 में
अििाररत है कक िारा 482 दिं०प्र०सिं० के
अिंतगगत शजक्तयों का उपयोग करते हुए
न्यायालय को लघु विचारण (समनी रायल)
करने की आिश्यकता नहीिं है। इसमें
असियोजन / जािंच एजेंसी को आरोपों को
साबित करने की आिश्यकता नहीिं है।
दिं०प्र०सिं० की िारा 482 के अिंतगगत शजक्तयों
का उपयोग करते समय न्यायालय के पास
िहुत सीसमत अधिकार क्षेत्र है और मात्र यह
विचार करने की आिश्यकता है कक "क्या
आरोपी के विरुद्ि आगे िढ़ने के सलए कोई
पयागप्त सामग्री उपलब्ि है, जजसके सलए
आरोपी पर मुकदमा चलाने की आिश्यकता
है या नहीिं"।

4. अतः िारा 482 दिं०प्र०सिं० के
अन्तगगत प्रदि शजक्तयों का प्रयोग करते
हुए इस स्तर पर प्रार्थी के विरुद्ि
आपराधिक कायगिाही इस आिार पर तनरस्त
नहीिं की जा सकती कक उसके विरुद्ि
लगाए गए आरोप असत्य हैं, क्योंकक इस
स्तर पर यह न्यायालय आरोपों की सत्यता
की जााँच नहीिं कर सकता है।

5. प्रार्थी ने आदेश हदनािंक 16.01.2024
की िैिता को िी चुनौती दी है, जजसके
द्िारा विचारण न्यायालय ने समन जारी
ककए जाने के उपरािंत िी प्रार्थी के उपजस्र्थत
न होने के कारण प्रार्थी के विरुद्ि गैर
जमानती िारिंट जारी करने का आदेश
पाररत ककया।

6. प्रार्थी की विद्िान अधििक्ता ने
माननीय उच्चतम न्यायालय द्िारा इंद्र
मोहन गोस्िामी तथा एक अन्य बनाम
उत्तरांचल राज्य तथा अन्य (2007) 12 SCC
पृष्ट्ठ 01 तर्था विका बनाम रािस्थान
3 All. Ajay Singh @ Golu Vs. State of U.P. & Anr.
931
राज्य (2014) 3 SCC पृष्ट्ठ 321 के तनणगयों
का आश्रय सलया।

7. विचारण न्यायालय के आदेश पत्र
की प्रतत प्रार्थगना पत्र के सार्थ सिंलग्न है,
जजससे यह पररलक्षक्षत होता है कक हदनािंक
10/2/23 को विचारण न्यायालय ने आरोप
का प्रसिंज्ञान सलया एििं असियुक्तगण को
विचारण हेतु समन जारी ककया। हदनािंक
10/04/2023 को पाररत आदेश में विचारण
न्यायालय ने अिंककत ककया कक 'असि.गण
गैर हा. हैं। िाद हद. 03/05/2023 को िास्ते
ह.पेश हो। पूिग आदेश का पालन हो।

8. हदनाक 3/5/23 को विचारण
न्यायालय ने मात्र दो-चार शब्दों का एक
आदेश पाररत ककया, जजसको पढ़ना और
समझना सिंिि नहीिं है।

9. हदनािंक 9/8/23 में पाररत आदेश में
विचारण न्यायालय ने अिंककत ककया कक
'पुकारा गया असियुक्त सधचन उपजस्र्थत।
हदनािंक 5/10/23 को िास्ते हा. पेश हो।

10. हदनािंक 5/10/23 को पाररत आदेश
में विचारण न्यायालय ने अिंककत ककया
Case called out. Accused Sunil, Sachin and
Rohit exempted. Put up on 16/11/23 for
app.

11. हदनािंक 16/11/23 का आदेश इस
प्रकार है 'Case Called out accused. Sunil,
Sachin & Rohit exempted. Rest accused
Ajai absent. Put up on 16/1/24 for App.
Repeat Process.

