# Dr. Devi Prasad Dwivedi v. Mukhya Karyapalak Adhikari & Ors

- **Citation:** (2025) 9 ILRA 413
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2025-09-24
- **Case number:** Writ A No. 31125 of 2000
- **Bench:** Saurabh Shyam Shamshery
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/dr-devi-prasad-dwivedi-v-mukhya-karyapalak-adhikari-ors-53894
- **Pages:** 6

## Headnote

P.M.N. Singh, V.D. Ojha, Vineet Sankalp

विचारणीय मुद्दा

श्री काशी विश्ििाथ मक्न्दर में 'आचायम' पद की प्रकृनत, और
इस पद पर नियुक्क्त पश्चात सेिाविस्तार ि करिे संबंधी
आदेश की िैधानिकता।

सार-टिप्पणी (हेडनोट्स)
क. सेिा कािूि श्री काशी विश्ििाथ मक्न्दर ट्रस्ट
याचचकाकताम की आचायम पद पर 13. 01.1994 को नियुक्क्त
की गई मुख्य कायमपालक अचधकार द्िारा आक्षेवपत आदेश
ददिांक 12.07.2000 पाररत कर यह निधामररत ककया गया कक
याचचकाकताम का सेिा विस्तार 24.06. 1998 के बाद से िह ं
हुआ। अतः इस नतचथ से सेिाएं स्ियं समाप्त हो गयी इस
आदेश की िैधानिकता को चुिौती द गई मामले में 'आचायम'
पद की प्रकृनत एिं प्रनतटठा संबंधी प्रश्ि भी उठे :

अशभननधाहररत: आदेश ददिांककत 12.07.2000 स्ियं में
विरोधाभार्ी है। याचचकाकताम ि तो न्यास का कममचार और
ि ह 60 िर्म की उम्र के उपरान्त भी, उपरोक्त कायम करिे
में कोई विचधक बाधा है, पररक्स्थनतयों के दृक्टटगत आक्षेवपत
आदेश पूिामग्रह से ग्रलसत प्रतीत होता है। 'आचायम' का पद
एक परम्परागत पद है या यह कहा जा सकता है कक यह
एक 'दानयत्ि' है। उसकी मंददर के ककसी साधारण कममचार
से तुलिा िह ं की जा सकती है। अतः आदेश ददिांककत
12.07.2000 खक्डित ककया जाता है और इसी कारण अन्य
आदेश ददिांककत 22.02. 2023 भी न्यायसंगत ि होिे के
कारण खडित ककया जाता है। (पैरा 16)

आिश्यक टदशाननदेश : याचचकाकताम पूिम की भांनत ह राबत्र
भोग श्रृंगार आरती का सम्पादि विचधपूिमक करता रहेगा।
क्जसका कोई मािदेया िह ं होगा प्रनतिाद संख्या 1, 2 ि 3
यह सुनिक्श्चत करेंगे कक पूजि-अचमि सुगमता से सम्पाददत
होता रहे एिं याचचकाकताम उचचत सम्माि का अचधकार
रहेगा। (पैरा 16 (क) एिं (ख)]
414 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
अन्तननहटहत कानून
काशी विश्ििाथ अचधनियम, 1983 धारा 21 उपधारा 1 एिं 3

मूल-शब्द (कीिडह) की सूची
श्री काशी विश्ििाथ मक्न्दर ट्रस्टः आचायम पद पर नियुक्क्तः
भगिाि विश्ििाथ की विचध-विधाि की पूजा: सांस्कृनतक
कियाकलाप; मालसक मािद रालशः कायमपालक सलमनत;
नियाजिः एकान्त : छदम पररिादः जांच आख्या लशकायत
पत्र; सेिा विस्तारः मािक रालश; निलम्बि; पदम विभूर्णः
पद्म श्री, श्रृंगार भोग; आरती; सौहादपूणम िातािरण; कममचार ;
प्राकनतक न्याय का लसद्धान्तः भगिाि लशिः महात्मयः
महेश्िरः पूिामग्रहः विलशटट पूजा; राबत्रभोग आरती; अक्न्तम
न्यासः विरोधाभार्ी; परम्परागत पदः दानयत्ि; न्यायसंगत;
पूजि-अचमि; कमम-काडिः उपासकगण ।

मामले का उद्भि
याचचकाकताम का आचायम पर सेिा विस्तार ि करिे संबंधी
मुख्य कायमपालक अचधकार द्िारा पाररत आक्षेवपत आदेश
ददिांक 12.07.2000 |

पक्षकारों की ओर से उपक्थिनत
याचचकाकताम के अचधिक्ता : एच. एि. लसंह, िररटठ
अचधिक्ता, बी. एि. लसंह, िी. एस. बत्रपाठी, िी. िी. शुक्ला,
वििीत कुमार लसंह।

विपक्षीगण के अचधिक्ता : पी. एम. एि. लसंह, िी. िी.
ओझा, वििीत संकल्प।

## Text

9 All. Dr. Devi Prasad Dwivedi Vs. Mukhya Karyapalak Adhikari & Ors.
413
policy. It has to be judged according to the
standards fixed by the compassionate
appointment policy
in
force
in
the
employer's establishment at the time when
the deceased passed away. The applicable
policy clearly stipulates a monthly income
much below than that which the deceased's
family, by all standards, have. This is,
therefore, not even a case where, despite
excluding
some
very
arbitrary
and
irrational figures that the Committee took
into
consideration
for
declining
the
petitioner's
claim
for
compassionate
appointment,
we
ought
direct
a
reconsideration of that claim on the basis of
income of the deceased's family, as we
have determined it. On the basis of that
income too, the compassionate appointment
policy would not work to make the
petitioner eligible for consideration, as
shown above.

