# Jibrail @ Baba v. State of U.P

- **Citation:** (2025) 9 ILRA 1142
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2025-09-08
- **Case number:** Criminal Misc. Anticipatory Bail Application U/S 482 BNSS No. 1110 of 2025
- **Bench:** Subhash Vidyarthi
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/jibrail-baba-v-state-of-u-p-53865
- **Pages:** 5

## Headnote

G.A.

ISSUE FOR CONSIDERATION
Whether
the
applicant
can
be
granted
anticipatory bail when the only evidence against
him is the statement of a co-accused in custody.

HEADNOTES
Criminal
Law
-
Bharatiya
Nagarik
Suraksha Sanhita, 2023 - Section 482, -
Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS), 2023 -
Sections - 305(A), 331(4), 317(2) -
Criminal Procedure Code, 1973 - Sections
438- Anticipatory Bail Application - filed under
Section 482 B.N.S.S. by the applicant - FIR -
offence of theft of Rs. 17000/- and jewellery -
Applicant implicated solely on co-accused's
custodial statement - Sessions Judge rejected
anticipatory bail relying on Pradeep Sharma
(2014) and Iddu v. State of U.P. (2023) - Court
held that constitutional bench rulings (Sibbia,
Sushila Aggarwal) prevail over smaller bench
decisions -Anticipatory bail is not exceptional but
a recognized remedy - Applicant entitled to
anticipatory bail subject to conditions. (Para -
13, 14, 16)
Application Allowed. (E-11)

CASE LAW CITED

## Text

1142 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
attempt on the part of accused to
procrastinate, resulting in delaying the trial,
any instance of threats being extended to
the witnesses or tampering with the
evidence in any manner, which has also not
been pointed out by learned counsel for the
applicant. In Ajwar (supra), the Hon'ble
Apex Court has observed that the Courts
may remain cautious while granting bail to
the accused and avoid making such detailed
reasoning as may prejudice the accused and
only prima facie case has to be seen at the
stage of bail. Besides the fact that the
offence alleged is triable by Magistrate,
none of the grounds enumerated in the
above mentioned decision of the Hon'ble
Apex Court for considering cancellation of
bail granted is available, in the present
facts, therefore, in the opinion of the Court,
learned counsel for the applicant could not
point out any good ground for cancelling
the bail granted to the opposite party no.2
vide order dated 01.01.2025, passed by
learned Additional Sessions Judge, Court
No.6, District Ghaziabad.

9. Accordingly, the bail cancellation
application lacks merit and is rejected.
----------
(2025) 9 ILRA 1142
ORIGINAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: LUCKNOW 08.09.2025

BEFORE

THE HON'BLE SUBHASH VIDYARTHI, J.

Criminal Misc. Anticipatory Bail Application U/S
482 BNSS No. 1110 of 2025

Jibrail @ Baba ...Applicant
Versus
State of U.P. ...Opposite Party

Counsel for the Applicant:
Priyanka Yadav, Rizwanul Haque Ansari,
Santi

Counsel for the Opposite Party:
G.A.

ISSUE FOR CONSIDERATION
Whether
the
applicant
can
be
granted
anticipatory bail when the only evidence against
him is the statement of a co-accused in custody.

HEADNOTES
Criminal
Law
-
Bharatiya
Nagarik
Suraksha Sanhita, 2023 - Section 482, -
Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS), 2023 -
Sections - 305(A), 331(4), 317(2) -
Criminal Procedure Code, 1973 - Sections
438- Anticipatory Bail Application - filed under
Section 482 B.N.S.S. by the applicant - FIR -
offence of theft of Rs. 17000/- and jewellery -
Applicant implicated solely on co-accused's
custodial statement - Sessions Judge rejected
anticipatory bail relying on Pradeep Sharma
(2014) and Iddu v. State of U.P. (2023) - Court
held that constitutional bench rulings (Sibbia,
Sushila Aggarwal) prevail over smaller bench
decisions -Anticipatory bail is not exceptional but
a recognized remedy - Applicant entitled to
anticipatory bail subject to conditions. (Para -
13, 14, 16)
Application Allowed. (E-11)

CASE LAW CITED
1. Iddu & Others v. State of U.P. & Others
(2023)
2. State of M.P. v. Pradeep Sharma (2014) 2
SCC 171
3. Gurbaksh Singh Sibbia v. State of Punjab
(1980) 2 SCC 565 (Constitution Bench)
4. Sushila Aggarwal v. State (NCT of Delhi)
(2020) 5 SCC 1 (Constitution Bench)

LIST OF ACTS
Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 -
Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS), 2023 - Criminal
Procedure Code, 1973.

