# Chandra Prakash & Ors. Revisionists v. State of U.P

- **Citation:** (2024) 1 ILRA 397
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2024-01-11
- **Case number:** Crl. Revision No. 1436 of 2023
- **Bench:** Subhash Vidyarthi
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/chandra-prakash-ors-revisionists-v-state-of-u-p-51369
- **Pages:** 5

## Headnote

G.A.

(अ) र्ौजदारी कानून - िारिीय दिंर् प्रकक्रया सिंकहिा ,1973
- िारा 397/401 - आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal
Revision) , िारा 227 - उन्मोचन(Discharge), िारा
228 - आरोप विरधचि करना(Framing of Charge) ,
िारिीय दिंर् सिंकहिा, 1860 - िारा 306 - आत्माहत्या का
दुष्प्रे रण (Abetment of suicide) - मामले की सत्यिा
मात्र िब स्पष्ट हो पायेर्ी जब अधियोजन अपना साक्ष्य
प्रस्िुि करिा है िर्था साजक्षयों का प्रधिपरीक्षण बचाि पक्ष
द्वारा ककया जािा है, िारा 313 दिं०प्र०सिं० के अिंिर्गि
अधियुक्त से उसको आरोवपि करने िाले साक्ष्य के विषय में
प्रश्न पूछे जािे हैं िर्था अधियुक्त को बचाि में साक्ष्य देने का
अिसर कदया जािा है - उक्त सिी सोपानों के पूणग होने के
पिाि ही विचारण पूणग होिा है िर्था न्यायालय अपनी
अिंधिम राय बनािे हुए धनणगय देिा है। (पैरा - 10)

(ब) िारिीय दिंर् प्रकक्रया सिंकहिा ,1973 - दिं०प्र०सिं० की
िारा 227 एििं 228 में एक महीन सा अन्िर - िारा
227 दिं०प्र०सिं० में न्यायालय को अधियुक्त के विरुद्ध
कायगिाही करने के धलए पयागि आिार न होने का सिंिोष
अधिलेखों िर्था अन्य उपलब्ि सामिी के आिार पर
धनिागररि करना होिा है - िारा 228 द०प्र०सिं० में
न्यायालय को मात्र यह राय बनानी होिी है कक ऐसी
उपिारणा करने का आिार है कक अधियुक्त ने कधर्थि
अपराि ककया है- यह कहना र्लि होर्ा कक िारा 228
दिं०प्र०सिं० में आरोप विरधचि करिे समय न्यायालय को
ऐसी राय बनाना आिश्यक है कक अधियुक्त धनिय ही कधर्थि
आरोप के धलए दोषी है।(पैरा - 8)
मृिक ने एक मृत्यु पूिग पत्र धलखकर प्रार्थीर्ण को अपनी
मृत्यु के धलए दोषी ठहराने के िुरन्ि बाद आत्महत्या कर
ली - धशकायिकिाग ने अपने बयान में उपरोक्त आरोप का
समर्थगन ककया- उन्मोचन के धलए प्रार्थगना-पत्र -
पुनरीक्षणकिाग का उन्मोचन प्रार्थगना-पत्र धनरस्ि ककया र्या
- िैििा को चुनौिी । (पैरा - 2,3,4,11)

धनणगय : आरोपों की सत्यिा िारा 227 दिं०प्र०सिं० के स्िर
पर िय नहीिं की जा सकिी है िर्था यह विचारण(Trial) के
उपरान्ि ही िय हो सकिा है ।(पैरा -11)

पुनरीक्षण धनरस्ि ककया जािा है। (E-7)

उद्धृि मामलों की सूची :

## Text

1 All. Chandra Prakash & Ors. Vs. State of U.P.
397
application for discharge filed by the
revisionist is hereby set aside and the trial
court is directed to decide the revision for
discharge under Section 239 Cr.P.C afresh
in light of the observation made in this
order.
----------
(2024) 1 ILRA 397
REVISIONAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: LUCKNOW 11.01.2024

BEFORE

THE HON'BLE SUBHASH VIDYARTHI, J.