32. In the circumstances, we do not
find any good ground to interfere with the
impugned order and the resolutions of the
Committees,
declining
the
petitioner's
claim for compassionate appointment.

33. In the result, this petition fails and
stands dismissed.

34. There shall be no order as to costs.
----------
(2025) 9 ILRA 413
ORIGINAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 24.09.2025

BEFORE

THE HON'BLE SAURABH SHYAM
SHAMSHERY, J.

Writ A No. 31125 of 2000

Dr. Devi Prasad Dwivedi ...Petitioner
Versus
Mukhya Karyapalak Adhikari & Ors.
 ...Respondents

Counsel for the Petitioner:
B.N. Singh, D.S. Tripathi, H.N. Singh, P.
Padia, V.D. Shukla, V.N. Singh, Vineet
Kumar Singh

Counsel for the Respondents:
P.M.N. Singh, V.D. Ojha, Vineet Sankalp

विचारणीय मुद्दा

श्री काशी विश्ििाथ मक्न्दर में 'आचायम' पद की प्रकृनत, और
इस पद पर नियुक्क्त पश्चात सेिाविस्तार ि करिे संबंधी
आदेश की िैधानिकता।

सार-टिप्पणी (हेडनोट्स)
क. सेिा कािूि श्री काशी विश्ििाथ मक्न्दर ट्रस्ट
याचचकाकताम की आचायम पद पर 13. 01.1994 को नियुक्क्त
की गई मुख्य कायमपालक अचधकार द्िारा आक्षेवपत आदेश
ददिांक 12.07.2000 पाररत कर यह निधामररत ककया गया कक
याचचकाकताम का सेिा विस्तार 24.06. 1998 के बाद से िह ं
हुआ। अतः इस नतचथ से सेिाएं स्ियं समाप्त हो गयी इस
आदेश की िैधानिकता को चुिौती द गई मामले में 'आचायम'
पद की प्रकृनत एिं प्रनतटठा संबंधी प्रश्ि भी उठे :

अशभननधाहररत: आदेश ददिांककत 12.07.2000 स्ियं में
विरोधाभार्ी है। याचचकाकताम ि तो न्यास का कममचार और
ि ह 60 िर्म की उम्र के उपरान्त भी, उपरोक्त कायम करिे
में कोई विचधक बाधा है, पररक्स्थनतयों के दृक्टटगत आक्षेवपत
आदेश पूिामग्रह से ग्रलसत प्रतीत होता है। 'आचायम' का पद
एक परम्परागत पद है या यह कहा जा सकता है कक यह
एक 'दानयत्ि' है। उसकी मंददर के ककसी साधारण कममचार
से तुलिा िह ं की जा सकती है। अतः आदेश ददिांककत
12.07.2000 खक्डित ककया जाता है और इसी कारण अन्य
आदेश ददिांककत 22.02. 2023 भी न्यायसंगत ि होिे के
कारण खडित ककया जाता है। (पैरा 16)

आिश्यक टदशाननदेश : याचचकाकताम पूिम की भांनत ह राबत्र
भोग श्रृंगार आरती का सम्पादि विचधपूिमक करता रहेगा।
क्जसका कोई मािदेया िह ं होगा प्रनतिाद संख्या 1, 2 ि 3
यह सुनिक्श्चत करेंगे कक पूजि-अचमि सुगमता से सम्पाददत
होता रहे एिं याचचकाकताम उचचत सम्माि का अचधकार
रहेगा। (पैरा 16 (क) एिं (ख)]
414 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
अन्तननहटहत कानून
काशी विश्ििाथ अचधनियम, 1983 धारा 21 उपधारा 1 एिं 3

मूल-शब्द (कीिडह) की सूची
श्री काशी विश्ििाथ मक्न्दर ट्रस्टः आचायम पद पर नियुक्क्तः
भगिाि विश्ििाथ की विचध-विधाि की पूजा: सांस्कृनतक
कियाकलाप; मालसक मािद रालशः कायमपालक सलमनत;
नियाजिः एकान्त : छदम पररिादः जांच आख्या लशकायत
पत्र; सेिा विस्तारः मािक रालश; निलम्बि; पदम विभूर्णः
पद्म श्री, श्रृंगार भोग; आरती; सौहादपूणम िातािरण; कममचार ;
प्राकनतक न्याय का लसद्धान्तः भगिाि लशिः महात्मयः
महेश्िरः पूिामग्रहः विलशटट पूजा; राबत्रभोग आरती; अक्न्तम
न्यासः विरोधाभार्ी; परम्परागत पदः दानयत्ि; न्यायसंगत;
पूजि-अचमि; कमम-काडिः उपासकगण ।

मामले का उद्भि
याचचकाकताम का आचायम पर सेिा विस्तार ि करिे संबंधी
मुख्य कायमपालक अचधकार द्िारा पाररत आक्षेवपत आदेश
ददिांक 12.07.2000 |

पक्षकारों की ओर से उपक्थिनत
याचचकाकताम के अचधिक्ता : एच. एि. लसंह, िररटठ
अचधिक्ता, बी. एि. लसंह, िी. एस. बत्रपाठी, िी. िी. शुक्ला,
वििीत कुमार लसंह।

विपक्षीगण के अचधिक्ता : पी. एम. एि. लसंह, िी. िी.
ओझा, वििीत संकल्प।

(Delivered by Hon'ble Saurabh Shyam
Shamshery, J.)

