# Constable Rinku Kumar v. State of U.P. & Ors

- **Citation:** (2020) 8 ILRA 110
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2020-02-19
- **Case number:** Writ A No. 38612 of 2017
- **Bench:** Saurabh Shyam Shamshery
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/constable-rinku-kumar-v-state-of-u-p-ors-45945
- **Pages:** 8

## Headnote

A. Service Rule - Constitution of India -
Article 226 - Departmental/Disciplinary
Enquiry - The role of the Court in the matter
of departmental proceedings is very limited
8 All. Constable Rinku Kumar Vs. State of U.P. & Ors.
111
and the Court cannot substitute its own views
or findings by replacing the findings arrived at
by the authority on detailed appreciation of
the evidence on record. (Para 13)

It cannot be said that the inquiry proceeding
is vitiated or that there is any violation of
principles of natural justice, as the prescribed
rules/due procedure has been followed and
ample time and opportunity was granted to
the petitioner to file his reply to the charges.
Punishment awarded has also not been found
to be disproportionate to the charges. (Para
15, 16, 17)

Writ Petition dismissed. (E-4)

Precedent followed:

## Text

110 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
herein above, we may, as a ready
reference, summarise the following few
situations, wherein recoveries by the
employers, would be impermissible in
law:

(i) Recovery from employees
belonging to Class-III and Class-IV
service (or Group 'C' and Group 'D'
service).

(ii)
Recovery
from
retired
employees, or employees who are due to
retire within one year, of the order of
recovery.

(iii) Recovery from employees,
when the excess payment has been made
for a period in excess of five years,
before the order of recovery is issued.

(iv) Recovery in cases where an
employee has wrongfully been required
to discharge duties of a higher post, and
has been paid accordingly, even though
he should have rightfully been required
to work against an inferior post. '

(v) In any other case, where the
Court arrives at the conclusion, that
recovery if made from the employee,
would be iniquitous or harsh or arbitrary
to such an extent, as would far outweigh
the equitable balance of the employer's
right to recover."

(10) The specific pleading and
submission on behalf of the petitioner is
that prior to the passing of the impugned
order,
at
no
point
of
time,
any
opportunity
was
provided
to
the
petitioner, the same has neither been
denied, nor disputed in the counter
affidavit. The position as emerges from
the record is that there is no allegation of
misrepresentation or fraud on the part of
the petitioner in the matter.

(11) The order for deduction from
the gratuity has been passed unmindful of
the Provisions of Gratuity Act, 1972,
which does not permit recovery from the
gratuity amount except with certain
exception. The case of the petitioner does
not fall under those exceptions.

(12) In view of the discussion held
hereinabove, the impugned order dated
21.01.2016 cannot be sustained and it is
set aside and the opposite parties are
directed to release the amount of
Rs.2,48,673/- with 7% interest to the
petitioner, calculated w.e.f. 31.01.2015
i.e. the date of retirement of the petitioner
till the date of actual payment made. The
opposite parties are further directed to
make payment within a period of three
months from the date of service of the
copy of this order.

(13) The writ petition is accordingly
allowed. No order as to the costs.
----------
(2020)08ILR A110
ORIGINAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 19.02.2020

BEFORE
THE HON'BLE SAURABH SHYAM
SHAMSHERY, J.

Writ A No. 38612 of 2017

Constable Rinku Kumar ...Petitioner
Versus
State of U.P. & Ors. ...Respondents

Counsel for the Petitioner:
Sri Mohammad Umar Khan

Counsel for the Respondents:
C.S.C.

A. Service Rule - Constitution of India -
Article 226 - Departmental/Disciplinary
Enquiry - The role of the Court in the matter
of departmental proceedings is very limited
8 All. Constable Rinku Kumar Vs. State of U.P. & Ors.
111
and the Court cannot substitute its own views
or findings by replacing the findings arrived at
by the authority on detailed appreciation of
the evidence on record. (Para 13)

It cannot be said that the inquiry proceeding
is vitiated or that there is any violation of
principles of natural justice, as the prescribed
rules/due procedure has been followed and
ample time and opportunity was granted to
the petitioner to file his reply to the charges.
Punishment awarded has also not been found
to be disproportionate to the charges. (Para
15, 16, 17)

Writ Petition dismissed. (E-4)

Precedent followed:

1. Sanjay Kumar Singh Vs U.O.I. & ors.,
(2011) 14 SCC 692 (Para 13 (i))

2. Lalit Popli Vs. Canara Bank, (2003) 3 SCC
583 (Para 13 (ii))

Petition assails orders dated 13.05.2016,
passed by Senior Superintendent of Police,
District Moradabad; 03.11.2016, passed by
Deputy
Inspector
General
of
Police,
Moradabad Zone, Moradabad and order
dated 31.01.2019, passed by Inspector
General of Police, Bareilly Zone.

