# Hindi Vidyapeeth v. Hindi Sahitya Sammelan & Anr

- **Citation:** (2024) 12 ILRA 250
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2024-12-17
- **Case number:** Writ B No. 5994 of 2012
- **Bench:** Saurabh Shyam Shamshery
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/hindi-vidyapeeth-v-hindi-sahitya-sammelan-anr-51203
- **Pages:** 11

## Headnote

Amar Nath Tiwari,Azad Rai,Manish Kumar
Jain,Radhey
Shyam
Mishra,Ramesh
Chandra Dwivedi,Suresh Chandra Mishra

गवर्नमेंट ग्रांट्स एक्ट, 1895 - उत्तर प्रदेश भू-
ररजस्व अधिधर्यम, 1901; िररर: 33/39 -
वरद पोषणीयतर - ध ांदी सरध त्य सम्मेलर्, प्रयरग'
वषन १९१४ में पांजीकृत ुई। उत्तर प्रदेश सरकरर र्े लगभग
१०० बीघर धववरधदत भूधम कर अधिग् ण 'ध ांदी
धवद्यरपीठ, प्रयरग' की स्थरपर्र के धलए धकयर,
धजसमें स्पष्ट थर धक धववरधदत भूधम पर केवल 'ध ांदी
धवद्यरपीठ, प्रयरग' की स्थरपर्र ोगी। य भूधम
ररजस्व करगजरत में करधबज़ र ी और १४२० फसली में
श्रेणी २ में दजन थी। वषन १९९८ में 'ध ांदी सरध त्य
सम्मेलर्, प्रयरग' र्े उत्तर प्रदेश भूधम ररजस्व
अधिधर्यम, १९०१ की िररर ३३/३९ के अांतगनत एक
वरद दरयर धकयर धक धवपक्षी 'ध ांदी धवद्यरपीठ, प्रयरग'
12 All. Hindi Vidyapeeth Vs. Hindi Sahitya Sammellan & Anr.
251
कर र्रम धसकमी खरर्े से पृथक धकयर जरए।
उपधजलरधिकररी र्े वरद पोषणीय र् ोर्े के कररण वरद
धर्रस्त कर धदयर। अपर आयुक्त र्े र् केवल आदेश
धदर्रांक ११.०१.२००० (धजसमें वरद पोषणीय र् ीं
मरर्र गयर थर) धर्रस्त धकयर, वरर्् वरद को गुण-दोष
पर धर्स्तरररत भी कर धदयर। ररजस्व पररषद र्े धर्गररर्ी
को बल ीर् मरर्ते ुए वरद धर्रस्त धकयर। आयुक्त और
ररजस्व पररषद र्े वरद पोषणीयतर पर कोई धटप्पणी र् ीं
की। र् तो आयुक्त और र् ी ररजस्व पररषद र्े य धर्णनय
धदयर धक क्यर उत्तर प्रदेश भू-ररजस्व अधिधर्यम,
१९०१ के अांतगनत करयनवर ी की जर सकती ै, क्योंधक
धववरधदत भूधम उत्तर प्रदेश सरकरर द्वररर 'ध ांदी
धवद्यरपीठ, प्रयरग' के धर्मरनण ेतु दी गई थी। गवर्नमेंट
ग्रांट्स एक्ट, १८९५ के प्ररविरर् लरगू ोंगे यर र् ीं,
य भी धवचररणीय थर। य र्ॉर् जेड.ए. जमीर् थी।
उत्पररवतनर् अधभलेख धवधशष्ट व्यधक्त को कोई अधिकरर,
स्वरधमत्व यर ध त प्रदरर् र् ीं करतर, और ररजस्व
अधभलेख में उत्पररवतनर् केवल धवत्तीय उद्देश्य के धलए ो
सकतर ै। आयुक्त इलर रबरद और ररजस्व पररषद के
आदेश त्रुधटपूणन परए जरर्े पर धर्रस्त कर धदए गए तथर
पुर्ः धर्पटररे ेतु प्रयरगररज के आयुक्त को प्रेधषत धकयर
गयर। (Para 17, 19, 20, 22)

धर्स्तरररत (E-5)
सांदधभनत मरमलों की सूची :

## Text

250 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
would be accrued only in terms of recital of
Grant as well as in terms of Crown Grants
Act (later on known as Government Grants
Act).

16. First Appellate Court has rightly
considered the relevant provisions and held
that since provisions of U.P. Tenancy Act,
1939 and Agra Tenancy Act, 1926 would
not be applicable to land in dispute,
therefore, all suits were dismissed under
Order VII Rule 11 CPC.

17. Board of Revenue in Second
Appeal has accepted that land in dispute
was a land given under Grant and as such
in view of provisions of Crown Grants Act
(later on known as Government Grants
Act) and provisions of U.P. Tenancy Act,
1939 and Agra Tenancy Act, 1926 would
not be applicable, however, despite above
observations, Board of Revenue has erred
in further observing that other provisions of
both Tenancy Acts would be applicable
without
any
specific
ground.
Said
observation is self contrary, which render
impugned order illegal.

18. If the provisions of both Tenancy
Acts are not applicable, the Second
Appellate Court has wrongly held that
some part of it is still applicable, despite
there was no such differentiation in
amended provisions of the Government
Grants (UP Amendment) Act, 1960 (U.P.
Act No. 13 of 1960) as well as no basis was
recorded by the Board of Revenue.

19. In aforesaid circumstances, the
findings returned by Board of Revenue are
perverse, contrary to law as well as are selfcontrary.

20. Accordingly, writ petition is
allowed. Impugned order is set aside, and,
therefore, keeping in view that interim
order remained in currency, therefore, its
legal consequence shall follow.
----------
(2024) 12 ILRA 250
ORIGINAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 17.12.2024

BEFORE

THE HON'BLE SAURABH SHYAM
SHAMSHERY, J.