१. वतटमान यामचका गत् २५ विों के अऩ्तराल के पश्चात,
आज अंमतम रूप से मनटताररत की जा रही है।

२. वतटमान यामचका में मनम्नमलमखत तथ्य, पत्रावली पर
उपमटथत आलेख व अमभवचनों की पृष्ठभूमम में अमववामदत माने जा
सकते हैंैः-

क. यामचकाकताट, डा० देवी प्रसाद मद्ववेदी को
उनकी मवद्ववता, मक वह कमटकाण्ड में मनष्णात, व नैमष्ठक
मवद्वान है और भगवान का दैमनक अमभिेक करने वालो में
उच्च रहें है, के दृमष्गत, श्री काशी मवद्वत्पररित् के अध्यक्ष ने
एक पत्र मदनांमकत १३.०१.१९९४, आयुि एवं अध्यक्ष
कायटपालक समममत, काशी मवश्वनाथ ममन्दर, वाराणसी को
प्रेमित करके, यामचकाकताट की पूवट टवीकृमत के साथ, भगवान
मवश्वनाथ की मवमध-मवधान की पूजा उनकी देख-रेख में करने
के मलए, उमचत मनणटय हेतु मनवेदन मकया। इस मनवेदन की
आवमयकता का कारण पूवट में भगवान मवश्वनाथ की पूजा की
देख-रेख, कई गत् विों से कर रहे, पं० बंशीधर का टवगटवास
होना था।

ख. उपरोि वमणटत पत्र मदनांमकत १३.०१.१९९४, का
संज्ञान मलया गया और यामचकाकताट की सुमवधानुसार और यह मक
रामत्रकालीन भोग आरती के मलए कोई शास्त्री/आचायट मनयुि नहीं था
और यह भी मवचारणीय रहा मक यामचकाकताट को रात्रीकालीन पूजा
आरती का कायट करने में बहुत कष् न हो तो उि प्रयोजन व अन्य
धाममटक कायों के मलए उन्हे मनयुि मकया जा सकता है।

ग. उपरोि के दृमष्गत व मवचार मवमशट के उपरान्त, मुख्य
कायटपालक अमधकारी ने पत्रांक संख्या ९४१/आ०मल० ०-९४, मदनांमकत
२४ जून १९९४, द्वारा यामचकाकताट को, श्री काशी मवश्वनाथ मंमदर
वाराणसी में रामत्रकालीन भोग आरती को मवमधवत् सम्पन्न कराने हेतु
'आचायट' मनयुि मकया तथा उन्हें मवश्वनाथ मंमदर के पुजाररयों को
कमटकाण्ड आमद के प्रमशक्षण का दामयत्व भी सौंपा गया। यह भी टपष् मकया
गया मक यह मनयुमि/व्यवटथा एक विट के मलए, अटथायी रूप से रहेगी
तथा यह व्यवटथा मबना मकसी कारण कभी भी समाप्त की जा सकेगी। एक
मानद रामश रू० १५००/- प्रमत माह भी मनधाटररत करी गयी।

घ.
उपरोि
के
दृमष्गत,
यामचकाकताट
ने
०१.०७.१९९४ को उपरोि वमणटत पद का कायटभार ग्रहण मकया और
पूणट मनष्ठा से उि पूजा-पाठ श्रृंगार आरती व अन्य कायों का मनवाटहन
प्रारम्भ कर मदया।

ङ श्री काशी मवश्वनाथ ममन्दर रटट, वाराणसी की बैठक
मदनााँक २७.०५.१९९५, में मवटतृत मवचार मवमशोपरांत सवटसम्ममत से
अध्यक्ष, श्री काशी मवद्वत्पररित् के, प्रटताव मदनांक १३.०१.१९९४, को
टवीकार मकया और यामचकाकताट को श्रृंगार- भोग आरती सम्पन्न कराने
हेतु तथा पुजाररयों के परीक्षण हेतु, १५००/- रू० मामसक मानद रामश पर,
'आचायट' के रूप में मनयुमि की टवीकृमत प्रदान करी तथा इसी बैठक में
दो और मनणटय सवटसम्ममत से पाररत मकए। पहला, यामचकाकताट का
मानदेय १५०० रू० मामसक से बढाकर ३००० रू० मामसक मकया गया
और दूसरा उनका कायटकाल ३ विों के मलए बढाया गया।

च. उपरोि बैठक में यामचकाकताट के कायों की
सराहना भी की गयी, मक ममन्दर के प्रशासन, प्रगमत एवं मंमदर के
9 All. Dr. Devi Prasad Dwivedi Vs. Mukhya Karyapalak Adhikari & Ors.
415
सांटकृमतक मिया कलापों में उनका सवटयोग व उत्साह रहा एवं
उनकी मनष्ठा, असाधारण एवं अमनवटचनीय रही। इसके उपरांत पत्रांक
मदनांमकत २० नवम्बर १९९४ के द्वारा यामचकाकताट द्वारा उपरोि
दामयत्वों का मनवाटहन को प्रमामणत भी मकया और कालान्तर में
आयुि एवं अध्यक्ष, कायटपालक समममत श्री काशी मवश्वनाथ ममन्दर,
वाराणसी द्वारा एक 'प्रशमटत पत्र' मदनांमकत २५.०९.१९९९,
यामचकाकताट को प्रदान मकया।

