# Chhotu @ Raju v. State of U.P

- **Citation:** (2023) 5 ILRA 448
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2023-04-27
- **Case number:** Crl. Misc. First Bail Application No. 16312 of 2023
- **Bench:** Gautam Chowdhary
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/chhotu-raju-v-state-of-u-p-50221
- **Pages:** 7

## Headnote

Criminal Law - Criminal Procedure Code,
1973 - Sections 161 & 164 - Indian Penal
Code, 1860 - Section - 376(2-G), -
5 All. Chhotu @ Raju Vs. State of U.P.
449
Constitution of India - Article 21 -
Application for Bail - FIR - offence of Gang rape
- contradiction in Statement of under section
161 and 164 - trial is still pending - plea of
prolonged incarceration of a person as an under
trial is against fundamental right under article
21 of constitution - principle of reformation -
court finds that, it is socking that victim become
hostile, but trail is still pending since last 9 years
- applicant is suffering the consequences of this
delay - while the principle of the judicial process
says that even if a hundred criminals are
spared, not even a single innocent person
should
be
punished
-
Accordingly,
Bail
Application is allowed.

Bail Application Allowed. (E-11)

List of Cases cited:

## Text

448 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
should also consider the danger, of course,
of justice being thwarted by grant of bail.

29. Applicant is very influential
political figure of the State of Uttar Pradesh
and as many as 85 cases were lodged
against him and 13 cases are still pending.
From perusal of the list of the cases, it
reflects that number of cases were of
serious and heinous crimes and in two
cases he has already convicted, therefore,
possibility cannot be ruled out that after
release on bail, applicant may tamper the
witnesses specially when such allegation
against the applicant is itself in the FIR of
the present case.

30. Further, every crime committed
by an individual is the crime against the
society and it always affects the society at
large and if such persons who have
criminal antecedents of more than 80 cases
would be enlarged on bail then they can
again commit such offences and they may
cause danger to the society and they may
also create problems for the State to
maintain law and order, therefore, in the
interest of the public at large and State,
they in general should not be released on
bail.

31. Although it appears that applicant is
in jail since 14.8.2020 and in the present
matter, he is in jail for last about one and a
half years but the period of custody of an
accused has to be weighed simultaneously
with the totality of the circumstances and the
criminal antecedents of the accused and the
circumstances which may justify the grant of
bail are to be considered in the larger context
of the societal concern involved in releasing
an accused, in juxtaposition to individual
liberty of the accused seeking bail [See: Ash
Mohammad. Vs. Shiv Raj Singh reported in
(2012) 9 SCC 446].

32. In case of Neeru Yadav (supra) on
which reliance was placed by the learned
AGA, Apex Court held that while granting
bail to an accused who is having criminal
antecedents the Courts should be very
cautious and Court cannot ignore the
criminal antecedents of the accused. The
Apex Court in case of Neeru Yadav
(supra) further observed that law expects
the judiciary to be alert while admitting
these kind of accused persons to be at large.

33. Therefore, it is lucid that while
deciding bail application, criminal antecedents
of the accused can not be ignored.

34. Therefore, from the discussion
made above, in my view, applicant is not
entitled to be released on bail.

35. Accordingly the instant bail
application stands rejected.
----------
(2023) 5 ILRA 448
APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: ALLAHABAD 27.04.2023

BEFORE

THE HON'BLE GAUTAM CHOWDHARY, J.

Crl. Misc. First Bail Application No. 16312 of
2023

Chhotu @ Raju ...Applicant
Versus
State of U.P. ...Opposite Party

Counsel for the Applicant:
Sri Atul Kumar

Counsel for the Opposite Party:
G.A.