(Delivered by Hon'ble Saurabh Shyam
Shamshery, J.)

१. याची आरक्षी ना0पु0 ररिंकू कुमार ने
वर्तमान याचचका के माध्यम से वररष्ठ पुलिस
अधीक्षक, जनपद मुरादाबाद द्वारा पाररर् आदेश
ददनााँक १३.५.२०१६, जजससे द्वारा याची को १०
ददवस के वेर्न के समर्ुल्य अर्तदण्ड से दजण्डर्
ककया गया र्ा र्र्ा पुलिस उपमहाननररक्षक,
मुरादाबाद पररक्षेत्र, मुरादाबाद द्वारा पाररर्
आदेश ददनािंक ३.११.२०१६, जजससे द्वारा याची
द्वारा दायर की गई अपीि ननरस्र् कर दी गई र्ी
र्र्ा पुलिस महाननररक्षक, बरेिी जोन द्वारा
पाररर् आदेश ३१.१.२०१९, जजसके द्वारा याची
द्वारा दायर की गई पुनरीक्षण याचचका अस्वीकार
कर दी गई र्ी, आक्षेपपर् ककये गये है।

२. सिंक्षेप मे प्रकरण के र्थ्य है कक,
क्षेत्राचधकारी, कोर्वािी, जनपद, मुरादाबाद ने
इस प्रकरण में याची व अन्य के पवरूद्ध
प्रारजभिक जािंच आख्या ददनािंक ३०.९.२०१४,
वररष्ठ पुलिस अधीक्षक को प्रेपिर् की, जजसमें
ननभन आरोप व जािंच के उपरान्र् ननभन ननष्कित
को उल्िेखिर् ककया गया र्ा।

आरोप

" मान0 न्यायािय में पवचाराधीन
किलमनि लमस सिं0 11/07 के अन्र्गतर् धारा 446
द0 प्र0सिं0 र्ाना लसपवि िाइन से सभबजन्धर्
प्रकरण में जालमनान 1. अब्दुि शरीफ पुत्र अब्दुि
रशीद ननवासी िाि मजस्जद र्ाना कोर्वािी
मुरादाबाद 2. नवाब अिी पुत्र अब्दुि रशीद
ननवासी र्भबाकू स्रीट र्ाना कोर्वािी से
जमानर् धनरालश वसूि कराकर मान0 न्यायािय
में दाखिि करने, बार-बार वसूिी अचधपत्र िेजे
जाने के उपरान्र् र्ाना प्रिारी द्वारा भ्रामक
ररपोटत प्रेपिर् करने सभबन्धी आरोप अिंककर् ककये
गये।"

ननष्कित

"सभपूणत जाचिं से यह पाया कक मान0
न्यायािय में पवचाराधीन किलमनि लमस सिं0
11/07 के अन्र्गतर् धारा 446 द0प्र0सिं0 र्ाना
लसपवि िाइन से सभबजन्धर् प्रकरण में जालमनान
1. अब्दुि शरीफ पुत्र अब्दुि रशीद ननवासी िाि
मजस्जद र्ाना कोर्वािी मुरादाबाद 2. नवाब
अिी पुत्र अब्दुि रशीद ननवासी र्भबाकू स्रीट
र्ाना कोर्वािी से जमानर् धनरालश वसूि कर
मान0 न्यायािय में दाखिि करने हेर्ु ददनािंक
112 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
25.10.07, 11.01.12, 18.01.13, 05.02.13,
25.02.13, 25.02.13, 29.3.13, 07.06.13,
08.11.13, 16.01.14 को ननगतर् ककये गये वसूिी
अचधपत्र के सभबन्ध में जमानर्दारो के पर्े को
र्ाना कोर्वािी द्वारा सत्यापपर् ककया गया र्ा
परन्र्ु बाद में यह आख्या प्रेपिर् की जाने िगी कक
जमानदारों का पर्ा नहीिं िग पा रहा है। यह िी
उल्िेिनीय है कक प्रिारी ननरीक्षक की आख्या
ददनािंक 30.6.2014 के अनुसार मान0 न्यायािय
के ननदेश 11.06.2014 के अनुपािन में उक्र्
दोनों जमानर्दारो की र्िाश की गयी र्ो
जालमनान नवाब अिी पुत्र अशरफ अिी नन0
र्भबाकू स्रीट र्ाना कोर्वािी का, वर्तमान में
श्रीमर्ी फूिजहााँ पत्नी इब्रादहम ननवासी घोलसयान
मजस्जद के पास गिी निं0 7 चक्कर की लमिक
र्ाना लसपवि िाइन में रहना पाया गया।