छ. काशी मवश्वनाथ ममन्दर रटट, वाराणसी की ३७वीं
न्यास पररिद बैठक मदनााँक १० नवम्बर १९९८ में सवटसम्ममत से
यामचकाकताट के द्वारा मदये गये प्राथटना पत्र पर मवचारोपरान्त यह
मनणटय मकया गया मक उनके मनयुमि पत्र में अंमकत एक विट की समय
सीमा समाप्त की जायें व उनका मानदेय रू० ३०००/- से बढाकर
रू० ३५००/- प्रमतमास मकया जाने का मनणटय मलया गया तद्नुसार
टवीकृमत भी प्रदान करी गयी। साथ ही साथ खमण्डत मूमतटयों आमद
का मवमधपूवटक मवसजटन करने के मलए भी यामचका कताट व एक अऩ्य
को अमधकृत मकया गया। मनयुमि आदेश से एक विट की समयावमध
को समाप्त करने का मनणटय यामचका कताट को मुख्य पालक
अमधकारी ने पत्र मदनांमकत ०३.१२.१९९८ द्वारा सूमचत भी मकया।
यहााँ यह उमकलमखत करना आवमयक है मक यामचकाकताट के मनयुमि
पत्र में 'एक विट' की समयावमध समाप्त करने का मनणटय, मानदेय
बढाने का मनणटय व अन्य कायों के सम्पादन के मलए अमधकृत
करना, का तात्पयट, यामचकाकताट का मनयोजन बनाए रखना तो हो
सकता है परन्तु इन सबका ऐसा कोई भी मवपरीताथटक तात्पयट नहीं हो
सकता मक यामचकाकताट का मनयोजन मवटतार नहीं मकया गया था
और इस कारण उसका मनयोजन समाप्त हो गया। अन्यथा उि सभी
मनणटय व्यथट और बेमतलब हो जायेंगे और यह मक इसके उपरान्त भी
यामचकाकताट अमववामदत रूप से पूजा अचटना करता रहा।

ज. प्रमतवादी संख्या ५ जो तत्समय मुख्य समचव के पद
पर कायट कर रहे थे। अचानक कमथत रूप से मवश्वनाथ मंमदर में आकर
एक मदन लम्बे समय तक अनुष्ठान करना चाहते थे, मजसके मलए एकान्त
की आवमयकता थी, जो मंमदर के सामान्य भिों के दशटन रोक कर, देने
में कमठनाई थी। इस कारण यामचकाकताट ने उस अमधकारी से ऐसी पूजा
न करने का आग्रह मकया, जो उस अमधकारी को नागवार गुजरा और
यामचकाकताट के मवरूद्ध, पूवाटग्रह से ग्रमसत होकर एक छद्म पररवादी को
खडा कर, एक मशकायत पत्र मदनांमकत ०५.०२.२००० प्रेमित करवाया
गया मक यामचकाकताट की मनयुमि अवैध है और मंमदर के मिया-
कलापों में मवत्तीय अमनयममततायें हुई है।

झ. उि मशकायत पत्र का संज्ञान मलया गया और
यामचकाकताट के मवरूद्ध, उसकी पीठ के पीछे एक जााँच करायी गयी
और जााँच आख्या को न्यास की बैठक मदनांक २२.०६.२००० में
मवचारण हेतु रखा गया, मजसमें यह मनणटय मलया गया मक काशी
मवश्वनाथ अमधमनयम, १९८३ की धारा २१ (१) तथा २१ (३) के
अऩ्तगटत, मुख्य कायटपालक अमधकारी, कमटचारी की मनयुमि करने
तथा उन्हे हटाने में सक्षम है और उसको यामचकाकताट की सेवायें
समाप्त करने के सम्बन्ध में अमन्तम मनणटय लेने के मलए प्रामधकृत
मकया गया। यहााँ यह भी उमकलमखत करना आवमयक है मक प्रमतवादी
ने कभी भी यामचकाकताट को मंमदर का कमटचारी नहीं माना है।

ञ. मशकायती पत्र के आधार पर जााँच आख्या की
प्रमत यामचकाकताट को उपलब्ध नहीं करायी अमपतु मशकायत पत्र की
एक प्रमत यामचकाकताट को मुख्य कायटपालक अमधकारी ने पत्र
मदनांमकत २७.०५.२००० के माध्यम से प्रेमित की। यामचकाकताट ऩे
उसका एक मवटतृत उत्तर मदनांमकत १५.०६.२००० को प्रेमित मकया।

ट. उपरोि पररमटथमतयों में मुख्य कायटपालक
अमधकारी ने आदेश मदनांमकत १२.०७.२००० द्वारा यह मनधाटररत
मकया मक यामचकाकताट का सेवा मवटतार २४.०६.१९९८ के बाद
नहीं हुआ। अतैः उि मतमथ से उनकी सेवायें टवतैः समाप्त हो गयी।
साथ ही साथ उनको दी गयी मानक रामश भी मवमध सम्मत नहीं थी
और मवटतृत परीक्षण के बाद वसूली हेतु अलग से मवटतृत आदेश
पाररत करने की टवतंत्रता रखी। आदेश के मुख्य अंश मनम्न है:

"मैने अचखल भारतीय श्री पचण्डत पररषद का
चशकायती प्राथभना पत्र , डा० देवी प्रसाद चद्ववेदी द्वारा चदए गए
स्पष्टीकरण एवं अन्य साक्ष्य तथा शासन द्वारा करायी गयी जांि
आख्या का अवलोकन चकया तथा श्री चद्ववेदी को व्ययचिगत पत्रावली
पर लगे सभी अचभलेख का परीक्षण चकया और उस पर चविार
चकया। डा० देवी प्रसाद चद्ववेदी ने अपने स्पष्टीकरण चदनांक
15.06.2000 में स्वयं स्वीकार चकया है चक " श्री काशी
चवर्श्नाथ मचन्दर कायाभलक सचमचत की २२ वी बैठक चदनांक
१५.०४.९४ में सवभसम्मचत से मचन्दर आिायभ पद पर मुझे चनयुि
चकया गया तथा उसी बैठक में मुझे भोग-श्रंगार आरती सम्पन्न कराने
तथा पुजाररयों को प्रचशक्षण देने हेतु आिायभ के रूप में चनयुचि की
गयी। चनयुचि के एक वषभ बाद मचन्दर आिायभ पद पर मेरी चनयुचि
तीन वषभ के चलए पुनः बढा दी गयी। वह तीन वषभ की अवचध २८ को
समाि हो गयी। मैने मचन्दर आिायभ पद पर सेवा एवं संतुचष्ट हेतु
प्राथभना पत्र दे चदया। चकन्तु सेवा स्थायीकरण का आदेश अभी तक
चनगभत नहीं हुआ। मुख्य कायभपालक अचधकारी से पूछने पर उन्होने
कहा चक आदेश चनकले या न चनकले उससे आपका क्या मतलब
आप मचन्दर आिायभ पद पर चनयमों के तहत स्थायी थे। डा० देवी
प्रसाद चद्ववेदी के उपरोि कथन में बल नहीं है। न्यास पररषद की
416 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
३७वीं बैठक चदनांक १०.११.९८ के एजेण्डा मद १४ अन्य चवषय के
चबन्दु (२) में डा० देवी प्रसाद चद्ववेदी के स्थायीकरण पर कोई चविार
नही हुआ और न ही न्यास पररषद ने स्थायीकरण करने का कोई
चनणभय चलया। अचपतु डा० देवी प्रसाद चद्ववेदी के द्वारा चदए गए
प्रार भथना पत्र पर चविारोपरान्त उसके चनयुचि आदेश में त्रुचर्पूणभ ढंग
से अंचकत एक वषभ की समय सीमा को समाि करने का चनणभय
चलया गया। न्यास पररषद के चनणभय से स्पष्ट पता िलता है चक
चदनांक १०.११.९८ को न्यास पररषद ने डा० चद्ववेदी के सेवा
चवस्तार करने का ही कोई चनणभय चलया और न ही स्थायीकरण
चकया गया। पत्रावली के अवलोकन से यह स्पष्ट है चक डा० देवी
प्रसाद चद्ववेदी की चनयुचि २४.६.९४ को श्री आर०के० चसंह,
मुख्य कायभपालक अचधकारी द्वारा केवल एक वषभ के चलए की गयी
थी और पुनः उनके सेवा के चवस्तार ३ वषभ के चलए चकया गया।
इस प्रकार अचन्तम रूप से डा० देवी प्रसाद चद्ववेदी का कायभकाल
चदनांक २४.०६.९८ को समाि हो गया। चदनांक २४.०६.९८ के
पश्चात न तो कोई सेवा चवस्तार चकया और न ही डा० चद्ववेदी के
पुनाभचनयुचि का कोई आदेश ही चकए गए। अतः उनकी सेवा
अवचध स्वतः चदनांक २४.०६.९८ को चनष्ट्प्रभावी हो समाि हो
गयी।"

ठ. उपरोि आदेश वतटमान यामचका में आक्षेमपत
मकया गया है।

३. इस न्यायालय द्वारा पाररत, अंतररम आदेश मदनांमकत
२३.०८.२००२ द्वारा आक्षेमपत आदेश को मनलमम्बत कर मदया गया।
अंतररम आदेश का पालन हुआ और यामचकाकताट पूवट की भांमत
पूजा अचटना इत्यामद करता रहा।

४. कालान्तर में यामचकाकताट को पद्म मवभूिण व पद्म श्री से
सम्मामनत मकया गया और विट २०१६ से २०१८ के मध्य वो उत्तर
प्रदेश लोक सेवा आयोग का सदटय भी रहा। इसके उपरान्त भी
यामचकाकताट अपना दामयत्व मनभाता रहा।

५. अंतररम आदेश के रहते हुए व इस न्यायालय की मबना
कोई अनुममत मलये, काशी मवश्वनाथ न्यास पररिद ने १०४वी बैठक
मदनांक २२.०२.२०२३ में यह मनणटय मलया मक, चूाँमक यामचकाकताट
की उम्र ६० विट से अमधक है, इसमलए न तो उनको मानदेय मदया जा
सकता है और न ही उनको कायटरत रखा जा सकता है, आदेश का
सारांश मनम्न हैैः-