Criminal Law - Criminal Procedure Code,
1973 - Sections 161 & 164 - Indian Penal
Code, 1860 - Section - 376(2-G), -
5 All. Chhotu @ Raju Vs. State of U.P.
449
Constitution of India - Article 21 -
Application for Bail - FIR - offence of Gang rape
- contradiction in Statement of under section
161 and 164 - trial is still pending - plea of
prolonged incarceration of a person as an under
trial is against fundamental right under article
21 of constitution - principle of reformation -
court finds that, it is socking that victim become
hostile, but trail is still pending since last 9 years
- applicant is suffering the consequences of this
delay - while the principle of the judicial process
says that even if a hundred criminals are
spared, not even a single innocent person
should
be
punished
-
Accordingly,
Bail
Application is allowed.

Bail Application Allowed. (E-11)

List of Cases cited:
1. Indrani Pratim Mukerjea Vs Central Bureau of
Investigation & anr. passed in Special Leave to
Appeal (Crl.) No. 1627 of 2022.

2. Rajasthan Vs Balchand @ Baliay (AIR 2447,
1978),

3. Arnesh Kumar Vs St. of Bihar (AIR 1277 of
2014).

(Delivered by Hon'ble Gautam Chowdhary, J.)

1. वर्तमान दाण्डिक प्रकीर्त जमानर्
प्रार्तना पत्र आवेदक छोटू उर्त राजू की ओर से
मु०अ०स० 200/2014, अन्र्र्तर् धारा 376(2G)
भा०दं०वव०, र्ाना शाहपुर, ण्जला मुजफ्र्रनर्र में
जमानर् पर मुक्र् करने हेर्ु प्रस्र्ुर् ककया र्या
है।

2. वाद के र्थ्य संक्षेप में इस प्रकार है
कक, वादी सुधीर की बहन ददनांक 04.06.2014
को देर शाम करीब साढे नौ बजे अपनी बहन के
र्ांव से वापस शाहपुर आयी र्ी। जैसे ही वह
बसी रोि पर पहुंची र्ो करीब चार-पांच
मुलण्जमानों ने मेरी बहन को जबरदस्र्ी पकड़
ललया और कब्रिस्र्ान में ले जाकर बारी-बारी से
बलात्कार ककया और बेहोशी की हालर् में
छोड़कर भार् र्ये।

3. अलभयोर्ी सुधीर ने दद० 06.06.2014
को बयान ददया कक दद० 04.06.2014 को उसके
र्ांव के लड़के ववजय पुत्र प्रेम लसंह को र्ाना
शाहपुर बुलाया और ववजय ने मुझे र्ाने से ही
र्ोन कर बर्ाया कक र्ुम्हारी बहन र्ाना शाहपुर
में बैठी है, मैं र्ाना शाहपुर पहुंचा और र्ाने से
मेरी बहन को मेरे सार् भेज ददया। मैं अपनी
बहन को लेकर घर आ र्या। मुझे र्ाने पर यह
मालूम नहीं चल पाया कक मेरी बहन के सार्
दुष्कमत हुआ है। घर आकर बहन ने अपनी मामी
को बर्ाया कक उसके सार् बलात्कार हुआ है।

4. आवेदक के ववद्वान अधधवक्र्ा एवं
ववद्वान अपर शासकीय अधधवक्र्ा को सुना
र्र्ा पत्रावली का पररशीलन ककया।

5. आवेदक के ववद्वान अधधवक्र्ा ने र्कत
प्रस्र्ुर् ककया कक:-

1- आवेदक को इस प्रकरर् में र्लर्
एवं र्जी ढंर् से झूठा र्ंसाया र्या है, उसने
कधर्र् अपराध काररर् नहीं ककया है। आवेदक
प्रर्म सूचना ररपोटत में नामजद नहीं है। प्रर्म
सूचना
ररपोटत
ववलंब्रबर्
है,
ण्जसका कोई
स्पष्टीकरर् नहीं ददया र्या है। वादी ने र्र्ा
कधर्र् घटना के दो ददन बाद सुनी-सुनाई बार्
के आधार पर प्रर्म सूचना ररपोटत दजत करवायी
है र्र्ा इस ववलंब का कोई स्पष्टीकरर् नही
ददया है।