Crl. Revision No. 1436 of 2023

Chandra Prakash & Ors. ...Revisionists
Versus
State of U.P. ...Respondent

Counsel for the Revisionists:
Arun Kumar Pandey, I.K. Pandey Ist

Counsel for the Respondent:
G.A.

(अ) र्ौजदारी कानून - िारिीय दिंर् प्रकक्रया सिंकहिा ,1973
- िारा 397/401 - आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal
Revision) , िारा 227 - उन्मोचन(Discharge), िारा
228 - आरोप विरधचि करना(Framing of Charge) ,
िारिीय दिंर् सिंकहिा, 1860 - िारा 306 - आत्माहत्या का
दुष्प्रे रण (Abetment of suicide) - मामले की सत्यिा
मात्र िब स्पष्ट हो पायेर्ी जब अधियोजन अपना साक्ष्य
प्रस्िुि करिा है िर्था साजक्षयों का प्रधिपरीक्षण बचाि पक्ष
द्वारा ककया जािा है, िारा 313 दिं०प्र०सिं० के अिंिर्गि
अधियुक्त से उसको आरोवपि करने िाले साक्ष्य के विषय में
प्रश्न पूछे जािे हैं िर्था अधियुक्त को बचाि में साक्ष्य देने का
अिसर कदया जािा है - उक्त सिी सोपानों के पूणग होने के
पिाि ही विचारण पूणग होिा है िर्था न्यायालय अपनी
अिंधिम राय बनािे हुए धनणगय देिा है। (पैरा - 10)

(ब) िारिीय दिंर् प्रकक्रया सिंकहिा ,1973 - दिं०प्र०सिं० की
िारा 227 एििं 228 में एक महीन सा अन्िर - िारा
227 दिं०प्र०सिं० में न्यायालय को अधियुक्त के विरुद्ध
कायगिाही करने के धलए पयागि आिार न होने का सिंिोष
अधिलेखों िर्था अन्य उपलब्ि सामिी के आिार पर
धनिागररि करना होिा है - िारा 228 द०प्र०सिं० में
न्यायालय को मात्र यह राय बनानी होिी है कक ऐसी
उपिारणा करने का आिार है कक अधियुक्त ने कधर्थि
अपराि ककया है- यह कहना र्लि होर्ा कक िारा 228
दिं०प्र०सिं० में आरोप विरधचि करिे समय न्यायालय को
ऐसी राय बनाना आिश्यक है कक अधियुक्त धनिय ही कधर्थि
आरोप के धलए दोषी है।(पैरा - 8)
मृिक ने एक मृत्यु पूिग पत्र धलखकर प्रार्थीर्ण को अपनी
मृत्यु के धलए दोषी ठहराने के िुरन्ि बाद आत्महत्या कर
ली - धशकायिकिाग ने अपने बयान में उपरोक्त आरोप का
समर्थगन ककया- उन्मोचन के धलए प्रार्थगना-पत्र -
पुनरीक्षणकिाग का उन्मोचन प्रार्थगना-पत्र धनरस्ि ककया र्या
- िैििा को चुनौिी । (पैरा - 2,3,4,11)

धनणगय : आरोपों की सत्यिा िारा 227 दिं०प्र०सिं० के स्िर
पर िय नहीिं की जा सकिी है िर्था यह विचारण(Trial) के
उपरान्ि ही िय हो सकिा है ।(पैरा -11)

पुनरीक्षण धनरस्ि ककया जािा है। (E-7)

उद्धृि मामलों की सूची :

1. रमेश कुमार बनाम छत्तीसर्ढ राज्य , AIR 2001
सुप्रीम कोर्ग 3837

2. माररयानो एन्र्ो ब्रूनो बनाम पुधलस धनरीक्षक (M.A.
Bruno Vs I.P.) , AIR 2022 सुप्रीम कोर्ग 4994

3. अधमि कपूर बनाम रमेश चन्दर, 2012 9SCC 460

4. महाराष्ट्र राज्य बनाम सोमनार्थ र्थापा , 1996 4SCC
659

(Delivered by Hon'ble Subhash Vidyarthi, J.)