"इस प्रकार उपरोि तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट है
चक डा० देवी प्रसाद चद्ववेदी की चनयुचि २२.०६.१९९४ को
तत्कालीन मुख्य कायभपालक अचधकारी द्वारा अस्थायी रूप से एक
वषभ के चलए की गयी थी चजसे तीन वषभ तक सेवा चवस्तार चदया गया।
श्री चद्ववेदी की चनयुचि चबना पद सृजन के की गयी थी। डा० देवी
प्रसाद चद्ववेदी की चनयुचि चदनांक २४.०६.१९९८ को स्वतः समाि
हो गयी। चशकायत होने के िम में शासन द्वारा करायी गयी जााँि में
आरोप सत्य पाये जाने के कारण तत्कालीन मुख्य कायभपालक
अचधकारी द्वारा श्री चद्ववेदी के चवरूि धनराचश वसूली के आदेश
पृथक से चनगभत करने के आदेश चदये गये थे। श्री चद्ववेदी द्वारा मा०
उच्ि न्यायालय से अचधविा की अनुपचस्थचत के िम में स्र्े आडभर
प्राि कर चलया गया। श्री चद्ववेदी चदनांक २०.१०.२०१६ को अपनी
अचधवषभता आयु पूणभ कर िुके तथा मा० उच्ि न्यायालय के वसूली
रोकने के आदेश का अनुपालन चकया जा िुका है। ऐसी चस्थचत में
न्यास पररषद के चनमभय के आलोक में चदनांक २०.१०.२०१६
(अचधवषभता आयु ६० वषभ) के उपरान्त श्री चद्ववेदी का चकसी भी
प्रकार से कोई मानदेय व अचधकार नहीं बनता है। श्री चद्ववेदी की
चनयुचि लोक सेवा आयोग में होने के कारण इनको चदये जाने वाले
मागभ व्ययय का भुगतान चसतम्बर २०१६ तक चकया गया है। अक्र्ूबर
२०१६ मागभ व्ययय का भुगतान अवरूि कर चदया गया। श्री चद्ववेदी
द्वारा अपने प्रत्यावेदन से चदनांक ०४.११.२०१८ को कायभार ग्रहण
करना बताया गया है। परन्तु वतभमान में उपलब्ध पत्रावली में कोई
ररकाडभ नहीं है।

१. डा० देवी प्रसाद चद्ववेदी की ६० वषभ की आयु २०
अक्र्ूबर, २०१६ को ही पूणभ हो िुकी है।

२. श्री चद्ववेदी की चनयुचि चबना पद सृजन के तथा
चबना सक्षम अचधकारी के की गयी थी।

३. श्री काशी चवर्श्नाथ मंचदर न्यास के अऩ्तगभत
अचधग्रहण के समय चजन पुजारीगण के प्रचशक्षण का उल्लेख चकया
गया है, वह स्मस्त पुजारीगण सेवाचनवृत्त हो िुके है। वतभमान में जो
भी पुजारी कायभरत है सभी आिायभ उच्ि योग्यता धारी एवं समस्त
प्रकार के पूजा, आरती इत्याचद में दक्ष है। वतभमान में कोई प्रचशक्षण
देने की कोई आवश्यकता नहीं है।

अतः उि पररचस्थचतयों के आलोक में न्यास पररषद
यह चनणभय लेता है चक श्री चद्ववेदी के प्रकरण में मा० न्यायालय के
आदेश का अनुपालन न्यास पररषद द्वारा चकया जा रहा है। वतभमान में
सभी प्रकार के कमभिाररयों की सेवा शतों के अनुसार अचधकतम ६०
वषभ की आयु ही अचधवषभता आयु चनयत है। िूाँचक श्री चद्ववेदी अपनी
अचधवषभता आयु ६० वषभ पूणभ कर िुके है, इसचलए न्यास पररषद के
अऩ्तगभत इन्हे कायभरत नहीं रखा जा सकता। तद्नुसार श्री चद्ववेदी के
प्रत्यावेदन पर चनणभय चलया जाता है।"
9 All. Dr. Devi Prasad Dwivedi Vs. Mukhya Karyapalak Adhikari & Ors.
417

६. उपरोि पररमटथमतयों में यामचकाकताट ने एक अवमानना
आवेदन (कंटेम्पट अपलीकेशन,मसमवल) संख्या १६६३ सन् २०२३,
इस न्यायालय में दामखल करी मक उपरोि मनणटय इस न्यायालय के
द्वारा पाररत अंतररम आदेश मदनांमकत २३.०८.२००२ के मवपरीत है।
उि अंतररम आदेश की भी अवहेलना हुई है। अतैः यह अवमानना
का मामला बनता है। उमचत पीठ ने आदेश मदनांमकत
०३.०३.२०२३ द्वारा यह आदेश मदया मक यामचकाकताट पूवट की
भांमत श्रृंगार भोग आरती (रामत्र ८ से १० बजे तक) काशी मवश्वनाथ
मंमदर में करता रहेगा। काशी मवश्वनाथ न्यास के मवद्वान अमधविा ने
भी उि आदेश के प्रमत सहममत दी। ऐसा प्रतीत होता है
यामचकाकताट ने उि आदेश का पालन या तो टवैः इच्छा से या अन्य
पररमटथमतयों के कारणवश नहीं मकया और श्रृंगार आरती मनयममत
रूप से प्रमतमदन नहीं करी।

७. उपरोि पृष्ठभूमम में इस न्यायालय ने एक आदेश
मदनांमकत २६.०८.२०२५ पाररत करा मक सभी पक्षकार सौहादटपूणट
वातावरण में बात कर सहममत के आधार पर कोई मनणटय लें।

८. पक्षकारों के मवद्वान अमधविागण एवं यामचकाकताट जो
आज न्यायालय में टवयं उपमटथत हैं उन्होने यह कथन मकया मक
पक्षकारों ने दो बार आपस में सौहादटपूणट वातावरण में वाताट की।
पहले प्रयागराज में, मफर वाराणसी में और यह भी बताया गया, मक
आपस में मलया गया कोई भी मनणटय, सवटप्रथम न्यास की बैठक में
टवीकृत कराना होगा और इसमलए यह उमचत होगा मक पक्षकारों के
पक्ष का श्रवण कर, यह न्यायालय, आदेश पाररत करे। मजससे उसे
न्यास की बैठक में टवीकृत कराने की आवमयकता ही न रह जाये।