2- ददनांक 07.06.2014 को पीडड़र्ा ने
अपने मजीद बयान में यह कर्न ककया र्या
कक मामले के अलभयुक्र्र्र् द्वारा उसके सार्
450 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
बारी-बारी से दुष्कमत ककया र्या एवं यह घटना
राब्रत्र नौ बजे से रार् एक िेढ बजे र्क की र्ी।
उसके बाद इन लोर्ों ने बारी-बारी बलात्कार
करने के बाद पीडड़र्ा के वहां से भर्ा ददया,
लेककन उसे बेहोशी सी आ रही र्ी और र्कान
लर् रही र्ी व लड़खड़ा कर चल पा रही र्ी
और सड़क पर आकर लड़खड़ा कर बैठ र्यी र्ी
र्भी वहां दुकानों की चौकीदारी करर्ा हुआ एक
चौकीदार आ र्या र्ा ण्जसने अपना नाम र्र्न
लसंह बर्ाया र्ा। चौकीदार ने हालर् देखकर
पूछा र्ो उसने उसे सारी घटना के बारे में
बर्ाया र्ा उसके बाद पास वाली पुललस चौकी
पर ले र्या र्ा। वहां से र्ाने पर ले र्ये र्े।

3- ददनांक 07.06.2014 को कधर्र्
पीडड़र्ा का बयान वववेचक द्वारा ललया र्या,
ण्जसमें उसने कर्न ककया है कक वह 15 ददवस
पूवत अपने ससुराल खेिा हटाना से अपनी बहन
प्रलमला की ससुराल कसेरवा र्यी र्ी और
मंर्लवार 3 र्ारीख को वह कसरेवा से दोपहर
के बाद रोिवेज बस से बुढाना र्क आई। उस
समय हल्का हल्का अंधेरा हो र्या र्ा। शाहपुर
आर्े-आर्े कार्ी रार् हो र्यी र्ी। शाहपुर में
वह बदरी कला जाने वाली सड़क के सामने
सड़क पर ही उर्र र्यी। उसके र्ांव की र्रर्
जाने वाली सड़क पर कई र्ांव के र्ांर्े खड़े
रहर्े है। वह सड़क पर ही एक र्ांर्े के पास
खिीी़ हो र्यी। र्ांर्े के पास एक लड़का खड़ा र्ा
जो टोपी ओढे हुए र्ा उस लड़के ने कहा कक
र्ांर्ा कब्रिस्र्ान में खड़ा है। उसे ऐसा लर्ा जैसे
कक उसकी कमर में कोई सुई जैसी चुभी है और
वह लड़का पीडड़र्ा का पकड़ कर कब्रिस्र्ान के
अन्दर ले र्या वहां पर मैदान ही मैदान और
झाडियां र्ी। वहां मैदान में पहले दो अन्य
व्यण्क्र् आये और उसके बाद दो कर्र आये और
बाद में कुल लमलाकर नौ आदमी हो र्ये और
सब लोर्ो ने मेरे सार् बहुर् बदर्मीजी की और
सबने मुझे जमीन पर धर्रा कर 8 लोर्ो ने मेरे
सार् बुरा काम ककया। एक आदमी जो र्ांर्े के
पास खड़ा र्ा उसने र्लर् काम नहीं ककया, जब
धचल्लायी र्ो वहां पर दो पुललस वाले
मोटरसाइककल से आये और पुललसवाले उसे
चौकी पर ले र्ये र्र्ा कर्र र्ाड़ी/जीप से र्ाने
ले र्ये। मैं र्ाने पर बाहर बैठी र्ी और उसका
भाई चार बजे सुबह मुझे र्ाने से घर लेकर
र्या।