1. प्रार्थीर्ण के विद्वान अधििक्ता श्री
अरुण
कुमार
पाडर्ेय,
विद्वान
अधिररक्त
398 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
शासकीय अधििक्ता श्री राकेश कुमार धसिंह को
सुना िर्था पत्रािली का अिलोकन ककया।

2. िारा 397/401 दडर् प्रकक्रया सिंकहिा
के अिंिर्गि प्रस्िुि इस पुनरीक्षण प्रार्थगना पत्र
द्वारा पुनरीक्षणकिाग ने विद्वान अधिररक्त जनपद
एििं सत्र न्यायािीश / विशेष न्यायािीश
धर्रोहबिंद अधिधनयम कक्ष सिंख्या 6, अयोध्या
द्वारा मुकदमा अपराि सिंख्या 592 सन 2020
अिंिर्गि िारा 306 िा०दिं०सिं० र्थाना कोििाली
जजला अयोध्या से उत्पन्न सत्र िाद सिंख्या
164 सन 2023 में पाररि आदेश कदनािंक
18.11.2023, जजसके द्वारा पुनरीक्षणकिाग का
उन्मोचन प्रार्थगना-पत्र धनरस्ि ककया र्या, की
िैििा को चुनौिी दी है।

3. प्रकरण के िथ्य सिंक्षेप में, इस प्रकार
हैं, कदनािंक 1.9.2020 को िारा 306 ि 120-B
िा०दिं०सिं० के प्रार्थीर्ण सकहि 5 व्यवक्तयों के
विरुद्ध धलखाई र्ई प्रर्थम सूचना ररपोर्ग में यह
कहा र्या है कक धशकायिकिाग के पुत्र का वििाह
िषग 2008 में प्रार्थी सिंख्या 1 ि 2 की पुत्री- सहअधियुक्त दीपा के सार्थ हुआ र्था। अधियुक्तर्ण,
जो कक धशकायिकिाग के पुत्र के ससुरालीजन हैं,
उसको शारीररक और मानधसक रूप से
उत्पीकडि करिे र्थे िर्था अधियुक्तर्ण की
प्रिाडना से ििंर् आकर धशकायिकिाग के पुत्र ने
आत्महत्या कर ली। मृिक ने एक मृत्यु पूिग
पत्र धलखा र्था जजसमें उसने सार्-सार् धलखा
कक उसकी मृत्यु के उत्तरदायी प्रार्थीर्ण हैं।
जजन्होंने मृिक का बहुि मानधसक शोषण
ककया। वििेचनोपरान्ि वििेचक ने कदनािंक
20.8.2021 को आरोप-पत्र प्रस्िुि ककया।
कदनािंक 11.5.2022 को न्यायालय ने अपराि
का सिंज्ञान लेकर अधियुक्तर्ण को विचारण हेिु
िलब ककया।

4. अपनी पत्नी से वििाद चल रहा र्था
जजस सिंबिंि में एक बाद िी प्रस्िुि हुआ र्था।
िारा 227 दिं०प्र०सिं० से सिंबिंधिि अनेक विधि
व्यिसायों का सिंदिग देिे हुए विचारण
न्यायालय ने यह कहा कक आरोप विरचन के
स्िर पर केिल यह देखा जाना आिश्यक है कक
अधियुक्तर्ण के विरुद्ध अधियोजन की ओर से
प्रस्िुि ककये र्ये दस्िािेज / साक्ष्य के आिार
पर प्रर्थम दृष्टया अपराि विद्यमान है अर्थिा नहीिं
अर्थिा अधियुक्तर्ण के विरुद्ध अधियोर् चलाये
जाने के पयागि आिार है अर्थिा नहीिं। आरोप
विरचन के स्िर पर न्यायालय के समक्ष
उपलब्ि सामिी के आिार पर मामले का र्ुणदोष के आिार पर विचार ककया जाना
आिश्यक नहीिं है, न ही अधियोजन पक्ष द्वारा
प्रस्िुि साक्ष्य की विश्वसनीयिा एििं पयागििा
की जािंच ककये जाने की आिश्यकिा है अवपिु
इस स्िर पर केिल अधियुक्तर्ण के विरुद्ध
प्रर्थम दृष्टया बाद ही देखा जाना आिश्यक है,
जो प्रस्िुि बाद में उपलब्ि है।