12. बिना यह सिंतोष अिंककत ककए हुए
कक प्रार्थी अजय ससिंह उफग गोलू की
उपजस्र्थतत हेतु न्यायालय से कोई समन
िेजा गया है या नहीिं अर्थिा यहद समन
िेजा, तो िह प्रार्थी को प्राप्त हुआ है या
नहीिं तर्था बिना यह सिंतुजष्ट अिंककत ककए
हुए कक समन प्राप्त होने के उपरािंत िी
प्रार्थी विचारण हेतु उपजस्र्थत नहीिं हो रहा है,
न्यायालय ने हदनािंक 16/1/24 को आदेश
पाररत ककया कक 'पुकारा गया असि रोहहत
उपजस्र्थत, असि. सधचन ि सुनील की हा.मा.
प्रस्तुत पत्रािली हद. 28/2/24 को पेश हो।
असि. अजय ससिंह यादि उफग गोलू जररए
NBW तलि हो।

13. दण्ड प्रकिया सिंहहता के अध्याय
छः में असियुक्त की हाजजरी के सलए
आदेसशकाएिं जारी करने के प्रावििान है।

14. िारा 62 दिं०प्र०सिं० समन की
तामील
करने
का
तरीका
तनम्नित
प्रावििातनत करता है:-

" मन की तामील कै े की िाए
(1) प्रत्येक समन की तामील पुसलस
अधिकारी द्िारा या ऐसे तनयमों के अिीन
जो राज्य सरकार इस तनसमि िनाए, उस
न्यायालय के, जजसने िह समन जारी ककया
है, ककसी अधिकारी द्िारा या अन्य लोक
सेिक द्िारा की जाएगी।

(2) यहद साध्य हो तो समन ककए
गए व्यजक्त पर समन की तामील उसे उस
932 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
समन की दो प्रततयों में से एक का पररदान
या तनविदान करके िैयजक्तक रूप से की
जाएगी।

(3) प्रत्येक व्यजक्त, जजस पर समन
की ऐसे तामील की गई है, यहद तामील
करने िाले अधिकार द्िारा ऐसी अपेक्षा की
जाती है तो, दूसरी प्रतत के पृष्ठ के िाग पर
उसके सलए रसीद हस्ताक्षररत करेगा।"

15. िारा 64 दिं०प्र०सिं० में समन ककए
गए व्यजक्त के न समलने पर समन तामील
का तरीका तनम्नित हदया गया है:-

"िब मन ककए गए व्यजक्त न
समल कें तब तामील जहााँ समन ककया
गया व्यजक्त सम्यक तत्परता िरतने पर
िी न समल सके िहााँ समन की तामील दो
प्रततयों में से एक को उसके कुटुम्ि के
उसके सार्थ रहने िाले ककसी ियस्क पुरुष
सदस्य के पास उस व्यजक्त के सलए
छोड़कर की जा सकती है और यहद तामील
करने िाले अधिकारी द्िारा ऐसी अपेक्षा की
जाती है तो, जजस व्यजक्त के पास समन
ऐसे छोड़ा जाता है िह दूसरी प्रतत के पृष्ठ
िाग पर उसके सलए रसीद हस्ताक्षररत
करेगा।

स्पष्ट्टीकरण - सेिक, इस िारा के
अर्थग में कुटुम्ि का सदस्य नहीिं है।"

16. उपरोक्त प्राििान में समन तामील
न हो पाने पर िारा 65 दिं०प्र०सिं० के
अन्तगगत समन तामील की प्रकिया तनम्न
प्रकार दी गई हैः-

"िब पूिु उपबजन्धत प्रकार े
तामील न की िा के तब प्रकिया - यहद
िारा 62, िारा 63 या िारा 64 में
उपिजन्ित रूप से तामील सम्यक् तत्परता
िरतने पर िी न की जा सके तो तामील
करने िाला अधिकारी समन की दो प्रततयों
में से एक को उस गृह या िासस्र्थान के,
जजसमें समन ककया गया व्यजक्त मामूली
तौर पर तनिास करता है, ककसी सहजदृश्य
िाग में लगाएगा; और ति न्यायालय ऐसी
जािंच करने के पश्चात् जैसी िह ठीक समझे
या तो यह घोवषत कर सकता है कक समन
की सम्यक् तामील हो गई है या िह ऐसी
रीतत से नई तामील का आदेश दे सकता है
जजसे िह उधचत समझे।"