4- मजीद बयान में पीडड़र्ा का कर्न
है कक वह घटना के बाद स्वयं सड़क पर आ
र्यी, र्भी दुकान की चौकीदारी करने वाला
चौकीदार आ र्या और वह पीडड़र्ा को पुललस
चौकी ले र्या, वहीं दूसरी र्रर् पीडड़र्ा द्वारा
वववेचक को ददए र्ए बयान में कर्न ककया
र्या है कक जब कह धचल्लायी र्ो पुललस वाले
मोटरसाइककल से आ र्ए और उसे चौकी पर
एवं र्ाने पर ले र्ए। इस प्रकार यह दोनों
बयान परस्पर ववरोधाभाषी हैं।

5- पीडड़र्ा के बयान में यह भी आया
है
कक
उसके
धचल्लाने
पर
पुललसवाले
मोटरसाइककल से आ र्ए र्भी, पुललसवालों के
आने पर अलभयुक्र्र्र् भार्े, इसका मर्लब
पुललसवालों ने भी अलभयुक्र्र्र् को भार्र्े हुए
देखा, ककंर्ु न र्ो उन्होंने अलभयुक्र्ों को पीछा
ककया और न ही उनका बयान दजत हुआ कक
उन्होंने ककसी को पहचाना या नहीं।

6-
कधर्र्
पीडड़र्ा
द्वारा
अवर
न्यायालय में पी०िब्लू०-1 के रूप में यह कर्न
ककया है कक हाण्जर अदालर् वसीम, र्ुलर्ाम
उर्त सोनू, शमशाद, शहजाद, अहसान, छोटू उर्त
राजू आररर्, काला पुत्र यामीन, नसीम उर्त
5 All. Chhotu @ Raju Vs. State of U.P.
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ब्रबल्ली को देखकर र्वाह ने कहा कक "इनमें से
कोई भी व्यण्क्र् वह नहीं है ण्जन्होंने मेरे सार्
घटना वाले ददन कब्रिस्र्ान में बुरा काम
(बलात्कार) व बदमीजी की र्ी।" एवं जब र्वाह
को धारा 161 दं०प्र०सं० व मजीद बयान पढकर
सुनाया र्ो र्वाह ने कहा कक "मैनें ऐसा कोई
बयान पुललस वालो को कभी नहीं ददया और ना
ही मैने ककसी पुललस अधधकारी को ककसी भी
मुण्ल्जमान का नाम नहीं बर्ाया मेरा बयान
कैसे ललख ददया मैंंं इसकी कोई वजह नहीं
बर्ा सकर्ी हूं।" इस प्रकार वह अवर न्यायालय
में पक्षद्रोही हो र्यी है।

7- संपूर्त घटनाक्रम को देखर्े हुए
ऐसा प्रर्ीर् हो रहा है कक घटना की प्रार्लमकी
पुललस की लमलीभर्र् से कण्ल्पर् र्थ्यों के
आधार पर ललखवायी र्यी है। जो सांप्रदाययकर्ा
द्वेषभावना व सामाण्जक सद्भाव यनकृष्ट करने
के उद्देश्य से ककया र्या है, चूककं घटना के बाद
भीड़ एकत्र हुयी है, नारेबाजी की र्यी है एवं
र्ाने का घेराव भी ककया र्या है।

8- उनका यह भी कर्न है कक मामले
के जो अलभयुक्र्र्र् संपन्न र्े वो ववधधक
प्रकक्रया के माध्यम से जमानर् पर छूट र्ये,
चूंकक आवेदक र्रीब व्यण्क्र् है एवं उसकी पैरवी
करने वाला कोई व्यण्क्र् उपलब्ध नहीं है।
उनका यह भी कर्न है कक कधर्र् पीडड़र्ा अवर
न्यायालय में ददनांक 12.01.2016 को सत्र
परीक्षर् के दौरान पक्षद्रोही हो र्यी, इसके
बावजूद भी आवेदक र्रीब होने र्र्ा जमानर्
प्रार्तना पत्र न दाखखल कर पाने के कारर् दद०
06.06.2014 से लर्भर् 9 वषो से कारार्ार में
यनरुद्ध है। इसललए आवेदक को जमानर् पर
छोड़ ददया जाय।