5. उक्त आदेश की िैििा को चुनौिी देिे
हुए पुनरीक्षणकिाग के विद्वान अधििक्ता ने
माननीय उच्चिम न्यायालय द्वारा रमेश कुमार
बनाम छत्तीसर्ढ राज्य AIR 2001 सुप्रीम कोर्ग
1 All. Chandra Prakash & Ors. Vs. State of U.P.
399
3837 में पाररि धनणगय का आश्रय धलया। उक्त
धनणगय दोषधसवद्ध िर्था दडर्ादेश के विरुद्ध एक
अपील र्थी, न कक उन्मोचन आदेश धनरस्ि ककये
जाने के आदेश के विरुद्ध। उक्त धनणगय में िारा
227 दिं०प्र०सिं० के सिंबिंि में कोई िी धसद्धान्ि
प्रधिपाकदि नहीिं ककया र्या है। माननीय
उच्चिम न्यायालय ने अपील इस आिार पर
स्िीकार की र्थी कक उक्त प्रकरण में ऐसा कोई िी
साक्ष्य नहीिं र्था जजससे कक यह िय ककया जा सके
कक अधियुक्तर्ण ने मृिक को आत्महत्या करने
के धलए दुष्प्रेररि ककया र्था। उक्त धनणगय मामले
के विचारण के पूणग होने के उपरान्ि िर्था पक्षों
का साक्ष्य लेने के उपरान्ि कदया र्या र्था िर्था
इस आिार पर दोवषधसवद्ध िर्था दडर्ादेश को
अपास्ि ककया र्या कक दोषधसवद्ध के धलए साक्ष्य
पयागि नहीिं र्था।

6. पुनरीक्षणकिाग के विद्वान अधििक्ता ने
माननीय उच्चिम न्यायालय द्वारा माररयानो
एन्र्ो ब्रूनो बनाम पुधलस धनरीक्षक (Mariano
Anto Bruno v. Inspector of Police.)
AIR 2022 सुप्रीम कोर्ग 4994 में पाररि
धनणगय िी प्रस्िुि ककया। यह धनणगय िी
विचारण पूणग होने के पिाि पाररि दोषधसवद्ध
िर्था दडर्ादेश के विरुद्ध पाररि एक अपील
र्थी। माननीय उच्चिम न्यायालय ने अपील
इस आिार पर स्िीकार की र्थी कक दोवषधसवद्ध
आदेश मात्र कहिबद्ध साजक्षयों को मौजखक
साक्ष्य पर आिाररि र्था। उक्त दोनों आदेश
िारा 227 दिं०प्र०सिं० से सिंबिंधिि नहीिं हैं और
प्रस्िुि प्रकरण पर लार्ू नहीिं होिे हैं।

7. दिं०प्र०सिं० की िारा 227 एििं 228 इस
प्रकार हैं-

227.
उन्मोचन.
यकद
नामले
के
अधिलेख और उत्तके सार्थ दी र्ई दस्िािेजों
पर विचार कर लेने पर, और इस धनधमत्त
अधियुक्त और अधियोजन के धनिेदन की
सुनिाई कर लेने के पिाि् न्यायािीश यह
समझिा है कक अधियुक्त के विरुद्ध कायगिाही
कले के धलए पयागि आिार नहीिं है िो िह
अधियुक्त को उन्मोधचि कर देर्ा और ऐसा
करले के अपने कारणों को लेखबद्ध कला।

228. आरोप र्िरर्चत करना (1) यकद
पूिोक्त रूप से विचार, और सुनिाई के पिाि्
न्यायािीश की यह राय है कक ऐसी उपिारणा
कत्ले का आिार है कक अधियुक्त ने ऐसा
अपराि ककया है, जो-

(क) अनन्यिः सेशन न्यायालय द्वारा
विचारणीय नहीिं है िो िह, अधियुक्त के विरुद्ध
आरोप विरधचि कर सकिा है और आदेश
द्वारा, मानले को विचारण के धलए मुख्य
न्याधयक मजजस्रेर् को अन्िररि कर सकिा
है [ या कोई अन्य प्रर्थन िर्ग न्याधयक
मजजस्रेर् ऐसी िारीख को जो िह ठीक
समझे, अधियुक्त को, यर्थाजस्र्थधि, मुख्य
न्याधयक मजजस्रेर् या प्रर्थम िर्ग न्याधयक
मजजस्रेर् के समक्ष हाजजर होने का धनदेश दे
सकेर्ा, और िब ऐिा मजजस्रेर् ] उस मानले
का विचारण पुधलस ररपोर्ग पर सिंजस्र्थि िारडर्
400 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
नानों के विचारण के धलए प्रकक्रया के अनुत्तार
करेर्ा;