Writ B No. 5994 of 2012

Hindi Vidyapeeth ...Petitioners
Versus
Hindi Sahitya Sammelan & Anr.
 ...Respondents

Counsel for the Petitioners:
Anil Kumar Mehrotra,Kunal Ravi Singh,
V.K.S. Chaudhary

Counsel for the Respondents:
Amar Nath Tiwari,Azad Rai,Manish Kumar
Jain,Radhey
Shyam
Mishra,Ramesh
Chandra Dwivedi,Suresh Chandra Mishra

गवर्नमेंट ग्रांट्स एक्ट, 1895 - उत्तर प्रदेश भू-
ररजस्व अधिधर्यम, 1901; िररर: 33/39 -
वरद पोषणीयतर - ध ांदी सरध त्य सम्मेलर्, प्रयरग'
वषन १९१४ में पांजीकृत ुई। उत्तर प्रदेश सरकरर र्े लगभग
१०० बीघर धववरधदत भूधम कर अधिग् ण 'ध ांदी
धवद्यरपीठ, प्रयरग' की स्थरपर्र के धलए धकयर,
धजसमें स्पष्ट थर धक धववरधदत भूधम पर केवल 'ध ांदी
धवद्यरपीठ, प्रयरग' की स्थरपर्र ोगी। य भूधम
ररजस्व करगजरत में करधबज़ र ी और १४२० फसली में
श्रेणी २ में दजन थी। वषन १९९८ में 'ध ांदी सरध त्य
सम्मेलर्, प्रयरग' र्े उत्तर प्रदेश भूधम ररजस्व
अधिधर्यम, १९०१ की िररर ३३/३९ के अांतगनत एक
वरद दरयर धकयर धक धवपक्षी 'ध ांदी धवद्यरपीठ, प्रयरग'
12 All. Hindi Vidyapeeth Vs. Hindi Sahitya Sammellan & Anr.
251
कर र्रम धसकमी खरर्े से पृथक धकयर जरए।
उपधजलरधिकररी र्े वरद पोषणीय र् ोर्े के कररण वरद
धर्रस्त कर धदयर। अपर आयुक्त र्े र् केवल आदेश
धदर्रांक ११.०१.२००० (धजसमें वरद पोषणीय र् ीं
मरर्र गयर थर) धर्रस्त धकयर, वरर्् वरद को गुण-दोष
पर धर्स्तरररत भी कर धदयर। ररजस्व पररषद र्े धर्गररर्ी
को बल ीर् मरर्ते ुए वरद धर्रस्त धकयर। आयुक्त और
ररजस्व पररषद र्े वरद पोषणीयतर पर कोई धटप्पणी र् ीं
की। र् तो आयुक्त और र् ी ररजस्व पररषद र्े य धर्णनय
धदयर धक क्यर उत्तर प्रदेश भू-ररजस्व अधिधर्यम,
१९०१ के अांतगनत करयनवर ी की जर सकती ै, क्योंधक
धववरधदत भूधम उत्तर प्रदेश सरकरर द्वररर 'ध ांदी
धवद्यरपीठ, प्रयरग' के धर्मरनण ेतु दी गई थी। गवर्नमेंट
ग्रांट्स एक्ट, १८९५ के प्ररविरर् लरगू ोंगे यर र् ीं,
य भी धवचररणीय थर। य र्ॉर् जेड.ए. जमीर् थी।
उत्पररवतनर् अधभलेख धवधशष्ट व्यधक्त को कोई अधिकरर,
स्वरधमत्व यर ध त प्रदरर् र् ीं करतर, और ररजस्व
अधभलेख में उत्पररवतनर् केवल धवत्तीय उद्देश्य के धलए ो
सकतर ै। आयुक्त इलर रबरद और ररजस्व पररषद के
आदेश त्रुधटपूणन परए जरर्े पर धर्रस्त कर धदए गए तथर
पुर्ः धर्पटररे ेतु प्रयरगररज के आयुक्त को प्रेधषत धकयर
गयर। (Para 17, 19, 20, 22)

धर्स्तरररत (E-5)
सांदधभनत मरमलों की सूची :
1. पी.भकिोर कुमार प्रभत भिट्ठल के. पाटकार २०२३
आई.एन.एस.सी. १००९
2. सािणी बनाम इंिर कौर एिं अन्द्य (१९९६) ६
एस.सी.सी. २२३,
3. बलिंत भसंि और अन्द्य बनाम िौलत भसंि (मृत) द्वारा
भिभधक प्रभतभनभध और अन्द्य (१९९७) ७ एस.सी.सी.
१३७,
4. भजतेंर भसंि बनाम मध्य प्रिेि राज्य और अन्द्य २०२१
एस.सी.सी. ऑनलाइन एस.सी. ८०२

(Delivered by Hon'ble Saurabh Shyam
Shamshery, J.)

१-
"टहांदी
साटहत्य
सम्मेलन,
प्रयाग"
(सोसायिी रजजस्रीकरण अधिननयम, १८६० के
अांतगगत, टदनाांक ०८.०१.१९१४ द्वारा, एक रजजस्िर्ग
सांस्था) एवां उत्तर प्रदेश शासन के मध्य, एक
करार, टदनाांक ३ अक्िूबर १९२७ को हुआ, जजसके
द्वारा करीब ९९ बीघा १९ बबस्वा का एक स्थान
जो मौजा महेवा, पट्िी उपरहार, परगना अरैल,
तहसील करछना, जजला इलाहाबाद, में जस्थत है,
को उक्त सांस्था के भलए अधिग्रहण ककया गया,
जजसका
एकमात्र
उद्देश्य
एक
'टहांदी
ववद्यापीठ,प्रयाग' का ननमागण करना था, जो
ववद्याधथगयों को कृवि सांबांिी भशक्षा दे और एक
कृवि फामग की स्थापना करें। उक्त अधिकरण का
पूणग प्रनतफल उत्तर प्रदेश शासन को दे टदया
गया था।

२. कालाांतर में 'टहांदी ववद्यापीठ, प्रयाग' िी
सोसायिी रजजस्रीकरण अधिननयम, १८६० के
अांतगगत एक रजजस्िर्ग सांस्था, टदनाांक २४.३.१९३२
को हो गयी। इस सांस्था का प्रमुख उद्देश्य, 'टहांदी
साटहत्य सम्मेलन, प्रयाग' द्वारा स्थावपत 'टहांदी
ववद्यापीठ, प्रयाग' का सांचालन और प्रबांिन
करना है। बाबू पुरुिोत्तम दास िांर्न इस सांस्था
के प्रथम २५ सदस्यों में से एक थे। 'टहांदी
साटहत्य सम्मेलन, प्रयाग' की स्थाई सभमनत हर
विग ३ ररक्त (२५ सदस्यों में से) स्थानो पर
सदस्य नामाांककत कर सकती है। सभमनत के
ननयमानुसार, यह सांस्था अपने कायग हेतु ववत्तीय
ननणगयों को लेने के भलए स्वतांत्र है। ननयम १६
के अनुसार अगर यह सभमनत अपना कायग बांद
कर दे तो इसकी सारी सांपवत्त का अधिकारी 'टहांदी
साटहत्य सम्मेलन, प्रयाग' होगा। जैसा बताया
252 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
गया है कक टहांदी ववद्यापीठ सांस्था व सांस्थान
तथा कृवि फामग वतगमान मे िी उक्त िूभम पर
कायगरत हैं।