9-
मामले
के
केस
िायरी
के
अवलोकन से यह दलशतर् हो रहा है कक मामले
के अन्य सहअलभयुक्र्र्र् को जमानर् लमल
चुकी है। आवेदक का कोई पूवत आपराधधक
इयर्हास भी नहीं है। कधर्र् पीडड़र्ा, सत्र परीक्षर्
के दौरान पक्षद्रोही हो र्यी है। आवेदक को मात्र
पररण्स्र्यर्जन्य र्थ्यों के आधार पर मामले में
नालमर् ककया र्या है। कधर्र् पीडड़र्ा के पूरक
धचककत्सीय आख्या प्रपत्र के अनुसार अलभयोजन
कर्ानक का समर्तन नहीं हो रहा है। उनका यह
भी कर्न है कक मामले के समस्र् र्थ्यों से
प्रदलशतर् हो रहा है कक इस कधर्र् पीडड़र्ा के
मजीद बयान, धारा 161 एवं 164 दं०प्र०सं० के
बयान में ववरोधाभाष है। आवेदक लंबे समय से
जेल में यनरूद्ध है और मामले में र्थ्य के
र्वाहों के साक्ष्य अंककर् हो चुके है, ककंर्ु सत्र
परीक्षर् अभी भी लंब्रबर् है एवं आवेदक के
ववद्वान अधधवक्र्ा ने र्कत प्रस्र्ुर् ककया कक
इसललए आवेदक को जमानर् पर छोड़ ददया
जाय। अवर न्यायालय के आदेश र्लक को
देखने से सत्र परीक्षर् का यनकट भववष्य में
शीघ्र यनस्र्ारर् होने की संभावना नजर नहीं आ
रही है, इसललए आवेदक को जमानर् पर छोड़
ददया जाय।

10- आवेदक के ववद्वान अधधवक्र्ा ने
अपने र्कत के समर्तन Indrani Pratim
Mukerjea
Vs.
Central
Bureau
of
Investigation and another passed in Special
Leave to Appeal (Crl.) No. 1627 of 2022 to
submit that prolonged incarceration of a person
as an under trial is against his fundamental
rights under Article 21 of the Constitution of
India. में माननीय उच्चर्म न्यायालय द्वारा
प्रयर्पाददर् ववधध-व्यवस्र्ा की ओर न्यायालय
का ध्यान आकृष्ट ककया।
452 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES

6. ववद्वान अपर शासकीय अधधवक्र्ा ने
आवेदक के जमानर् का प्रबल ववरोध करर्े हुए
र्कत प्रस्र्ुर् ककया कक आवेदक द्वारा काररर्
अपराध संंंज्ञेय एवं र्ंभीर प्रकृयर् का है,
इसललए आवेदक को जमानर् पर न छोड़ा जाय।

7. मैंने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य का
र्हनर्ापूवतक पररशीलन ककया र्या, आवेदक के
ववद्वान अधधवक्र्ा द्वारा जमानर् आवेदन पत्र
में आवेदक के जेल मे यनरूद्ध होने की यर्धर्
06.06.2014 अंककर् ककया र्या है, ककंर्ु वाद के
सी०िी० अवलोकन से अलभयुक्र् के अलभरक्षा में
लेने की यर्धर् 09.04.2014 अंककर् है र्र्ा उभय
पक्ष के ववद्वान अधधवक्र्ाओं के र्कों पर
सम्यक रूप से ववचार ककया र्या। मेरा अलभमर्
है ककिः-