यदद र्ाना कोर्वािी के कमतचाररयों
द्वारा मान० न्यायािय के पूवत आदेशों को
गभिीरर्ा से िेकर जालमनान की र्िाश की जार्ी
र्ो पूवत में ही जालमनान के सभबन्ध में ररपोटत
मान० न्यायािय प्रेपिर् की जा सकर्ी र्ी र्र्ा
मान० न्यायािय को इर्ने अचधपत्र ननगतर् करने
की आवश्यकर्ा प्रर्ीर् नहीिं होर्ी, परन्र्ु ऐसा
प्रर्ीर् होर्ा है कक र्ाना कोर्वािी के उक्र्
कमतचाररयों द्वारा मान० न्यायािय के आदेशों को
गभिीरर्ा से नहीिं लिया जो उनकी जस्र्ि
कायतप्रणािी एविं िापरवाही का पररचायक है
जजसके लिए मौ0 आररफ िान उ0नन0 हाि
र्ैनार्ी र्ाना कटघर, श्री बी0एि0 यादव उ0नन0
र्ाना कोर्वािी, श्री अख्र्र अिी हे0कािं0 पी0
र्ाना कोर्वािी, आरक्षी ररिंकू कुमार एविं आरक्षी
चगररराज लसिंह र्ाना कोर्वािी दोिी है।" (रेिािंकन
न्यायािय द्वारा ककया गया है)

जााँच आख्या में यह िी बर्ाया गया
कक याची को उसके बयान दजत कराने के लिए कई
बार मौखिक व लिखिर् रुप से बुिाया गया र्ा,
परन्र्ु याची ने अपना ब्यान दजत नहीिं कराया।

३. उक्र् जााँच आख्या के आधार पर, वररष्ठ
पुलिस अधीक्षक, जनपद मुरादाबाद ने याची को
'कारण बर्ाओ नोदटस', ददनािंक ५.१०.२०१५, को
ननगतर् ककया, जजसमें याची पर ननभन कृर् में
िापरवाही, उदासीनर्ा एविं अकमतण्यर्ा का आरोप
िगाया गया।

" वित 2014 में जब आप जनपद
मुरादाबाद में र्ाना कोर्वािी पर ननयुक्र् र्े र्ब
मा0 न्यायािय में पवचाराधीन किलमनि लमस
सिं0 11/07 के अन्र्गतर् धारा 446 द0प्र0सिं0
र्ाना लसपवि िाइन से सभबजन्धर् प्रकरण में
जालमनान 1. अब्दुि शरीफ पुत्र अब्दुि रशीद,
ननवासी
िाि
मजस्जद
र्ाना
कोर्वािी,
मुरादाबाद, 2. नवाब अिी पुत्र अशरफ अिी,
ननवासी र्भबाकू स्रीट र्ाना कोर्वािी से जमीन
धनरालश वसूि कर मा0 न्यायािय में दाखिि
करने हेर्ू िगार्ार वसूिी अचधपत्र ननगतर् ककये
जा रहे र्े और इन वसूिी अचधपत्रों पर
जमानर्दारों के पर्े र्ाना कोर्वािी द्वारा
सत्यापपर् ककये गये र्े, परन्र्ु बाद में आपके
समय में ननगतर् वसूिी अचधपत्रों पर यह भ्रामक
आख्या प्रेपिर् की जाने िगी कक जमानर्दारों का
पर्ा नहीिं िग पा रहा है। जबकक प्रिारी ननरीक्षक
कोर्वािी की आख्या ददनािंककर्

30.6.2014 के अनुसार जालमनान
नवाब अिी पुत्र अशरफ अिी, ननवासी उपरोक्र्
वर्तमान में श्रीमर्ी फूि जहााँ पत्नी इब्राहीम,
8 All. Constable Rinku Kumar Vs. State of U.P. & Ors.
113
ननवासी घोलसयान मजस्जद के पास, गिी निं0 7
चक्कर की लमिक र्ाना लसपवि िाइन में रहना पाया
गया। यदद आपके द्वारा मा0 न्यायािय के पूवत के
आदेशों को गभिीरर्ा से िेकर जालमनान की र्िाश
की जार्ी र्ो पूवत में ही जालमनान के सभबन्ध में
ररपोटत मा0 न्यायािय प्रेपिर् की जा सकर्ी र्ी।
भ्रामक आख्या प्रेपिर् ककये जाने पर मा0 न्यायािय
द्वारा कडी आपपि प्रकट करने पर प्रकरण में
सभपाददर् कराई गई प्रारजभिक जााँचख्या में आपकी
लशचर्ि कायतप्रणािी एविं िापरवाही पररिक्षक्षर् हुई
है। अर्ः मा0 न्यायािय से ननगतर् अचधपत्रों पर बबना
छानबीन ककये िापरवाही से ररपोटत िगाकर मा0
न्या0 को वापस कर देना आपके अपने कर्तव्यपािन
के प्रनर् घोर िापरवाही, उदासीनर्ा एविं अकमतण्यर्ा
का पररचायक है।