(3) अनन्यिः उत्त न्यायालय द्वारा
विचारणीय है िो िह अधियुक्त के विरुद्ध आरोप
धलजखि रूप में विरधचि करेर्ा।

(2) जहािं न्यायािीश उपिारा (1) के खडर्
(ख) के अिीन कोई आरोप विरधचि करिा है,
िहािं िह आरोप अधियुक्त को पढकर सुनाया
और समझाया जायेर्ा और अधियुक्त से यह
पूछा जाएर्ा कक क्या िह उस अपराि का,
जजसका आरोप लर्ाया र्या है, दोषी होने का
अधििचन करिा है या विचारण ककए जाने का
दािा करिा है।

8. न्यायालय द्वारा िारा 227 दिं०प्र०सिं०
के अिंिर्गि उन्मोचन का प्रार्थगना-पत्र िय करने
िर्था िारा 228 दिं०प्र०सिं० के अन्िर्गि आरोप
विरधचि करिे समय दृवष्टकोण धिन्न-धिन्न
होना चाकहए। माननीय उच्चिम न्यायालय ने
अधमि कपूर बनाम रमेश चन्दर, 2012
9SCC 460 में इस विषय में प्रधिपाकदि ककया
कक यकद अधियुक्त िारा 227 दिं०प्र०सिं० के
अिंिर्गि उन्मोधचि नहीिं ककया जािा िो उसके
विरुद्ध िारा 228 दिं०प्र०सिं० में आरोप विरधचि
ककये जािे हैं। उपरोक्त दोनों ही प्रावििानों के
अिंिर्गि न्यायालय को अधिलेख पर उपजस्र्थि
सामिी को ध्यान में रखना होिा है िर्था पक्षों
को सुनने के पिाि न्यायालय अधियुक्त को
उन्मोधचि कर सकिी है अर्थिा जहाूँ न्यायालय
इस मि की हो कक यह मानने के धलए पयागि
आिार हैं कक अधियुक्त ने अपराि काररि ककया
है, उसे आरोप विरधचि करने चाकहए। यकद
ककसी अपराि के अियि प्रकरण के िथ्यों से
प्रिीि होिे हो िो न्यायालय यह अििाररि
करेर्ा कक अधियुक्त के विरुद्ध कायगिाही चलाने
का आिार है और िद्नुसार आरोप विरधचि
करेर्ा। यह अििारणा विधिक अििारणा नहीिं
है। एक अपराि के अियिों के उपजस्र्थि होने के
सिंबिंि में न्यायालय का सिंिोष होना आरोप
विरधचि करने के हेिु अपररहायग शिग है। यह
सिंिोष एक प्रर्थम दृष्टया प्रकरण से िी धनचले
स्िर का हो सकिा है। दिं०प्र०सिं० की िारा 227
एििं 228 में एक महीन सा अन्िर है। िारा 227
दिं०प्र०सिं० में न्यायालय को अधियुक्त के विरुद्ध
कायगिाही करने के धलए पयागि आिार न होने
का सिंिोष अधिलेखों िर्था अन्य उपलब्ि
सामिी के आिार पर धनिागररि करना होिा है
जबकक िारा 228 द०प्र०सिं० में न्यायालय को
मात्र यह राय बनानी होिी है कक ऐसी उपिारणा
करने का आिार है कक अधियुक्त ने कधर्थि
अपराि ककया है। अिः यह कहना र्लि होर्ा
कक िारा 228 दिं०प्र०सिं० में आरोप विरधचि
करिे समय न्यायालय को ऐसी राय बनाना
आिश्यक है कक अधियुक्त धनिय ही कधर्थि
आरोप के धलए दोषी है।