३. ऐसा प्रतीत होता है कक प्रारांि में दोनों
सांस्थायें सुचारू रूप से एवां दूसरे के टहत के भलए
कायग करती रहीां व इनका एकमात्र उद्देश्य रहा
कक टहांदी ववद्यापीठ सांस्थान का उद्देश्य पूणग हो
सके। कालाांतर में आपस में कुछ ववरोि उत्पन्न
हो गयें। जजसके कारण आज यह दोनों सांस्थाएां
एक दूसरे के समक्ष खर्ी हैं और वाद उच्च
न्यायालय तक आ पहुांचा है।

४. प्रारांि में राजस्व पड़ताल के दौरान
'टहांदी ववद्यापीठ, प्रयाग', राजस्व कागजात में
'काबबज' रहा और लैंर् ररकॉर्ग मैनुअल के पैरा
१२४ के अनुसार १४२० फसली में श्रेणी २ में दजग
रहा।

५. उपरोक्त के सांदिग में विग १९९८ अथागत
करीब ६ दशक के उपराांत 'टहांदी साटहत्य
सम्मेलन, प्रयाग' ने एक वाद सांख्या ४४/५ सन्
१९९८, उत्तर प्रदेश िू-राजस्व अधिननयम, १९०१
की िारा ३३/३९ के अांतगगत दायर ककया कक,
ववपक्षी 'टहांदी ववद्यापीठ, प्रयाग' का नाम
'भसकमी' खाने से पृथक ककया जाए। प्राथगना पत्र
में उपरोक्त इनतहास व दोनों सांस्थाओां के
उद्देश्य इत्याटद का कोई उल्लेख नहीां ककया
गया था। प्राथगना पत्र के महत्वपूणग अांश ननम्न
उल्लेखखत ककये जा रहे हैः-

" १. यह कक प्राथी टहन्दी साटहत्य
सम्मेलन का प्रबन्िमांत्री है।

२. यह कक प्राथी टहन्दी साटहत्य
सम्मेलन की समस्त चल अचल सम्पवत्त का
देख रेख एवम् सुरक्षा व्यवस्था करता है।

३. यह कक िूभम ननम्न पर टहन्दी
साटहत्य सम्मेलन का नाम खुदकाश्त के रूप में
कागजात मे दजग होता चला आ रहा है।

४. यह कक िूभम ननम्न पते पर
टहन्दी साटहत्य सम्मेलन का रखते हुये हमेशा
से रहा हैं और मुझकों इसके िौनतक अधिकार
प्राप्त है।

५. यह कक िूभम ननम्न पर टहन्दी
ववद्यापीठ का कमी कोई कब्जा दखल नही रहा
और न ही किी उसे ककसी प्रकार का िौभमक
अधिकार का प्राप्त रहा है।

६. यह कक िूभम ननम्न पर बबना
ककसी सक्षम अधिकारी के आदेश के ववपक्षी का
नाम भसकमी के रूप में दजग कर टदया है।

७. यह कक इस प्रकार की प्रववष्ि
महज भलखावि के िूल के कारण हुयी है।

८. यह कक प्राथगना पत्र देने का कारण
िूभम पर सम्बांिी पर नाम भसकमा के रूप में
दजग होने के कारण उत्पन्न हुआ है।

९- यह कक प्राथगना पत्र देने का कारण
माह जून सन् १९९८ ई० में ववपक्षी एक का नाम
भसकमी के रूप में दजग होने की जानकारी होने
के कारण उत्पन्न हुआ है।

१०- यह कक प्राथगना पत्र देने के
कारण न्यायालय के क्षेत्राधिकार के सीमा के
अन्तगगत पैदा हुआ है और न्यायालय को प्राथगना
पत्र सुनवाई का पूरा अधिकार प्राप्त है।

११- यह कक न्यायालय शुल्क मू०.
वाविगक है और उस पर ननयमानुसार अदा ककया
जाता है।
12 All. Hindi Vidyapeeth Vs. Hindi Sahitya Sammellan & Anr.
253

१२- प्राथी ननम्न उपसम की याचना
करता है-

यह कक िूभम पर से ववपक्षी का नाम
भसकमी खाने से पृथक ककया जाने का आदेश
टदया जावे।"

६. उक्त प्राथगना पत्र का वादी 'टहांदी
ववद्यापीठ, प्रयाग' ने ववरोि ककया और अपनी
आपवत्त दायर की व कई दस्तावेज िी सांलग्न
ककए। जजसके महत्वपूणग अांश ननम्नभलखखत
उद्दीखणगत ककये जा रहे हैः-

"६. यह कक प्राथगना पत्र की िारा ६
स्वीकार नहीां है वादग्रस्त िूभम पर हमेशा से ही
हीन्दी ववद्यापीठ का अध्यासन रहा चला आ
रहा है और आवेदक का इस पर किी िी कब्जा
व दखल नहीां रहा।

१४. यह कक आवेदक वववाटदत िूभम
के किी िी जमीांदार नहीां थे। अतः उनके नाम
वादग्रस्त िूभम अगर अभिलेखों में खुद काश्त
करके दजग है तो सवगथा गलत है।

१५. यह कक िूलेख ननयमावली के
अन्तगगत सवग प्रथम कब्जे की प्रववजष्ि खसरे में
होती है और कालान्तर में पयगवेक्षक कानूनगो के
आदेशानुसार खसरे की उक्त प्रववजष्ि के आिार
पर भसकमी का इन्राज ककया जाता है।

१६. यह कक वतगमान आवेदन पत्र
भसकमी की प्रववजष्ि को ननरस्त कराने हेतु है
अतः
यह
दावा
िारा
३३/३९
िू-राजस्व
अधिननयम की पररधि मे नही आता बजल्क इस
प्रकार का आवेदन पत्र िारा २८ िू -राजस्व
अधिननयम की पररिी मे आता है जजसके
सुनवाई का क्षेत्राधिकार केवल जजलाधिकारी को
है। इस आिार पर इस न्यायालय को प्रस्तुत
प्राथगना पत्र के ननस्तारण का ववधिक अधिकार
नहीां है।

१७. यह कक वादग्रस्त िूभम टहन्दी
ववद्यापीठ के भलए राज्य सरकार द्वारा सन्
१९२७ में अधिग्रटहत की गई थी जजसके मुआवजे
की िनराभश का िुगतान टहन्दी ववद्यापीठ के
कोि से ककया गया था।