अर्ः आपको यह कारण बर्ाओ
नोदटस इस ननदेश के सार् ननगतर् ककया जा रहा है
कक आप इस नोदटस की प्राजतर् के 15 ददवस के
अन्दर अपना लिखिर् स्पष्टीकरण इस कायतिय
में अचधकाररयों की (दण्ड एविं अपीि) ननयमाविी-
1991 के ननयम -14(2) के अन्र्गतर् 10 ददवस के
वेर्न के समर्ुल्य अर्तदण्ड से दजण्डर् कर ददया
जाये। यदद आपका लिखिर् स्पष्टीकरण ननधातररर्
अवचध में इस कायातिय में प्रातर्हो जार्ा है र्ो उस
पर पूणत सहानुिूनर्पूवतक पवचार करर्े हुए अजन्र्म
आदेश पाररर् ककये जायेंगे। यदद आपका लिखिर्
स्पष्टीकरण ननधातररर् अवचध में इस कायातिय में
प्रातर् नहीिं होर्ा है र्ो पत्राविी पर उपिब्ध
अलििेिों एविं गुण -दोि के आधार पर ननणतय िेर्े
हुए एक पक्षीय अजन्र्म आदेश पाररर् कर ददये
जायेंगे। यदद आप पत्राविी का अविोकन करना
चाहर्े है र्ो ननधातररर् अवचध में ककसी िी कायत
ददवस में पत्राविी का अविोकन कर सकर्े हैं।"
(रेिािंकन न्यायािय द्वारा ककया गया है। )

४. उक्र् वखणतर् 'कारण बर्ाओ नोदटस' का
स्पष्टीकरण याची ने ददया र्र्ा नोदटस वापस
िेने की प्रार्तना की। याची ने कहा कक प्रकरण के
सभबजन्धर् बीट क्षेत्र जो र्भबाकू स्रीट व िाि
मजस्जद क्षेत्र में र्ा वो याची को आविंदटर् नहीिं र्ा।
वरन् अन्य आरक्षी को आविंदटर् र्ा। स्पष्टीकरण
का मुख्य अिंश ननभन है -

"2.
श्रीमान
जी
सम्मान
स्पष्टीकरणदाता स्पष्टीकरण के माध्यम से
उपरोक्त आरोप के सम्बंध में अवगत कराना
चाहता है स्पष्टीकरण दाता की ननयुक्क्त थाना
कोतवाली पर बीट नई बस्ती फीलखाना क्षेत्र
आवंटटत थे, जो कक बीट क्षेत्र आवंटटत का थाना
कोतवाली नई बस्ती चौकी क्षेत्र का आवंटटत
नक्सा संलग्न स्पष्टीकरण है जो कक ननदोश
साबबत होने का अभिलेखीय साक्ष्य है कारण
बताओ नोटटस में उक्त प्रकरण से सम्बक्धधत बीट
क्षेत्र तम्बाकू स्रीट व लाल मक्स्जद क्षेत्र अंककत है,
हो अधय आरक्षक्षयों को आवंटटत है इस सम्बधध में
प्रारक्म्िक जांच अधधकारी महोदय ने कोई जांच
नहीं की है, प्रारक्म्िक जांच अधधकारी महोदय को
चाटहए था कक स्पष्टीकरणदाता के कथन अंककत
करते आवंटटत बीट क्षेत्र के सम्बनध में जानकारी
अंककत करते तथा सम्बक्धधत बीट क्षेत्र वाले
आरक्षक्षयों के िी कथन अंककत करके प्रश्नोत्तर
करते तथा बीट क्षेत्र नक्से का अवलोकन करते
तब आरोप अंककत करने चाटहए थे, प्रारक्म्िक
जांच अधधकारी महोदय ने ऐसा नहीं ककया अपने
मनमाने तरीके से बबना बचाव का अवसर प्रदान
ककये आरोप अंककत कर टदया क्जसका पुक्ष्ट का
कारक साक्ष्य पत्रावली पर उपलब्ध नहीं है। इस
पररपेक्ष में िी स्पष्टीकरण दाता को प्राप्त कारण
114 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
बताओ नोटटस का स्पष्टीकरण स्वीकार करने का
पयााप्त आधार है।"

५. वररष्ठ पुलिस अधीक्षक, जनपद
मुरादाबाद, ने याची द्वारा ददये गये स्पष्टीकरण
व पत्राविी पर उपिब्ध अलििेिों के पररशीिन
के उपरान्र् स्पष्टीकरण को असिंर्ोिजनक पाया
र्र्ा याची को १० ददवस के वेर्न के समर्ुल्य
अर्तदण्ड से दजण्डर् ककये जाने का आदेश ददनािंक
१३.०५.१६ को पाररर् ककया। इस आदेश में वररष्ठ
पुलिस अधीक्षक ने स्पष्ट रुप से कहा ककः-