९. उपरोि पृष्ठभूमम में यामचकाकताट को, उसके मवद्वान वररष्ठ
अमधविा श्री एच.एन.मसंह को व उनके सहयोगी मवद्वान अमधविा
श्री मवनीत कुमार मसंह को , प्रमतवादी सं० १,२,३ के मवद्वान
अमधविा श्री मवनीत संककप को व प्रमतवादी संख्या ४ के मवद्वान
अमधविा के प्रमतवेदन को ध्यानपूवटक श्रवण मकया। प्रमतवादी सं० ५
की तरफ से कोई अमधविा प्रटतुत नहीं हुआ।

१०. प्रमतवादी का कथन रहा है मक यामचकाकताट उसका
कमटचारी नहीं है और उसकी मनयुमि 'आचायट' के रूप में विट
१९९८ के बाद मवटताररत नहीं की गयी और मुख्य कायटपालक
अमधकारी 'अमधमनयम १९८३' की धारा २१ (१) तथा २१ (३)
के अंतगटत यामचकाकताट के मवरूद्ध आदेश पाररत करने का
अमधकार रखता है। यह अमववामदत है, यामचकाकताट के मवरूद्ध
कायटवाही एक मशकायत पत्र को संज्ञान में लेते हुए प्रारम्भ करी
गई थी। उनका यह भी कथन रहा है मक आक्षेमपत आदेश पाररत
करने के पूवट प्राकृमतक न्याय के मसद्धान्तो का पूणट पररपालन मकया
और कायटवाही पूवाटग्रह से ग्रमसत नहीं थी। इस न्यायालय के
अंतररम आदेश के जीवान्त होने के बावजूद, क्योमक यामचकाकताट
६० विट की उम्र से अमधक हो गये थे, केवल इस कारण से ही
उनको अमग्रम कायट न कराने का आदेश मदनांक २३.०२.२०२५
को पाररत मकया गया था।

११. श्री मवनीत संककप, न्यास के मवद्वान अमधविा ने
अनुदेश के आधार पर यह कथन मकया मक न्यास को
यामचकाकताट के मवद्वता, उनकी मनष्ठा व उनके मंमदर में मनोयोग से
पूजा अचटना करने के मविय में मकंमचत भी संदेह नहीं है और
न्यास इस न्यायालय के द्वारा पाररत मकसी भी मनणटय का सम्मान
करेगा।

१२. यामचकाकताट टवयं न्यायालय कक्ष में उपमटथत हैं
और न्यायालय की अनुममत से उन्होनें अपना पक्ष न्यायालय के
समक्ष, भावुकता परन्तु गम्भीरता से प्रटतुत मकया। भगवान मशव
की महात्मय के मविय में उन्होने उच्चारण मकया मकैः-

"तव तत्त्वं न जानामम कीदृशोऽमस महेश्वर।"

"यादृशोऽमस महादेव तादृशाय नमो नमैः॥"

मजसका अथट है " हे महेश्वर ! मैं आपके तत्व
(रहटय) को नहीं जानता ह ं मक आप कैसे हो । परन्तु हे महादेव !
आप मजस मकसी तरह के हो, जैसे हो, वैसे के वैसे लगन आपको
मैं बार-बार प्रणाम करता ह ाँ ।"

१३. यामचकाकताट ने कहा मक उन्होने आचायट के रूप में
ममन्दर में अपनी सेवायें मबना मकसी भेद-भाव से, सम्पूणट मवमधमवधान से, मनयममत रूप से पूजा अचटना करके दी और मानदेय भी
न्यास के बार-बार आग्रह करने के उपरान्त ही टवीकार मकया। वह
कभी भी न्यास का कमटचारी नहीं रहा। उसको, उसकी मवशेिताओं
के कारण आचायट पद पर कुछ मवशेि कायों के सम्पादन हेतु मनयुि
मकया गया। मवशेि रूप से रामत्र भोग आरती को मवमधवत् सम्पामदत
करने के मलए, जो उसने मनोयोग से पूणट की। आक्षेमपत आदेश,
पूवाटग्रह से ग्रमसत है, क्योंमक तत्कालीन एक वररष्ठ शासकीय
अमधकारी को उऩ्होने एक मवमशष् पूजा करने से रोका था, क्योमक
उसके कारण मंमदर को खाली नहीं कराया जा सकता था, जबमक
भि दशटन के मलए प्रतीक्षा कर रहे थे। वह आज भी भगवान
मवश्वनाथ की रामत्र भोग आरती, मनोयोग से करना चाहते हैं, जब
418 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
तक उसका शरीर उनका साथ दे। वह मकसी भी पदामधकारी से मकसी
भी प्रकार की मशकायत का भाव नहीं रखते हैं। मात्र उमचत सम्मान
के प्राथी है।