1- Rajasthan Vs. Balchand alias
Baliay (AIR 2447, 1978) के ऐयर्हालसक र्ैसले
में 1978 के मामले में सटीक रूप से कहा र्या
है कक: "मूल यनयम को शायद जमानर् के रूप
में रखा जा सकर्ा है, जेल नहीं।" इसे आधार
बनाने के ललए भारर् के संववधान के र्हर् एक
अलभयुक्र् को र्ारंटीकृर् अधधकारों पर जोर
ददया। इन अधधकारों में सबसे ववलशष्ट अधधकार
संववधान के अनुच्छेद-21 के र्हर् ददया र्या
अधधकार है। ककसी व्यण्क्र् की दहरासर् उसके
जीवन और स्वर्ंत्रर्ा के अधधकार को प्रभाववर्
करर्ी है और दहरासर् का मुख्य उद्देश्य ब्रबना
ककसी असुववधा के मुकदमे के ललए आरोपी की
आसानी से उपलब्धर्ा सुयनण्श्चर् करना है।

2- इस प्रकार, यदद यह सुयनण्श्चर्
ककया जार्ा है कक अलभयुक्र् ववचारर् चरर् के
ललए आवश्यक होने पर उपलब्ध हो, र्ो व्यण्क्र्
को दहरासर् में लेना अयनवायत नहीं है। इसललए,
यह माना र्या कक अदालर्ों को, ककसी व्यण्क्र्
की धर्रफ्र्ारी से संबंधधर् दंि प्रकक्रया संदहर्ा
(सी०आर०पी०सी०) के प्रावधानों की व्याख्या
करर्े समय, दहरासर् से बचना चादहए जब र्क
कक यह अपररहायत न लर्े और आरोपी को
जमानर् दे देनी चादहए।

3- मानवाधधकार सकक्रयर्ा वपछले
कुछ वषों में अधधक ववकलसर् हुई है और
वर्तमान में जेल में यनरूद्ध ककये जा रहे ककसी
व्यण्क्र् की स्वर्ंत्रर्ा और समाज के दहर् के
बीच संर्ुलन की समझ की आवश्यकर्ा है।
इसललए, दोनों के बीच इस र्रह के संर्ुलन को
बनाए रखने के ललए यह ववचार करना बहुर्
महत्वपूर्त है कक जब र्क कोई मजबूर् आधार
न हो जैसे कक एक अलभयुक्र् के न्याय से
भार्ने की संभावना या उसके द्वारा सबूर्ों से
छेड़छाड़ करने या मामले के र्वाह या पीडड़र्
को धमकी देने की संभावना, ककसी अलभयुक्र्
को दहरासर् में लेने से संववधान के अनुच्छेद -
21 के र्हर् उसे ददए र्ए उसके मौललक
अधधकार यानी जीवन और व्यण्क्र्र्र् स्वर्ंत्रर्ा
के अधधकार का उल्लंघन होर्ा।

4- इसके अलावा, सजा के सुधारवादी
लसद्धांर् का प्रयोर् दंि के दो अन्य लसद्धांर्ों
क्रमश:
यनवारक
लसद्धांर्
और
दंिात्मक
लसद्धांर् के बीच संर्ुलन बनाए रखने के ललए
समान रूप से महत्वपूर्त है। सुधारवादी लसद्धांर्
का मुख्य उद्देश्य एक अलभयुक्र् को सुधारना
और उसे जेल में आदर्न अपराधधयों से दूर
रखना है, ण्जन्हें अपराधों की ववववधर्ा माना
जार्ा है।

5- यह लसद्धांर् इस धारर्ा पर
आधाररर् है कक दंि एक यनवारक के बजाय
अधधक उपचारात्मक होना चादहए। इस प्रकार के
5 All. Chhotu @ Raju Vs. State of U.P.
453
लसद्धांर् के र्हर् ककसी अपराध को एक बीमारी
माना जार्ा है ण्जसे मारने से ठीक नहीं ककया
जा सकर्ा है; बण्ल्क इस र्रह के रोर् को
'सुधार की प्रकक्रया' (process of reformation) के
नाम की दवा की सहायर्ा से ठीक ककया जा
सकर्ा है।