"क्योंकक आरोपपर् आरक्षी द्वारा यदद
जालमनान अब्दुि शरीफ पुत्र अब्दुि रशीद
ननवासी िाि मजस्जद र्ाना कोर्वािी एविं नवाब
अिी पुत्र अब्दुि रशीद ननवासी र्भबाकू स्रीट से
जमानर् धनरालश वसूि कर माननीय न्यायायि
में दाखिि ककये जाने हेर्ु ननगतर् ककये गये वसूिी
अचधपत्र के सिंबिंध में मा0 न्यायािय के पूवत
आदेशों को गभिीरर्ा से िेकर जालमनान की
र्िाश की जार्ी र्ो पूवत में जालमनान के सिंबिंध में
ररपोटत माननीय न्यायािय के आदेशनुसार हो
जार्ी र्ो माननीय न्यायािय को पवलिन्न
नर्चर्यों में इर्ने अचधपत्र ननगतर् करने की
आवश्यकर्ा नहीिं होर्ी र्र्ा आरोपी आरक्षी को
अन्य बीट आरक्षी के िी प्रकरण की गभिीरर्ा को
देिर्े हुए जानकारी करनी चादहए र्ी, ककन्र्ु
आरोपी द्वारा ऐसा नहीिं ककया गया।"(रेिािंकन
न्यायािय द्वारा ककया है।)

६. उपरोक्र् आदेश के पवरुद्ध, याची ने उ0
प्र0 पुलिस अधीनस्र् श्रेणी के पुलिस अचधकाररयों
की दण्ड एविं अपीि ननयमाविी १९९१, के ननयम
२० के अन्र्गतर् अपीि, पुलिस उपमहाननररक्षक,
मुरादाबाद पररक्षेत्र, के समक्ष पेश की जजसमें
मुख्य रुप से कर्न ककया :-

"श्रीमान
जी
सभमान
सदहर्
प्रार्ी/अपीिार्ी अपीि के माध्यम से उपरोक्र्
आरोप के सभबन्ध में अवगर् कराना चाहर्ा है कक
प्रार्ी/अपीिार्ी स्पष्ट करना चाहर्ा है कक श्रीमान
प्रा0 जािंच अचधकारी महोदय ने प्रा0 जािंच के
दौरान न ही र्ो र्ाना प्रिारी ननरीक्षक के कर्न
अिंककर् ककये है और न ही सभबजन्धर् बीट
आरक्षक्षयों के कर्न अिंककर् ककये है, न ही ककसी
स्वर्न्त्र साक्षी से यह जानने का प्रयास ककया की
जामीनान अब्दुि शरीफ ननवासी िाि मजस्जद व
नबाव अिी र्भबाकू स्रीट कोर्वािी क्षेत्र में रहर्े
है या नहीिं रहर्े है, यह िी जानने का प्रयास नहीिं
ककया जािंच का मर्िब होर्ा है मौके पर जाकर के
जानकारी हालसि करना िगाये गये आरोपों की
पुजष्ट करना प्रा0 जािंच अचधकारी महोदय ने न र्ो
मौके पर जाकर जािंच की है और िगाये गये
आरोपों के सभबन्ध में पुजष्ट कारक साक्ष्य
पत्राविी में शालमि नहीिं ककया है, ननदोि साबबर्
होने का चौकी क्षेत्र से सभबजन्धर् बीट आविंदटर्
नक्सा की छाया प्रनर् सिंिग्न है,जो कक ननदोि
साबबर् होने का अलििेिीय साक्ष्य पत्रािी पर
उपिब्ध है, इस पररपेक्ष्य में िी प्रार्ी/अपीिार्ी
की अपीि स्वीकार ककये जाने का पयातर् आधार
है।"

७. उपरोक्र् अपीि को पुलिस उप
महाननररक्षक, मुरादाबाद पररक्षेत्र मुरादाबाद, ने
अपने आदेश ददनािंक ३.११.२०१६ द्वारा अस्वीकार
कर दी। इस आदेश में याची के र्कत कक वर्तमान
प्रकरण बीट क्षेत्र र्भबाकू स्रीट का र्ा, जो अन्य
आरक्षक्षयों को आविंदटर् र्ा, पर पवचार ककया गया
8 All. Constable Rinku Kumar Vs. State of U.P. & Ors.
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र्र्ा उक्र् र्कत को अमान्य,ननभन शब्दों में
ककया:-