17. िारा 87 दिं०प्र०सिं० प्रावििातनत
करती है कक न्यायालय ककसी िी ऐसे
मामले में, जजसमें िह ककसी व्यजक्त की
हाजजरी के सलए समन जारी करने के सलए
इस सिंहहता द्िारा सशक्त ककया गया है,
अपने कारणों को असिसलखखत करने के
पश्चात उसकी धगरफ्तारी के सलए िारिंट
जारी कर सकता है:-

(क) यहद या तो ऐसा समन जारी
ककए जाने के पूिग या पश्चात ककन्तु उसकी
हाजजरी के सलए तनयत समय के पूिग
न्यायालय को यह विश्िास करने का कारण
हदखाई पड़ता है कक िह फरार हो गया है
या समन का पालन न करेगा, अर्थिा

(ख) यहद ि ऐसे समय पर हाजजर
होने में असफलत रहता है और यह साबित
3 All. Ajay Singh @ Golu Vs. State of U.P. & Anr.
933
कर हदया जाता है कक उस पर समन की
तामील सम्यक् रूप से ऐसे समय में कर
दी गई र्थी कक उसके तदनुसार हाजजर होने
के सलए अिसर र्था और ऐसी असफलता के
सलए कोई उधचत प्रततहेतु नहीिं हदया जाता
है।

18. प्रस्तुत प्रकरण में न्यायालय ने
ऐसे विश्िास करने का कोई कारण नहीिं
दशागया है कक प्रार्थी पर समन की तामील
सम्यक रूप से कर दी गई र्थी और इसके
उपरािंत िी िह न्यायालय के समक्ष
उपजस्र्थत नहीिं हुआ।

19. इंद्र मोहन गोस्िामी के उपरोक्त
तनणगय में माननीय उच्चतम न्यायालय ने
प्रततपाहदत ककया कक न्यायालय को तनजी
स्ितिंत्रता के अधिकार और समाज के हहतों
के िीच सिंतुलन िनाने का प्रयास करना
चाहहए। िारिंट जारी करने के सिंििंि में कोई
तनयम तनिागररत नहीिं ककए जा सकता हैं,
ककन्तु सामान्यतः जि तक असियुक्त
ककसी जघन्य अपराि का दोषी न हो तर्था
ऐसी आशिंका न हो कक िह साक्ष्य को नष्ट
कर सकता है या विधिक प्रकिया से िाग
सकता है, गैर जमानती िारिंट जारी नहीिं
ककए जाने चाहहए।

20. विका बनाम रािस्थान राज्य के
उपरोक्त तनणगय में माननीय उच्चतम
न्यायालय ने कहा कक बिना समन की
तामीली
सुतनजश्चत
ककए,
तर्था
बिना
जमानती िारिंट जारी ककए ककसी असियुक्त
के विरुद्ि गैर जमानती िारिंट जारी कर
देना उसके तनजी स्ितिंत्रता के सिंिैिातनक
अधिकार को िाधित करता है।

21. उपरोक्त तथ्यों के दृजष्टगत बिना
प्रार्थी पर समन की तामीली के िारे में कोई
सिंतोष अिंककत ककए बिना और प्रार्थी के
विरुद्ि जमानती िारिंट जारी ककए बिना गैर
जमानती िारिंट जारी कर देना न्यायालय के
अधिकारों का दुरुपयोग प्रतीत होता है और
ऐसा आदेश विधि में सिंिायग नहीिं है।

22. तदनुसार, आलोच्य आदेश हदनािंक
16.01.2024, जजसके द्िारा प्रार्थी के विरुद्ि
गैर जमानती िारिंट जारी ककया गया,
अपास्त ककया जाता है।

23. प्रार्थी को तनदेसशत ककया जाता है
कक
िह
न्यायालय
विद्िान
न्यातयक
मजजस्रेट तृतीय, लखनऊ के समक्ष तनयत
ततधर्थ को उपजस्र्थत होकर िारा 88
दिं०प्र०स० के अन्तगगत तनजी ििंिपत्र तर्था दो
प्रततिू तनष्पाहदत करे, तदुपरािंत विचारण मे
अपना पक्ष रखते हुए सहयोग करे।