१८. यह कक वववाटदत िूभम पर विग
१९२७-२८ से ही टहन्दी ववद्यापीठ का ही
अध्यासन चला आ रहा है और उसमे से ग्राम
मीरखपुर की तमाम िूभम में टहन्दी ववद्यापीठ
के िवन पशुशाला एवां कृवि फामग मे कायगरत
कमगचाररयों के भलए क्वािगर िी बने है।

१९. यह कक ग्राम महेवा पजश्चम
पििी मे िी टहन्दी ववद्यापीठ का नलकूप लगा
है तथा पक्की नाभलयााँ बनी है जजनके ननमागण
मे टहन्दी ववद्यापीठ का ही िन व्यय हुआ है।
अलावा इसके महेवा पजश्चम पििी की िूभम में
टहन्दी ववद्यापीठ की चहरदीवारी िी बनी है।

२०. यह कक सम्पूणग वववाटदत िूभम
टहन्दी ववद्यापीठ के ही सीमाांकन ननशान से
नघरी हुई है। कही-कही पर पक्की चहरदीवारी
कही-कही किीले तार सरपत की झार् से
ववद्यापीठ की िूभम नघरी हुई है।

२१. यह कक टहन्दी साटहत्य सम्मेलन
से वववाटदत िूभम से किी िी कोई वास्ता या
सरोकार नहीां रहा है और न उनका उस पर
किी कब्जा व दखल ही रहा है इस आिार पर
िी उनका आवेदन पत्र ननरस्त होने योग्य है।"

७. तहसीलदार, करछना ने एक आख्या
टदनाांक ०२.०७.९८ प्रेवित करी, कक वववाटदत िूभम
पर वादी 'टहांदी ववद्यापीठ,प्रयाग' का नाम
त्रुटिवश व बबना ककसी सक्षम न्यायालय के
254 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
आदेश से अांककत हुआ है, अतः सांशोिन कर
प्रनतवादी 'टहांदी साटहत्य सम्मेलन, प्रयाग' का नाम
'खुदकाश्त' के रूप में अांककत होना चाटहए।

८. उप जजलाधिकारी, करछना ने आदेश
टदनाांक ११.०१.२००० द्वारा प्रनतवादी का वाद
पोिणीय न होने के कारण ननरस्त कर टदया।
प्रनतवादी का तकग कक वो खुदकाश्त को
आिारहीन माना। क्योकक वववाटदत िूभम नॉन
जेर्.ए. (Non Z.A.) की िूभम है, इसभलए न तो
वो जमीांदार हो सकते है और न तो उन्हें
(अकृविक) िूभम का िूभमिर ही माना जा सकता
है। स्वत्व के अधिकार के भलए वादी व प्रनतवादी
स्वतांत्र
है।
आदेश
के
महत्वपूणग
अांश
ननम्नभलखखत उद्दीखणगत ककये जा रहे हैंः-

"मैने
उिय
पक्षों
के
ववद्वान
अधिवक्ताओां को ववस्तार से सुना एवां पत्रावली
पर उपलब्ि समस्त अभिलेखीय व मौखखक
साक्ष्यों का िली िाांनत परीक्षण ककया। पत्रावली
पर उपलब्ि गजि नोटिकफकेशन सन् १९२७ की
प्रनत से स्पष्ि है कक उक्त िूखण्र् राज्य सरकार
द्वारा टहन्दी ववद्यापीठ के पक्ष में अधिग्रटहत
की गयी थी जजसके फलस्वरूप टहन्दी ववद्यापीठ
का कब्जा दखल वववाटदत िूखण्र्ों पर आज िी
बना हुआ है। इसभलए वादी का यह कथन
मानने योग्य नही है कक टहन्दी ववद्यापीठ का
नाम भलवपकीय त्रुटि के कारण अभिलेखों में
अांककत है यहाां यह िी उल्लेखनीय है कक वादी
द्वारा खसरे की प्रववष्ि को ननरस्त कराने के
उद्देश्य से प्रस्तुत वाद दायर ककया गया है
जो िारा ३३/३९ में स्वीकार करने योग्य नही
प्रतीत होता जहाां तक वादी का यह तकग कक
वे खुद काश्त के रूप में अांककत है। इसभलए
िी स्वीकार करने योग्य नही है। ताकक
वववाटदत िूखण्र् नान जेर् ए की िूभम है
जजसके वे जमीांदार नही हो सकते और न ही
उन्हे श्रेणी १५ (आकृविक) िूभम का िूभमिर
माना जा सकता है। इसभलए िी वादी का
वाद पोिणीय नही हैं यटद वादी को अपने
स्वत्व का अधिकार की घोिणा कराना हो तो
उन्हे सक्षम न्यायालय में ववटहत प्रावविानों के
अन्तगगत चाराजोई प्राप्त करनी चाटहए। इस
प्रकार िारा ३३/३९ िू० रा.अधि० के अन्तगत
टदया गया प्रस्तुत आवेदन पत्र बलहीन है।
िारा ३३/३९ के अन्तगत मात्र भलवपकीय त्रुटि
का सांशोिन ककया जा सकता है। जबकक
प्रस्तुत प्रकरण मे भलवपकीय त्रुटि से प्रनतवादी
का नाम अांककत होना प्रमाखणत नही होता ।

अतएव
उपरोक्त
वववेचना
के
आिार पर प्रस्तुत वाद पोिणीय न होने के
कारण ननरस्त ककया जाता हैं बाद आवश्यक
कायगवाही पत्रावली दाखखल दफ्तर हो।"

९. उपरोक्त आदेश टदनाांक ११.०१.२०००
से क्षुब्ि होकर प्रनतवादी 'टहांदी साटहत्य
सम्मेलन,प्रयाग' ने अपर आयुक्त, इलाहाबाद
मण्र्ल के समक्ष एक ननगरानी प्रस्तुत की, जो
आदेश टदनाांक २८.७.२००४ द्वारा स्वीकार कर
ली गई और न केवल आदेश टदनाांक
११.०१.२००० (जजसके द्वारा वाद पोिणीय
नहीां माना था) ननरस्त ककया गया वरन् वाद
को गुण-दोि पर ननस्ताररत िी कर टदया।
वादी के पक्ष में अांकन ननरस्त कर टदया व
प्रनतवादी के पक्ष में अांकन करने का आदेश
पाररत कर टदया। आदेश के प्रमुख अांश
ननम्न हैः-
12 All. Hindi Vidyapeeth Vs. Hindi Sahitya Sammellan & Anr.
255