"याची आरक्षी का यह र्कत कक र्भबाकू
स्रीट क्षेत्र अन्य िी आरक्षक्षयों को आविंदटर् र्ा,
बिहीन होने के कारण मान्य नहीिं है। याची
आरक्षी को प्रकरण की प्ररिंलिक जािंच के मध्य
जािंचकर्ात अचधकारी के समक्ष यह र्कत प्रस्र्ुर्
करने चादहए र्े र्ाकक जािंच से इस सभबन्ध में
जस्र्नर् स्पष्ट हो पार्ी परन्र्ु प्रारिंलिक जािंच
अचधकारी द्वारा ननदेलशर् ककये जाने के बाद िी
याची आरक्षी द्वारा जािंच के मध्य अपने कर्न
अिंककर् नहीिं कराये गये। याची आरक्षी द्वारा
अपनी
अपीि
के
सार्
िी
ऐसा
कोई
साक्ष्य/अलििेि प्रस्र्ुर् नहीिं ककया गया है जजससे
की बीट क्षेत्र र्भबाकू स्रीट अन्य आरक्षक्षयों को
आविंदटर् होने सभबन्धी उसके र्कत की पुजष्ट हो
सके। " (रेिािंकन न्यायािय द्वारा ककया गया है
।)

८. याची ने उक्र् आदेश के पवरुद्ध
पुनररक्षण याचचका, पुलिस महाननररक्षक, बरेिी
क्षेत्र, बरेिी, के समक्ष पेश की, जो ददनािंक
३१.१.२०१७ को ननरस्र् कर दी गयी। आदेश में
प्रमुि रुप से कहा गया कक-

" पुनरीक्षणकर्ात का र्कत मान्य नहीिं
है। प्रस्र्ुर् पत्राविी पर उपिब्ध अलिल्िों के
पररशीिन से यह पाया गया कक मा0 न्यायािय में
पवचाराधीन किलमनि लमस सिं0 11/07 के
अन्र्गतर् धारा 146 द0 प्र0सिं0 र्ाना लसपवि
िाइन से सभबजन्धर् प्रकरण में जालमनान 1.
अब्दुि शरीफ पुत्र अब्दुि रशीद, ननवासी िाि
मजस्जद र्ाना कोर्वािी, मुरादाबाद 2. नवाब
अिी पुत्र अशरफ अिी, ननवासी र्भबाकू स्रीट
र्ाना कोर्वािी से जमानर् धनराशी वसूि कर
मा0 न्यायािय में दाखिि करने हेर्ु िगार्ार
वसूिी अचधपत्र ननगतर् ककये जा रहे र्े और इन
वसूिी अचधपत्रों पर जमानर्दारों के पर्ा र्ाना
कोर्वािी द्वारा सत्यापपर् ककये गये र्े, परन्र्ु
बाद में इनके समय में ननगतर् वसूिी अचधपत्रों पर
यह भ्रामक आख्या प्रेपिर् की जाने िगी कक
जमानर्दारों का पर्ा नहीिं िग पा रहा है, जबकक
प्रिारी ननरीक्षक, कोर्वािी की आख्या ददनािंककर्
30.6.2014 के अनुसार जालमनान नवाब अिी
पुत्र अशरफ अिी ननवासी उपरोक्र् वर्तमान में श्री
फूजहााँ पत्नी इब्राहीम, ननवासी घोलसयान मजस्जद
के पास गिी निं0 7 चक्कर की लमिक र्ाना
लसपवि िाईन्स में रहना पाया गया। यदद
पुनरीक्षणकर्ात द्वारा मा0 न्यायािय के पूवत के
आदेशों को गभिीरर्ा से लिया जार्ा, र्ो पूवत में ही
जालमनान के सभबन्ध में सही ररपोटत मा0
न्यायािय प्रेपिर् की जा सकर्ी र्ी। भ्रामक
आख्या प्रेपिर् ककये जाने पर मा0 न्यायािय
द्वारा कडी आपपि प्रकट की गयी। इस प्रकार
पुनरीक्षणकर्ात द्वारा बरर्ी गयी िापरवाही की
पुजष्ट होर्ी है, अर्ः पुनरीक्षणकर्ात का र्कत मात्र
बचाव ध्येय से प्रेररर् है।" (रेिािंकन न्यायािय
द्वारा ककया गया है)

९. उपरोक्र् आदेश ददनािंक १३.५.२०१६,
३.११.२०१६ व ३१.१.२०१६ से क्षुब्ध होने के कारण
याची ने वर्तमान याचचका इस न्यायािय में दायर
की है। प्रनर्शपर् पत्र व प्रत्युिर शपर् पत्र दाखिि
ककये जा चुके है।