१४. यामचकाकताट के मवद्वान वररष्ठ अमधविा श्री एच. एन. मसंह ने
प्रमतवेदन मकया मक प्रमतवादी संख्या पांच ने कोई प्रत्युत्तर नहीं मदया है एवं
प्रमतवादी संख्या - १,२ एवं ३ के द्वारा दामखल प्रमतशपथ पत्र में पूवट में
उकलेमखत घटना को बहुत सामान्य रूप से अटवीकार मकया है एवं अन्य
कारकों के दृमष्गत वो घटना ही आक्षेमपत आदेश पाररत करने का कारण हो
सकती है। मवमधक रूप से आक्षेमपत आदेश पाररत नहीं मकया जा सकता
था। आक्षेमपत आदेश तथ्यात्मक दृमष् से भी मवकृत है। जब यामचकाकताट
अमववामदत रूप से न्यास का कमटचारी ही नहीं है तो अमधमनयम- १९८३ के
उपबन्ध उस पर लागू ही नहीं हो सकते हैं। अमन्तम न्यास की बैठक में मलये
गये मनणटयों का पूणटतैः मवपरीत अथट, आक्षेमपत आदेश में मदया गया है जो
न्यायसंगत नहीं है। इसी प्रकार यामचकाकताट ६० विट का हो गया है मात्र इस
कारण 'आचायट' का कायट नहीं कर सकता, यह मनणटय भी न्यायसंगत नहीं
है।

१५. प्रमतवादी सं० १,२ व ३ के मवद्वान अमधविा श्री मवनीत
संककप ने आक्षेमपत आदेश का समथटन करने की असफल कोमशश करी,
क्योमक उपरोि वमणटत तथ्य उनके मकसी भी तकट के मवरोध में है। उन्होनें
पुनैः मनवेदन मकया मक यह न्यायालय वतटमान प्रकरण की पररमटथमतयों के
दृमष्गत जो आदेश पाररत करेगा, उसका यथायोग सम्मान मकया जायेगा।

१६. उपरोि के संदभट में इस न्यायालय का मत है मक
यामचकाकताट के पक्ष में मदये तकट में बल है मक आक्षेमपत आदेश
तथ्यात्मक व मवमधक दोनों रूपों में त्रुमटपूणट है। यह भी मनधाटररत मकया जा
सकता है मक आदेश मदनांमकत १२.०७.२००० टवयं में मवरोधाभािी है।
यामचकाकताट न तो न्यास का कमटचारी और न ही ६० विट की उम्र के के
उपरान्त भी, उपरोि कायट सम्पामदत करने में कोई मवमधक बाधा है
पररमटथमतयों के दृमष्गत आक्षेमपत आदेश पूवाटग्रह से ग्रमसत भी प्रतीत होता
है। 'आचायट' का पद एक परम्परागत पद है या यह कहा जा सकता है मक यह
एक 'दामयत्व' है। उसकी मंमदर के मकसी साधारण कमटचारी से तुलना नहीं
की जा सकती है। अतैः आदेश मदनांमकत १२.०७.२००० खमण्डत मकया
जाता है और इसी कारणवश अन्य आदेश मदनांमकत २२.०२.२०२३ भी
न्यायसंगत न होने के कारण खमण्डत मकया जाता है और समटत
पररमटथमतयों व सभी पक्षों के प्रमतवेदन के दृमष्गत वतटमान यामचका मनम्न
मनदेशों के साथ मनटताररत की जाती हैैः-

क. यामचकाकताट पूवट की भांमत ही रामत्र भोग श्रृंगार
आरती का सम्पादन मवमधपूवटक करता रहेगा। मजसका कोई मानदेय नहीं
होगा।

ख. प्रमतवादी संख्या १,२ व ३ यह सुमनमश्चत करेंगे मक
पूजन-अचटन सुगमता से सम्पामदत होता रहे एवं यामचकाकताट उमचत सम्मान
का अमधकारी रहेगा।

ग. यामचकाकताट यमद चाहे तो सप्ताह में तीन मदन
(सोमवार, बुद्धवार व गुरूवार) को ही रामत्र भोग श्रृंगार आरती करने का
मनणटय ले सकता है और इसके मलए वो प्रमतवादी को २ सप्ताह के भीतर
सूमचत करेगा।

घ. रामत्र भोग श्रृंगार आरती के समय यामचकाकताट अपने
साथ एक सहयोगी रख सकता है बशते वो कमट-काण्ड व पूजा-पद्यमत का
उमचत ज्ञाता हो।

ङ. प्रमतवादी संख्या १,२ व ३ यमद मनधाटररत करना चाहें
तो मास में एक मदवस व कुछ समय मनमश्चत कर सकेंगे, मजससे
यामचकाकताट, उपासकगणों को कमट-काण्ड से सम्बमन्धत मशक्षा दे सके।
ऐसा आयोजन मंमदर पररसर में ही होगा।

च. यामचकाकताट टवैः इच्छा से रामत्र भोग श्रृंगार आरती
का सम्पादन कभी भी त्याग सकते है, उसका टवाटथ्य एक कारण हो सकता
है। ऐसा करने के पूवट वह न्यास को सूमचत करेगा।

छ. यामचकाकताट से अपेक्षा रहेगी मक वो एक वररष्ठ
अनुभवी व्यमि होने के नाते अपने उि कृत्यों में सरलता बनाये रखेगा।

१७. उपरोि मनदेशों के संदभट में मकसी मववाद की दशा में, जब
मववाद आपसी बातचीत से सुलझ न पायें तो कोई भी पक्षकार, इस
न्यायालय में पुनटमवचार यामचका दामखल करने के मलए टवतंत्र रहेगा।
----------
(2025) 9 ILRA 418
ORIGINAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 12.09.2025

BEFORE

THE HON'BLE MRS. MANJU RANI
CHAUHAN, J.

Writ A No. 48129 of 2017

Satyaveer Singh ...Petitioner
Versus
State Of U.P. & Ors. ...Respondents