"
मैने
उियपक्षों
के
ववद्वान
अधिवक्तागण के तको को सुना तथा पत्रावली
का सम्यक् अवलोकन ककया।

पत्रावली के अवलोकन से ववटदत
होता है कक ववद्वान अवर न्यायलय ने प्रश्नगत
मामले में तहसीलदार की आख्या तलब की थी।
तहसीलदार की आख्या टदनाांक २६.६.१९९८ में
वववाटदत िूभम पर ववपक्षी टहन्दी ववद्यापीठ का
नाम िाग २ में दजग है। यह अांकन बबना ककसी
सक्षम अधिकारी के आदेश से ककया गया है।
पत्रावली के अवलोकन से यह िी स्पष्ि है कक
ननगरानीकताग टहन्दी साटहत्य सम्मेलन का नाम
शासकीय अभिलेखों में खुदकाश्त दजग है।
ववद्वान अवर न्यायालय में िाग-२ की प्रववजष्ि
को एक लम्बी प्रववजष्ि मानते हुये अभिलेख
सांशोिन करने के इनकार कर टदया है। जो की
उधचत नही है। अभिलेख में त्रुटि स्पष्ि है यह
िी स्पष्ि है कक यह त्रुटि बबना ककसी सक्षम
अधिकारी के आदेश की गयी है। पत्रावली में
सांलग्न विग १९२७ का गजि से स्पष्ि है कक
प्रश्नगत सांस्था टहन्दी साटहत्य सम्मेलन तथा
उ०प्र० सरकार के बीच में एक एग्रीमेंन्ि हुआ था
उस समय ववपक्षी का कोई अजस्तत्व नही था।
बजल्क ननगरानीकताग बतौर खुद काश्त सुदीघगकाल
से दजग था अतः उसे अपने सत्व को उद्घोवित
कराने की कोई आवश्यकता नही थी जैसा कक
ववद्वान अवर न्यायालय ने अविाररत ककया है
आर० र्ी० १९८७ पृष्ठ ३ कलावती बनाम गाांव
सिा में माननीय राजस्व पररिद की पूणगपीठ ने
यहाां तक अविाररत ककया है कक यटद चकबांदी
के साथ िी गलत इन्राज है तो उसका सांशोिन
करने का अधिकार कलेक्िर को है। ऐसे प्रकरणों
की सरसरी तौर पर ननरस्त नही ककया जा
सकता ऐसे प्रकरण िारा-३३/ ३९ के पररसीमा में
आते है। और ऐसे प्रकरणों का सांशोिन िारा
३३/३९ के अन्तगगत ककया जा सकता है। ववरोिी
पक्ष का िाग-२ में अांकन १४०३ फ० से है। यह
अांकन बबना ककसी सक्षम अधिकारी के आदेश के
है जो ववधि सम्मत नही हैं जैसा कक आर० र्ी०
१९८६ पृष्ठ २५३ तथा आर०र्ी० १९८७ पृष्ठ ३
पर अभिटहत ककया है।

अस्तु उक्त वववेचना के आिार पर
ननगरानी स्वीकार की जाती है। अवर न्यायालय
द्वारा पाररत आदेश टदनाांक ११.०१.२००० एतद्
द्वारा खांजण्र्त ककया जाता है। ववद्वान अवर
न्यायालय की पत्रावली मेरे आदेश के अनुपालन
हेतु प्रेवित की जावे। तथा इस न्यायालय की
पत्रावली दाखखल दफ्तर हो।"

१०. वादी ने उपरोक्त आदेश के ववरुद्ि
एक ननगरानी राजस्व पररिद के समक्ष प्रस्तुत
करी, जो आदेश टदनाांक १३.०९.२०११ द्वारा
बलहीन मानते हुए ननरस्त कर दी गई। आदेश
के प्रमुख अांश ननम्न हैः-

"इस प्रकरण में महत्वपूणग तथ्य यह
देखा जाना है कक ककस प्रकार से वगग-२ का
इन्राज अभिलेखों में दजग ककया गया। अपर
आयुक्त ने अपने प्रश्नगत आदेश में स्पष्ि रूप
से यह ननष्किग ननकाला है कक ननगरानीकताग के
पक्ष में वववाटदत िूभम पर वगग-२ का इन्राज
बबना ककसी सक्षम अधिकारी के आदेश के दजग
ककया गया है। अतः कागज दुरूस्ती के वाद
अन्तगत िारा-३३/३९ िू-राजस्व अधिननयम के
तहत इस प्रकार की गलनतयों को शुद्ि ककया
जाना पूरी तरह से न्यायोधचत है। इस मामले में
इस बात पर कोई वववाद नहीां है कक वादग्रस्त
िूभम पर ववपक्षीगण का नाम िूभमिरी के रूप
256 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
में दजग है। इन पररजस्थनतयों में यह तथ्य
महत्वपूणग है कक िूभमिरी की िूभम पर कैसे
ननगरानीकताग का नाम वगग-२ में आ गया इसकों
भसद्ि करने का प्रयास ननगरानीकताग की ओर से
होना चाटहए था जो कक वह नही कर पाये। इन
पररजस्थनतयों में मै स्वांय को अपर आयुक्त
द्वारा टदये गये प्रश्नगत आदेश से सहमत पाता
हूाँ। मेरे ववचार से अपर आयुक्त का प्रश्नगत
आदेश टदनाांक २८.०७.२००४ ववधिक है तथा
इसमें ककसी पररवतगन का कोई औधचत्य नही है।
ननगरानी बलहीन होने के कारण ननरस्त ककये
जाने योग्य हैं जजसे एतद्वारा ननरस्त ककया
जाता है।"

११. उपरोक्त वखणगत आदेश २८.०७.२००४ व
१३.०९.२०११, वतगमान याधचका के वादी द्वारा
आक्षेवपत ककए गए है।

याचिकाकर्ाा का पक्ष

१२.
याधचकाकताग
के
ववद्वान
अधिवक्ता श्री बत्रवेणी शांकर, श्री अननल कुमार
मेहरोत्रा व श्री ववपुल कुमार ने ननम्न तकग
प्रस्तुत ककयेः-

(क) वादी 'टहांदी ववद्यापीठ, प्रयाग' का
स्वतांत्र रूप से वववाटदत िूभम पर कब्जा है। यह
सांस्था स्वतांत्र रूप से सांचाभलत है। सांस्था ने
अपने व्यय से वववाटदत िूभम पर ववकास ककया
है। प्रनतवादी का वववाटदत िूभम पर किी िी
िौनतक रूप से या परोक्ष रूप से कोई कब्जा
नहीां रहा है।