9. माननीय उच्चिम न्यायालय ने
अिेिर कहा कक िारा 228 दिं०प्र०सिं० में
िाक्यािंश "न्यायािीश की यह राय है कक ऐसी
उपिारणा करने का आिार है कक अधियुक्त ने
1 All. Sumit & Anr. Vs. State of U.P. & Ors.
401
ऐसा अपराि ककया है।" वििाधयका ने अपने
वििेक का प्रयोर् करके धलखा है। जब अपराि के
अियि उपजस्र्थि हो, अपराि की अििारणा
करना िारा 228 में अिंिधनगकहि है िर्था न्यायालय
इस स्िर पर अधियोजन के कर्थनों पर
अनािश्यक सिंशय करिे हुए अपने क्षेत्राधिकार
को इस स्िर िक नहीिं बढा सकिा है जजससे कक
अधिशय शीघ्रिा से आरोपों को धनरस्ि ककया जा
सके।

10. महाराष्ट्र राज्य बनाम सोमनार्थ र्थापा
1996 4SCC 659 में 'अििाररि करने' की
व्याख्या सिंिाविि साक्ष्य के आिार पर विश्वास
अर्थिा स्िीकार करने अर्थिा िब िक धसद्ध
मानने, जब िक कक इसके विपरीि साक्ष्य न आ
जाय, के रूप में की र्यी। दूसरे शब्दों में, मामले
की सत्यिा मात्र िब स्पष्ट हो पायेर्ी जब
अधियोजन अपना साक्ष्य प्रस्िुि करिा है िर्था
साजक्षयों का प्रधिपरीक्षण बचाि पक्ष द्वारा ककया
जािा है, िारा 313 दिं०प्र०सिं० के अिंिर्गि
अधियुक्त से उसको आरोवपि करने िाले साक्ष्य
के विषय में प्रश्न पूछे जािे हैं िर्था अधियुक्त को
बचाि में साक्ष्य देने का अिसर कदया जािा है।
उक्त सिी सोपानों के पूणग होने के पिाि ही
विचारण पूणग होिा है िर्था न्यायालय अपनी
अिंधिम राय बनािे हुए धनणगय देिा है।

11. उक्त विधिक जस्र्थधि के आलोक में
प्रस्िुि मामले के िथ्यों का परीक्षण करने पर
यह प्रिीि होिा है कक मृिक ने एक मृत्यु पूिग पत्र
धलखकर प्रार्थीर्ण को अपनी मृत्यु के धलए दोषी
ठहराने के िुरन्ि बाद आत्महत्या कर ली।
धशकायिकिाग ने अपने बयान में िी उपरोक्त
आरोप का समर्थगन ककया है। आरोपों की सत्यिा
िारा 227 दिं०प्र०सिं० के स्िर पर िय नहीिं की जा
सकिी है िर्था यह विचारण के उपरान्ि ही िय हो
सकिा है ककन्िु उपरोक्त िथ्यों के आलोक में
प्रार्थी को उन्मोधचि ककये जाने का कोई आिार
नहीिं है। आलोच्य आदेश कदनािंक 18.11.2023,
जजसके द्वारा प्रार्थी का उन्मोचन प्रार्थगना-पत्र
धनरस्ि ककया र्या, में कोई त्रुकर् नहीिं है।

12. पुनरीक्षण बलहीन है और िद्नुसार
धनरस्ि ककया जािा है।
----------
(2024) 1 ILRA 401
ORIGINAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 08.01.2024

BEFORE

THE HON'BLE ANJANI KUMAR MISHRA, J.
THE HON'BLE ARUN KUMAR SINGH
DESHWAL, J.

Criminal Misc. Writ Petition No. 17560 of 2023

Sumit & Anr. ...Petitioners
Versus
State of U.P. & Ors. ...Respondents

Counsel for the Petitioners:
Sri Akhilesh Srivastava, Sri Saksham Srivastava

Counsel for the Respondents:
G.A.

A. Constitution of India, 1950-Article 226,
21-Indian Penal Code, 1860-Sections 174A,88-Criminal
Procedure
Code,
1973Sections 195 & 2(d)-Quashing of FIRpetitioners charged for the offence u/s
174-A IPC only, cognizance of which is