१०. याची के पवद्वान अचधवक्र्ा श्री
मोहभमद उमर िााँ ने कर्न ककया कक याची के
पवरुद्ध समस्र् कायतवाही नैसचगतक न्याय के
116 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
लसद्धान्र्ों के पवरुद्ध की गई है। याची को बीट
नई बस्र्ी फीििाना क्षेत्र आविंदटर् र्ा जब कक प्रकरण
से सभबजन्धर् बीट क्षेत्र र्भबाकू स्रीट से र्ा। जो अन्य
आरक्षक्षयों को आविंदटर् र्ा। याची के पवद्वान
अचधवक्र्ा अपने कर्न के समर्तन में ड्यूटी र्ालिका
का अविोकन िी कराया जो प्रस्र्ुर् याचचका के सार्
सिंिग्न की गई है। जजसमें फीििाना में आविंदटर्
अपराचधयों के नाम उल्िेखिर् है। परन्र्ु र्भबाकू
स्रीट के आविंदटर् अपराचधयों की सूची उपरोक्र्
र्ालिका में नहीिं दशातयी गई है। अन्र् में अचधवक्र्ा ने
कर्न ककया कक याची की नौकरी साफ छपव वािी रही
है व उसकी दटतपणी उत्कृष्ठ एविं उिम रही है।

११. याची के र्कों का पवरोध करर्े हुए
सरकार के स्र्ाई अचधवक्र्ा ने कर्न ककया कक
याची के पवरुद्ध ३ आदेश है जो र्थ्यों व पवचध पर
समविी है। आक्षेपपर् आदेशों में याची के समस्र्
र्कों पर पवचार ककया गया है। याची का कृत्य,
कर्तव्य पािन के प्रनर् घोर िापरवाही वािा,
उदासीनर्ा व अकमतण्यर्ा वािा रहा है। प्रस्र्ुर्
प्रकरण में उच्च न्यायािय द्वारा अनुच्छेद २२६
के अिंर्गतर् हस्र्क्षेप करने का अचधकार क्षेत्र बहुर्
सीलमर् है। याची को अपना ब्यान दजत कराने के
लिए कई बार बुिाया गया र्ा परन्र्ु याची नहीिं
आया। अर्ः प्राकृनर्क न्याय के लसद्धान्र्ों का
पािन न होने का र्कत अमान्य है।

१२. याची व प्रत्यार्ी के पवद्वान
अचधवक्र्ा को सुना व याचचका प्रनर्शपर्
पत्र,प्रत्युिर शपर् पत्र व अन्य दस्र्ावेजों का
पररशीिन गहनर्ापूवतक ककया।

१३. सवत प्रर्म यह पवचार करना है कक उच्च
न्यायािय, अनुच्छेद २२६ के अचधकार क्षेत्र के
अन्र्गतर् पविागीय जािंच के प्रकरणों में कब और
ककस सीमा र्क हस्र्क्षेप कर सकर्ा है। इस
पविय पर उच्चर्म न्यायािय के कुछ ननणतय
उल्िेिनीय है।

i. संजय कुमार भसंह बनाम िारत
सरकार व अधय 2011 (14) एस सी सी 692 में
उच्चर्म न्यायािय ने प्रनर्पाददर् ककया कक,
पविागीय जााँच के प्रकरणों में न्यायािय की
िूलमका सीलमर् है एविं पविागीय प्राचधकाररयों
द्वारा सिी पक्षों को सुनकर व पत्राविी पर पवचार
के उपरान्र् ददये गये मर् के स्र्ान पर न्यायािय
अपना मर् प्रनर्स्र्ापपर् नहीिं कर सकर्ा है।
(कक्डिका २२)

ii. लभलत पोपली बनाम केनरा बैंकः
2003 (3) एस सी सी 583 में उच्चर्म न्यायािय
ने यह प्रनर्पाददर् ककया कक, उच्च न्यायािय
अनुच्छेद २२६ की अचधकार क्षेत्र का प्रयोग करर्े
हुए अपीिीय प्राचधकरण की र्रह कायत नहीिं कर
सकर्ा है। न्यानयक पुन: ननररक्षण क्षेत्राचधकार
का, अपीिीय प्राचधकरण की र्रह उपयोग नहीिं
ककया जा सकर्ा है। (कक्डिका १७)