6- इसके अलावा, सुप्रीम कोटत द्वारा
अनेश कुमार बनाम ब्रबहार राज्य (A.I.R 1277
OF 2014) के मामले में पाररर् ऐयर्हालसक
र्ैसले में, उच्चर्म न्यायालय ने धर्रफ्र्ारी से
पहले और धर्रफ्र्ारी के बाद पुललस की
शण्क्र्यों पर कई यनयंत्रर् और संर्ुलन लर्ाए।
माननीय उच्चर्म न्यायालय ने देश भर की
सभी राज्य सरकारों को यनदेश ददया कक वे
पुललस अधधकाररयों को यनदेश दें कक वे मामले
के सभी र्थ्यों और पररण्स्र्यर्यों की जांच ककए
ब्रबना ककसी आरोपी को धर्रफ्र्ार न करें और
धर्रफ्र्ारी से पहले प्रारंलभक जांच करें।

7- एक सावतभौलमक सत्य यह भी है
कक धर्रफ्र्ारी अपने सार् बहुर् अपमान भी
लार्ी है, ककसी की स्वर्ंत्रर्ा को कम करर्ी है
और एक अलभयुक्र् के चररत्र पर हमेशा के ललए
एक यनशान छोड़ जार्ी है। एक जेल में बंद
अलभयुक्र् अपनी नौकरी/ प्रयर्ष्ठा खो देर्ा है।
इस र्रह उसकी नजरबंदी का बोझ उसके
पररवार के यनदोष सदस्यों पर भी पड़र्ा है।
ण्स्र्यर् र्ब और भी खराब हो जार्ी है जब जेल
में बंद व्यण्क्र् पररवार में एकमात्र कमाने वाला
होर्ा है और उसके कारावास से उसके यनदोष
आधिर्ों को अनावश्यक पीड़ा होर्ी है।

8. इस प्रकार उपरोक्र् अलभमर् के
मद्देनजर आवेदक के ववद्वान अधधवक्र्ा के
र्कों के पररप्रेक्ष्य में पत्रावली पर उपलब्ध
सारवान र्थ्यों एवं पररण्स्र्यर्यों का समग्र रूप
से अवलोकन करने के बाद, सबूर्ों की प्रकृयर्
और ककसी भी ठोस ववरोधात्मक सामग्री की
अनुपण्स्र्यर् एवं उपलब्ध सामग्री से छेड़छाड़ की
संभावना न होने के र्थ्य को देखर्े हुए मेरी
राय में आवेदक को जमानर् पर मुक्र् करने
का उपयुक्र् आधार है।

9. अर्िः वाद के र्ुर्-दोष पर ब्रबना कोई
दटप्पर्ी ककए हुए आवेदक को उपरोक्र् वखर्तर्
अपराध में संबंधधर् न्यायालय की संर्ुण्ष्ट पर
व्यण्क्र्र्र् बंध-पत्र एवं उसी धनरालश के दो
स्र्ानीय प्रयर्भू प्रस्र्ुर् करने पर यनम्नललखखर्
शर्ों के सार् जमानर् पर छोड़ ददया जाय।

1. आवेदक वववेचना या परीक्षर् के
दौरान अलभयोजन साक्ष्यों के सार् छेड़छाड़ नहीं
करेर्ा।

2. आवेदक अलभयोजन साक्षक्षयों व
पीडड़र्ा/ लशकायर्कर्ात को िरायेर्ा/धमकायेर्ा
नहीं।

3. आवेदक न्यायालय के आदेशों का
पालन करेर्ा, वह परीक्षर् के दौरान ब्रबना कोई
अनावश्यक स्र्र्न ललए यनयर् यर्धर् पर
न्यायालय में उपण्स्र्र् होर्ा र्र्ा परीक्षर् में
ईमानदारी से सहयोर् करेर्ा।

4. आवेदक जमानर् पर ररहा होने के
बाद जमानर् की स्वर्ंत्रर्ा का दुरूपयोर् नही
करेर्ा और ककसी भी अपराधधक र्यर्ववधध में
ललप्र् नहीं होर्ा न कोई अपराधधक कृत्य
करेर्ा।