(ख) वववाटदत िूभम, प्रनतवादी को उत्तर
प्रदेश सरकार द्वारा एक करार के रूप में दी गई
थी। जजसका एक ही उद्देश्य था कक 'टहांदी
ववद्यापीठ, प्रयाग' (वादी) स्थावपत हो और उसके
स्थापना के उपराांत, वादी ही वववाटदत िूभम पर
काबबज रहा। करार की शतों के अनुसार ही
िूभम का काबबज या माभलक ननिागररत ककया जा
सकता है। जजसका आक्षेवपत आदेशों में कोई
ववचार नहीां ककया गया। िूभम का अधिकारी कौन
है, इसका ननिागरण करार की शतों व वादी एवां
प्रनतवादी सांस्था के ननयमों के आिार पर ही
ककया जा सकता हैैै। मात्र इस कारण से िी
कक करार के समय वादी का जन्म ही नहीां हुआ
था, प्रनतवादी के पक्ष में ननणगय नहीां टदया जा
सकता है। इसके भलए उनके करण एवां बाद में
वादी की सांस्था के ननयमों पर िी मनन करना
पड़ेगा।

(ग) उपरोक्त कारणवश वववाटदत
िूभम,
िारा
३३/३९,
उ०प्र०
िू-राजस्व
अधिननयम,१९०१ के अांतगगत ननिागररत नहीां
ककया जा सकता है। प्रनतवादी 'टहांदी साटहत्य
सम्मेलन, प्रयाग' किी िी वववाटदत िूभम का
स्वामी नहीां रहा। वह किी िी खुदकाश्त िी नहीां
रहा।
वववाटदत
िूभम
हमेशा
'टहांदी
ववद्यापीठ,प्रयाग' के आधिपत्य में रही व वहीां
इसकी देखरेख करता रहा एवां आज िी कर रहा
है।

(घ) वादी 'टहांदी ववद्यापीठ,प्रयाग' के
नाम का अांकन श्रेणी २ में ननयमानुसार था।
उसको ननरस्त करने में वैिाननक त्रुटि करी गई
है। 'टहांदी ववद्यापीठ,प्रयाग' एक रजजस्िर्ग सांस्था
है। यह वववाटदत िूभम उसी सांस्था के स्थापना
के भलए उत्तर प्रदेश सरकार ने अधिग्रटहत की
थी, जो कृवि भशक्षा,कृवि कायग के प्रयोजन के
भलए स्थावपत और वतगमान में कायगशील िी है।

(ङ) वादी के ववद्वान अधिवक्ता ने
अपने तकों को मजबूती प्रदान करने के भलए
अजीम अहमद काज़मी एवं अन्य बनाम उत्तर
12 All. Hindi Vidyapeeth Vs. Hindi Sahitya Sammellan & Anr.
257
प्रदेश सरकार एवं अन्य २००२ ए.एल.एल. सी.जे.
६४ (डी.बी.); श्रीमर्ी हदीसुल ननशा बनाम
एडडशनल कममश्नर (जुडीमशयल), फैजाबाद एवं
अन्य २०२१ (१५२) आर.डी. ४२६ र्था शैलेन्र
मसंह एवं अन्य बनाम एडडशनल कममश्नर (एड.),
अयोध्या डड०, अयोध्या एवं अन्य २०२४ (१६३)
आर.डी. ६७ के मामलों में पाररत, उच्च
न्यायालय, इलाहाबाद के ननणगयों को उद्िररत
ककया।

प्रनतवादी का पक्ष

१३. (क) प्रनतवादी के ववद्वान वररष्ठ
अधिवक्ता, श्री प्रमोद जैन ने उत्तर प्रदेश सरकार
व टहांदी सम्मेलन के मध्य करार का सांदिग देते
हुए कहा कक, उस करार के समय वादी 'टहांदी
ववद्यापीठ,प्रयाग' पैदा ही नहीां हुआ था। अतः
उसका वववाटदत िूभम पर कोई अधिकार हो ही
नहीां सकता है।

(ख) वादी के पक्ष में अांककत राजस्व
प्रववजष्ि, का कोई ववधिक आिार न होने के
कारण ननरस्त करने योग्य थी। अतः आयुक्त,
इलाहाबाद ने ववधिक आदेश पाररत कर उक्त
प्रववजष्ि को ननरस्त कर प्रनतवादी का नाम
अांककत करने का ववधियुक्त आदेश टदया।

(ग) वादी 'टहांदी ववद्यापीठ, प्रयाग',
प्रनतवादी 'टहांदी साटहत्य सम्मेलन, प्रयाग' के
अांतगगत बनाई गई एक सांस्था है, जजसका कायग
उक्त ववद्यापीठ को सांचाभलत करना है।
वववाटदत िूभम का स्वाभमत्व हमेशा से 'टहांदी
साटहत्य सम्मेलन, प्रयाग' का रहा है।, 'टहांदी
ववद्यापीठ, प्रयाग' सांस्था के ननयमावली के
अनुसार, अगर वह उक्त कायग में असफल होती
है, तो समस्त सांपवत्त का अधिकारी प्रनतवादी
'टहांदी साटहत्य सम्मेलन, प्रयाग' ही होगा, अतः
वववाटदत िूभम का स्वाभमत्व सदैव 'टहांदी
साटहत्य सम्मेलन, प्रयाग' का ही रहा है।

(घ) 'टहांदी ववद्यापीठ, प्रयाग', 'टहांदी
साटहत्य सम्मेलन, प्रयाग' की ही एक सांस्था है,
जजसका अपना स्वतांत्र अजस्तत्व नहीां है।
'भसकमी काश्तकार' ,काश्तकार के अांतगगत होता
है। वादी अपने पक्ष में अांककत राजस्व प्रववजष्ि
के सांदिग में कोई ववधिक आदेश प्रस्तुत करने
में असफल रहा है। वतगमान मामला केवल
वाविगक रजजस्िर की गलनतयों के सुिार का है,
जजस पर आयुक्त व राजस्व पररिद नें उधचत
न्यानयक ननणगय पाररत ककया हैं, जजसमें ककसी
िी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीां है।