24. आदेश समाप्त करने के पूिग यह
अिंककत करना अतनिायग प्रतीत होता है कक
विचारण न्यायालय द्िारा विचारण के
दौरान पाररत आदेशों से पक्षकारों के
अधिकारों पर प्रिाि पड़ता है। आदेशों को
आदेश पत्र पर अिंककत करना इससलए िी
934 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
अतनिायग है कक विचारण की कायगिाही की
िैिता को चुनौती देने पर कोई न्यायालय
विचारण न्यायालय की कायगिाही की िैिता
की समीक्षा कर सके। विचारण न्यायालय
द्िारा आदेश पत्र पर आदेश इस प्रकार
अिंककत करें कक उसको पढ़ा ही नहीिं जा सके
अर्थिा अपने आदेशों में पूरे शब्दों की जगह
सिंक्षेपाक्षर का प्रयोग करना उधचत नहीिं है,
क्योंकक इससे पक्षकारों तर्था उच्च न्यायालय
दोनों को ही आदेश को समझने में कहठनाई
होती है।

25. पूिग में िी विचारण न्यायालयों को
अपने आदेश स्पष्टतया अिंककत करने के
तनदेश जारी ककए गए हैं, ककिंतु प्रस्तुत
प्रकरण में विचारण न्यायालय के आदेश
पत्र की प्रमाखणत छायाप्रतत के अिलोकन से
स्पष्ट है कक विचारण न्यायालय अिी िी
आदेश अिंककत करने में उक्त तनदेशों का
ध्यान नहीिं रखते हैं।

26. अतः यह तनदेश हदया जाता है कक
समस्त विचारण न्यायालय तर्था अपीलीय
न्यायालय, पत्रािली के आदेश पत्र में अपने
आदेश स्पष्ट रूप से अिंककत करेंगे और
उसमें सिंक्षेपाक्षर का प्रयोग करने से िचेंगे।
यहद लिंिे आदेश में कोई िड़ा शब्द अर्थिा
शब्दों का समूह िार-िार प्रयोग हो रहा है
तो ऐसी पररजस्र्थतत में एक िार पूरा शब्द
अर्थिा शब्दों का समूह प्रयोग करके और
उसके सार्थ उसका सिंक्षेपाक्षर सलखकर
आदेश / तनणगय में अन्य स्र्थानों पर िार-
िार पूरा शब्द अर्थिा िाक्यािंश के स्र्थान पर
सिंक्षेपाक्षर का प्रयोग ककया जा सकता है।

27. यह आदेश जनपद स्तर के
समस्त न्यायालयों के सिंज्ञान में लाने के
सलए उधचत कायगिाही की जाए।
----------
(2024) 3 ILRA 934
ORIGINAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: LUCKNOW 07.03.2024

BEFORE

THE HON'BLE RAJESH SINGH CHAUHAN, J.

Application U/S 482. No. 2218 of 2024

Pradeep Agnihotri ...Applicant
Versus
State of U.P. & Anr. ...Respondents

Counsel for the Applicant:
Shishir Pradhan

Counsel for the Respondents:
G.A.

Criminal Law - Criminal Procedure Code,
1973
-
Sections
82,
83
&
482
-
Constitution of India,1950 - Article- 21, -
Negotiable
Instruments
Act,
1881
-
Sections 138, 138(C), 142 & 143(3) -
Application U/s 482 Cr.P.C. - for quashing the
impugned summoning order and non-bailable
warrant orders - complaint case - offence of
dishonour of cheque - petitioner taken plea that
the complaint was prematurely filed before the
statutory waiting period expired - and the legal
notice was sent to an incorrect address,
resulting in non-service and subsequent coercive
actions including proclamation under Section 82
Cr.P.C. - Court finds that, that investigating
agency seeks order of proclamations from the
trial court to exert the pressure upon the person
concern and the court concerned without taking