14. वर्तामाि प्रकरण में नवभागीय जाँच
आख्या,
अपीलीय
अनिकारी
व
पुिनिाररक्षण
अनिकारी िे समस्त पत्रावली व याची द्वारा प्रस्तुर्त
नकये गये सभी र्तको पर नवचार करके ही याची के
नवरूद्ध आर प क सत्य पाया व उसक सजा दी
गयी। याची के नवद्वाि अनिवक्ता िे पुरज र कथि
नकया है नक याची के अनिकार क्षेत्र में व वीट क्षेत्र
िहीों था नजसमें अनभयुक्त का निवास था। अर्तः व
उस क्षेत्र में िहीों जा सकर्ता था। इसनलए उसिे क ई
गलर्त कृर्त िहीों नकया। याची के इस बचाव क
अपीलीय अनिकारी िे नवचार नकया है और स्पि रूप
से कहा है नक -"परन्तु प्रारोंनभक जाोंच अनिकारी द्वारा
निदेनिर्त नकये जािे के बाद भी याची आरक्षी द्वारा
जाोंच के मध्य अपिे कथि अोंनकर्त िहीों कराये गये।
8 All. Phool Chandra (Since Deceased and represented by LRs Vs. F.C.I. & Ors.
117
याची आरक्षी द्वारा अपिी अपील के साथ भी ऐसा
क ई साक्ष्य/अनभलेख प्रस्तुर्त िहीों नकया गया है
नजससे की बीट क्षेत्र र्तम्बाक स्ट्रीट अन्य आरनक्षय ों
क आवोंनटर्त ह िे सम्बिी उसके र्तका की पुनि ह
सके। " अर्तः यह र्तका बलहीि ह िे के कारण
अस्वीकार नकया जार्ता है।

१५. याची को बार बार अपना उिर देने के
लिए बुिाया गया र्ा, परन्र्ु याची ने सूचना होने
के बाद िी जबाव दाखिि नहीिं ककया अर्ः
नैसचगतक न्याय के लसद्धान्र्ों का पररपािन न
होने का र्कत, दस्र्ावेज पर उपजस्र्र् साक्ष्य के
पवपररर् है। अर्ः यह र्कत िी अमान्य ककया जार्ा
है।

१६. याची ने न्यायािय द्वारा ननगतर्
अचधपत्र को अलियुक्र् को प्रेपिर् करने की
कोलशश नहीिं की। याचचका पर उपजस्र्र्
दस्र्ावेजों के अनुसार याची ने अचधपत्र को प्रेपिर्
करने के लिए उचचर् कदम नहीिं उठाये र्र्ा
न्यायािय के समक्ष भ्रामक आख्या पेश करी। यह
समस्र् कृर् याची द्वारा जस्र्ि कायतवाही व
िापरवाही के पररचायक है। वर्तमान प्रकरण में
याची को ददया गया दण्ड िी असिंगर् नहीिं कहा जा
सकर्ा है।

१७. सिंवैधाननक न्यायािय अपने न्यानयक
पुनररक्षण
अचधकार
क्षेत्र
के
अन्र्गतर्,
अनुशासनात्मक कायतवाही में हस्र्क्षेप र्ब ही कर
सकर्ा है, जब उक्र् कायतवाही का ननष्कित पवकृर्
या आधारहीन हो। परन्र्ु वर्तमान प्रकरण में याची
यह साबबर् करने में असमर्त रहा कक उसके
पवरुद्ध की गयी अनुशासनात्मक कायतवाही का
ननष्कित पवकृर् या आधारहीन र्ा। अर्ः वर्तमान
प्रकरण में यह न्यायािय अनुच्छेद २२६ के
अिंर्गतर् याची को कोई राहर् नहीिं दे सकर्ा है।

१८. याची ऐसा कोई र्थ्य इस न्यायािय के
सामने िाने में असमर्त रहा है, जजससे अनुच्छेद
२२६ की शजक्र्यों का उपयोग ककया जा सके।
अर्ः वर्तमान याचचका बिहीन होने के कारण
अस्वीकार की जार्ी है। व्यय पर कोई आदेश
पाररर् नहीिं ककया जा रहा है।
----------
(2020)08ILR A117
ORIGINAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 25.11.2019

BEFORE
THE HON'BLE SUDHIR AGARWAL, J.

Writ A No. 50151 of 2003

Phool
Chandra(Since
Deceased
and
represented by LRs.) ...Petitioner
Versus
F.C.I. & Ors. ...Respondents

Counsel for the Petitioner:
Sri V.K. Singh, Sri Prakhar Tandon, Sri P.K.
Misra, Sri Vinay Singh, Sri Vijay Singh.

Counsel for the Respondents:
C.S.C., Sri A.K. Singh, Sri A. Singh, Sri
Amit Kumar, Sri Raj Kumar Singh, S.C.,
Sri Satish Chaturvedi, Sri Satya Prakash

A. Service Law - Food Corporation of
India Act, 1964 U.P. Panchayat Raj Act,
1947 - Section 5-A(c) - Industrial
Employment
(Standing
orders)
Act,
1946 - Clauses 14, 15(2), (5), (7), 16(2)
Departmental/Disciplinary Proceedings -
the proceedings were conducted for alleged
misconduct under Clause 15(7) and 16(2) but
the punishment order dated 26.05.2004 shows
that petitioner was held guilty of misconduct
under Clause 15(2), (5) and (7) of the S.O.,
1946. Since the charges of misconduct under
Clause 15(2) and (7) were not levelled upon
petitioner, the same could not have been taken
into consideration to hold him guilty of such
misconduct as the order then would travel