(ङ) िारा ३३/३९, उ०प्र० िू-राजस्व
सांटहता, १९०१, की कायगवाही एक सरसरी कायगवाही
है तथा वादी और प्रनतवादी अपने अधिकार के
भलए उधचत कारगवाई करने के भलए स्वतांत्र है।
प्रनतवादी ने एक वाद िारा ५९, काश्तकारी
अधिननयम १९५९ के अांतगगत दायर ककया है।

१४. उिय पक्षों के ववद्वान अधिवक्ताओां
को सुना एवां पत्रावली का पररशीलन ककया।

१५. 'टहांदी साटहत्य सम्मेलन, प्रयाग' की
स्थापना १ मई, १९१० में नागरीय प्रचाररणी
समाज के तत्वािान में हुई। विग १९१४ में यह
सांस्था पांजीकृत हुई। श्री पुरुिोत्तम दास िांर्न
सम्मेलन के सदस्य व मांत्री रहें। ऐसा कहा जाता
है वह इसके उत्थान के भलए जजयें और इसभलए
उन्हें 'सम्मेलन के प्राण' के नाम से सांबोधित िी
ककया जाता रहा है। इस सांस्था के ननम्न
उद्देश्य रहेः-
258 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES

"क- टहन्दी साटहत्य सम्मेलन के सब
अांगो की पुजष्ि और उन्ननत का प्रयत्न करना।

ख- देशव्यापी व्यवहारां और कायों को
सुलि करने के भलए राष्रभलवप देवनागरी और
राष्रिािा टहन्दी का प्रचार करना।

ग- टहन्दी िािा को अधिक सुगम,
मनोरम, व्यापक और समृद्ि बनाने के भलए
समय-समय पर उसके अिावों को पूरा करना
और उसकी शैली में सांशोिन और त्रुटियों को दूर
करने का प्रयत्न करना।

घ-
टहन्दी-साटहत्य
की
दुलगि
पाण्र्ुभलवपयों और पुस्तकां की सुरक्षा के भलए
टहन्दी- सांग्राहलय, पुस्तकालय व वाचनालय की
स्थापना तथा टहन्दी-माध्यम से परीक्षाओां का
सांचालन करना आटद।"

१६. ऐसा िी कहा जाता है कक ववशेि रूप
से श्री पुरुिोत्तम दास िांर्न के अथक प्रयास से
उत्तर प्रदेश सरकार ने करीब १०० बीघा जमीन
(अब वववाटदत िूभम) का अधिग्रहण 'टहांदी
ववद्यापीठ, प्रयाग' की स्थापना के भलए ही
ककया। जो करार के वववरण से स्पष्ि िी होता
है कक वववाटदत िूभम पर केवल 'टहांदी ववद्यापीठ,
प्रयाग' की ही स्थापना होगी एवां उसका उपयोग
कृवि भशक्षा व कृवि फामग के कायग के भलए ही
ककया जाएगा और ऐसा प्रतीत होता है कक उक्त
ववद्यापीठ के उधचत सांचालन का िूभम के
ववधिक उपयोग के भलए एक अलग सांस्था 'टहांदी
ववद्यापीठ, प्रयाग' का ननमागण ककया गया, जो
उस सांस्था के स्थापना व सांचालन के भलए
बनाई गई। उक्त सांस्था की ननयमावली के
अनुसार वह अपने कायों के भलए स्वतांत्र है, परांतु
अगर सांस्था कायग न कर पाए तो समस्त सांपवत्त
पर 'टहांदी साटहत्य सम्मेलन' का स्वाभमत्व हो
जाएगा। वाद के तथ्यों में वह दशा अिी
अनुपजस्थत है।

१७. उपरोक्त पृष्ठिूभम में यह ननिागररत
करना कक वादी के पक्ष में अांककत राजस्व
प्रववजष्ि ववधिक है अथवा नहीां। इस वाद बबन्दु
के ननिागरण के भलए, उपरोक्त वखणगत सांस्थाओां
की ननयमावली का अध्ययन िी आवश्यक हो
जाता है, परांतु आयुक्त व राजस्व पररिद ने
उक्त पक्ष पर ध्यान नहीां टदया। यह िी
महत्वपूणग
रहेगा
कक
उ०प्र०
िू-
राजस्व
अधिननयम, १९०१ के अांतगगत कायगवाही हो िी
सकती है अथवा नहीां, क्योंकक वववाटदत िूभम,
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एक करार के माध्यम
से 'टहांदी ववद्यापीठ, प्रयाग' के ननमागण हेतु ही दी
गई थी। तो क्या गवनगमेंि ग्राांट्स एक्ि (सरकारी
अनुदान अधिननयम, १८९५) के प्राविान लागू
होंगे, यह िी ववचारणीय रहेगा। यह िी
ववचारणीय रहेगा कक यह नॉन जेर्. ए. की िूभम
है, और जैसा उप-जजलाधिकारी ने िू-राजस्व
अधिननयम के अांतगगत प्राथगना पत्र ही अपोिणीय
माना था। परांतु न तो आयुक्त ने और न ही
राजस्व पररिद ने इस ववधिक वविय पर कोई
ध्यान टदया और न ही कोई उधचत व न्याय
सांगत कारण से पोिणीयता के वविय पर ननणगय
टदया गया, को गलत या ननरािार काररत ककया।
अतः आयुक्त व राजस्व पररिद ने ववधिक त्रुटि
काररत की है।

१८. आयुक्त व राजस्व पररिद ने वाद
पोिणीय है अथवा नहीां, पर िी कोई टिप्पणी
नहीां की है। वादी द्वारा अनेक दस्तावेज िी
सांलग्न ककये गये थे परांतु उस पर िी कोई
ध्यान नहीां टदया।
12 All. Hindi Vidyapeeth Vs. Hindi Sahitya Sammellan & Anr.
259

१९. उच्चतम न्यायालय ने पी.ककशोर
कुमार प्रनर् ववठ्ठल के. पटकार २०२३
आई.एन.एस.सी. १००९ के ननर्ाय में
सावर्ी
बनाम
इंदर
कौर
एवं
अन्य
(१९९६) ६ एस.सी.सी. २२३, बलवंर् मसंह
और अन्य बनाम दौलर् मसंह (मृर्) द्वारा
ववचिक प्रनर्ननचि और अन्य (१९९७) ७
एस.सी.सी. १३७, जजर्ेंर मसंह बनाम मध्य
प्रदेश राज्य और अन्य २०२१ एस.सी.सी.
ऑनलाइन एस.सी. ८०२ के मामलों में पूवग
में पाररत ननणगयों का उल्लेख करते हुए
एक बार कफर से ननिागररत ककया कक
उत्पररवतगन प्रववजष्ि व्यजक्त के पक्ष में
कोई अधिकार, स्वाभमत्व या टहत प्रदान
नहीां करती है और राजस्व अभिलेख में
उत्पररवतगन प्रववजष्ि केवल ववत्तीय उद्देश्य
के भलए ही हो सकती है।