5. आवेदक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप
से मामले के र्थ्यों से पररधचर् ककसी भी
व्यण्क्र् या पुललस अधधकाररयों को कोई प्रलोभन
454 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
या धमकी नहीं देर्ा न ही उनसे कोई वायदा
करेर्ा, ण्जसके कारर् उन्हें न्यायालय में र्थ्यों
को उजार्र करने से ववरर् रहना पिे
ी़
।

उपरोक्र् शर्ों में से ककसी के
उल्लंघन के मामले में, परीक्षर् न्यायालय
आवेदक की जमानर् यनयमानुसार रद्द करने
को स्वर्ंत्र है।

10. यह बहुर् ही आश्चयतजनक है कक
कधर्र् पीडड़र्ा ददनांक 12.01.2016को अवर
न्यायालय में पक्षद्रोही हो र्यी र्र्ा अवर
न्यायालय में यह वाद ववर्र् 9 वषों से ववचारर्
में चल रहा है, अभी र्क सत्र परीक्षर् का
यनस्र्ारर् नहीं हुआ है। इस ववलंब का
खालमयाजा आवेदक को भुर्र्ना पड़ रहा है।
जबकक न्याययक प्रकक्रया का लसंद्धार् है कक सौ
अपराधी भले छूट जाय, ककंर्ु एक यनदोष
व्यण्क्र् को सजा नहीं होनी चादहए। इसललए
मामले के र्थ्यों एवं पररण्स्र्यों को देखर्े हुए
अवर न्यायालय को यनदेलशर् ककया जार्ा है कक
इस मामले से संबंधधर् सत्र परीक्षर् का
यनस्र्ारर् ददन प्रयर् ददन सुनवाई के आधार पर
आज से 06 माह के अंदर करना सुयनण्श्चर्
ककया जाय।
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(2023) 5 ILRA 454
APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: LUCKNOW 19.05.2023

BEFORE

THE HON'BLE ATTAU RAHMAN MASOODI, J.
THE HON'BLE OM PRAKASH SHUKLA, J.

Criminal Appeal Defective No. 124 of 2023

Sarfaraz Ali Jafri ...Appellant
Versus
State of U.P. ...Respondent
Counsel for the Appellant:
Ajeet Pratap Singh, Zia Ul Qayuim

Counsel for the Respondent:
G.A.

Civil Law - National Investigation Agency
Act, 2008-Section 21-Appeal filed after delayArticle 21 of the Constitution cannot be silenced
under any circumstance-any statutory restriction
is subservient to the mandate of part-III of the
Constitution-section 21 mandates the High
Court to decide every appeal filed under subsection (1) , whereas IInd proviso appended to
sub-section (5) oust the jurisdiction of the High
Court beyond 90 days-two provisions had to
read harmoniously.

Application
for
condonation
of
delay
allowed. (E-9)

List of Cases cited:

1. National Investigation Agency through its
Chief Investigating Officer, Jammu versus 3rd
Additional Sessions Judge District Court Jammu
& Delhi High Court in the case of Farhan Shaikh
versus
St.(National
Investigation
Agency)
reported in 2019 SCC OnLine Del 9158

2. Nasir Ahmad Vs National Investigation
Agency 2015 SCC Online Ker 39625

3. Sheikh Rahamtulla & ors. Vs National
Investigation Agency reported in 2023 SCC
Online Cal 493.

4.
In
Re
Provision
of
Section
14A
of
SC/ST(Prevention of Atrocities Amendment Act,
2005 versus Nil along with other connected
matters in Criminal Writ Public Interest Litigation
No. 8 of 2018

5. St.(NIA) versus Farhan Shaikh-Special Leave
Petition(Criminal) Diary No(s). 41439 of 2019 on
2.12.2019.

6. Messrs. Mela Ram & Sons Vs Commissioner
of Income Tax, Punjab, 1956 SC 367 AIR

7. U.O.I. Vs K.A. Najeeb reported in (2021)3
SCC 713