२०. सामान्यतः ऐसे मामलों में जहाां
कायगवाही सरसरी होती है, उच्च न्यायालय
अनुच्छेद २२६ के अांतगगत वृहद क्षेत्राधिकार
होते हुए िी हस्तक्षेप नहीां करता है। जब
तक वववाद पोिणीयता का न हो या ककसी
ववधि का स्पष्ि रुप से उल्लांघन न हुआ
हो।वतगमान प्रकरण में, जैसा पूवग प्रस्तरों में
यह ननिागररत ककया गया है कक इस वाद में
पोिणीयता का सारवान वविय अन्तननगटहत है
तथा आयुक्त व राजस्व पररिद ने इस
वविय पर मनन नहीां ककया है, अतः यह
न्यायालय आक्षेवपत आदेशों में हस्तक्षेप
करना उधचत व न्यायटहत मानता है।

२१. इस ननणगय को पूणग करने से
पहले, उपरोक्त के सांदिग में यह उल्लेख
करना आवश्यक है, कक उक्त दोनों सांस्थाओां
के समस्त पदाधिकाररयों से यह अपेक्षा है,
कक वो मनमुिाव िुलाकर, आपस में सांवाद
करके वववाद को सुलझाने पर ववचार, यह
ध्यान रखकर करें कक दोनों सांस्थाओां का
वववाटदत िूभम से सांबांि का उद्देश्य, कक
ववद्यापीठ व कृवि फामग को एक उच्च
स्तरीय भशक्षा सांस्थान बनाया जा सके
,समान है एवां आपसी कलह के कारण इस
महत्वपूणग उद्देश्य का ह्रास हो रहा है, जो
इन सांस्थाओां के सांस्थापकगण, ववशेि रुप
से श्री पुरुिोत्तम दास िांर्न द्वारा अपने
जीवनकाल में इस सांस्था के भलए ककये गये
कायों को असफल करने की ओर ले जा रहा
है। दोनों सांस्थाओां का साथ-साथ भमलकर
कायग करना ही उनके भलए सच्ची श्रद्िाांजभल
होगी। अन्यथा, उत्तर प्रदेश शासन को
वववाटदत िूभम को वापस लेने के भलये,
ववधिवत् कायगवाही करने की स्वतांत्रता हो
सकती है।

२२. उपरोक्त के सांदिग में आयुक्त,
इलाहाबाद द्वारा पाररत आदेश टदनाांक
२८.०७.२००४, तथा राजस्व पररिद द्वारा
पाररत आदेश टदनाांक १३.०९.२०११, दोनो
ही त्रुटिपूणग होने के कारण ननरस्त ककये
जाते
है
एवां
आयुक्त,
प्रयागराज को
वतगमान वाद इस आशय से प्रनतप्रेवित
ककया जाता है कक उपरोक्त वववेचना को
ध्यान में रखते हुए, अपील का पुनः
ननिागरण, शीघ्र करें।

२३. वतगमान याधचका उपरोक्त आदेश व
ननदेश के साथ ननस्ताररत की जाती है।
----------
260 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
(2024) 12 ILRA 260
ORIGINAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 11.12.2024

BEFORE

THE HON'BLE SAURABH SHYAM
SHAMSHERY, J.

Writ B No. 10320 of 1983

Ashok Kumar ...Petitioner
Versus
D.D.C. ...Respondent

Counsel for the Petitioner:
Rajeshwar Tiwari, Dipendra Kumar, Faujdar
Rai, O.P. Mishra, Pradeep Kumar Rai

Counsel for the Respondent:
S.N. Singh, R.N. Singh, Rahul Sahai, SC

A. The Hindu Adoptions and Maintenance
Act, 1956 - Sections 7 & 11 - Section 7 -
Capacity of a male Hindu to take in
adoption - Any male Hindu who has a wife
living shall not adopt except with the
consent of his wife - S. 11, Conditions for
a valid adoption - In every adoption, the
child to be adopted must be actually given
and taken in adoption by the parents with
intent to transfer the child from the family
of its birth to the family of its adoption. It
is mandatory for an adoption to be treated
as valid that two important conditions
mentioned in Section 11 of the Act of 1956
are present, i.e., the consent of wife
before a male Hindu adopts a child, and
proof of a ceremony of giving and taking
adoption. (Para 12)

B. Civil Law - U.P. Consolidation of
Holdings Act, 1953 - Section 9-A(2) -
Adoption - Objections filed u/s 9-A(2)
by the petitioner on basis of a
registered
adoption
deed,
whereas
other two objections were filed on
basis of an unregistered will and on
basis
of
inheritance.
Consolidation
Officer rejected objections filed by the
petitioner
and
held
that
adoption
proceedings were not legal and were
not in accordance with law, as the
adoption deed was not signed by the
adopted mother. C.O. returned finding
that the wife of Bhuneshwar Singh
(adopted father) was not visible in
photographs.
Wife
of
Bhuneshwar
(adopted father) had not put her
signature or thumb impression on the
adoption
deed.
Even
the
wife
of
Subedar Singh (natural father) was
also absent, and as such, the said
document was not sufficient to prove
adoption.
Objection
on
basis
of
inheritance was only accepted. Appeal
of petitioner was allowed and held that
registered adoption deed was a valid
document and adoption was carried
out
by
a
due
legal
process.
A
registered
document
carries
presumption
unless
rebutted.
Settlement Officer Consolidation did
not refer to the presence of wife of the
adopted father and did not set aside
the
findings
returned
by
the
Consolidation
Officer.
Board
of
Revenue held that since the wife of
Bhuneshwar (adopted father) had not
signed
the
adoption
deed,
which
indicates that she had not given her
consent for adoption, which was a
mandatory
requirement.
Held
-
Adopted
father
and
mother
of
petitioner died prior to proceedings.
Wife of adopted father had not signed
the
adoption
deed,
and
the
photographs also indicate that she had
not participated in the ceremony. One
witness had not even identified her in
photographs, therefore, the Court was
of
the
opinion
that
mandatory
requirement that person who adopts a
child must have consent of his wife
was absent. Adoption was not legally
valid. (Para 18)

Dismissed. (E-5)

List of Cases cited:

1. Uttam Chandra & ors. Vs St. of U.P. & ors.,
2023:AHC:225752