LIST OF KEYWORDS
Anticipatory Bail - Co-accused Statement -
Constitutional Bench - False Implication -
Regular Bail - Lakhimpur Kheri - Bail Conditions.
9 All. Jibrail @ Baba Vs. State of U.P.
1143
CASE ARISING FROM
Case Crime No. 256/2025 - Police Station:
Padhua, District Lakhimpur Kheri.

APPEARANCE OF PARTIES
Counsel for Appellant(s): Ms. Priyanka Yadav,
Rizwanul Haque Ansari, Santi.
Counsel for Respondent(s): Mr. Abhay Kumar
Singh (Addl. Govt. Advocate), G.A.

(Delivered by Hon'ble Subhash Vidyarthi, J.)

1. प्राथी के मवद्वान अमधविा सुश्री मप्रयंका यादव तथा
मवद्वान अपर शासकीय अमधविा श्री अभय कुमार मसंह को
सुना तथा पत्रावली का अवलोकन मकया।

2. धारा 482 भारतीय नागररक सुरक्षा संमहता,
2023 के अंतगटत प्रटतुत प्राथटना-पत्र द्वारा प्राथी ने मुकदमा
अपराध संख्या 256 विट 2025 अन्तगटत धारा 305 (A),
331 (4), 317 (2) भारतीय न्याय संमहता थाना पढुआ
मजला लखीमपुर खीरी में अमग्रम जमानत की प्राथटना की है।

3. मदनांक 22.05.2025 को मलखाई गई प्रथम
सूचना ररपोटट में यह कहा गया है मक मदनांक 20.05.2025
की मध्य रामत्र मशकायतकती के घर में चोरी हुई मजसमें सत्रह
हजार रुपये तथा कुछ गहने चोरी हो गए।

4. प्राथटना-पत्र के साथ प्रटतुत शपथ-पत्र में कहा गया
मक प्राथी मनदोि है और उसका कोई आपरामधक इमतहास नहीं
है। साथ ही एक पूरक शपथ-पत्र के माध्यम से दो अन्य प्रकरण
में प्राथी की संमलप्तता दशाटयी गई है, मजन दोनों में प्राथी को
जमानत पर ररहा मकए जाने का आदेश हो चुका है।

5. प्राथी के मवद्वान अमधविा ने तकट मदया मक मात्र
आपरामधक इमतहास होने के कारण प्रकरण में पुमलस प्राथी की
मगरफ्तार करने की चेष्ा कर रही है, जबमक प्राथी प्रश्नगत
प्रकरण में संमलप्त नहीं है।

6. मवद्वान अपर शासकीय अमधविा ने उनको प्राप्त
अनुदेशों के आधार पर प्राथटना-पत्र का मवरोध मकया। मवद्वान
अपर शासकीय अमधविा ने केस डायरी के संलग्नक
न्यायालय के समक्ष रखे, मजसके अनुसार पुमलस ने दो
अमभयुिों गुलाम एवं ररजवान को मुखमबर खास से प्राप्त सूचना
के आधार पर मगरफ्तार मकया तथा उनसे कुछ वटतुओं बरामद
की है। ररजवान ने यह बताया मक उससे बरामद रुपया उसने
गुलाम एवं मजिाइल उफट बाबा (प्राथी) के साथ ममलकर
चुराया था।

7. उपरोि तथ्यों से यह टपष् है मक सह-अमभयुि के
अमभरक्षा में मदए गए बयान के अमतररि प्राथी के मवरुद्ध कोई
सामग्री नहीं है।

8. अपर सत्र न्यायाधीश, कक्ष सं०-5, लखीमपुरखीरी ने प्राथी की अमग्रम जमानत प्राथटना-पत्र को आदेश
मदनांक 30.07.2025 द्वारा मनरटत कर मदया मजसमें इहु एिं
अन्य बनमर् उत्तर प्रदेश रमज्य एिं अन्य में अमग्रम जमानत
प्राथटना-पत्र संख्या 10145 विट 2023 में पाररत मनणटय का
आश्रय मलया मजसमें यह मसद्धांत प्रमतपामदत मकया गया है मक
अमग्रम जमानत का उपचार वहीं प्रदान मकया जा सकता है जहां
अमभयुि की प्रश्नगत मामले में संमलप्तता का लेश मात्र भी
साक्ष्य न हो। इहु एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
के प्रकरण में इस न्यायालय ने अमग्रम जमानत प्राथटना-पत्र इन
तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मनरटत कर मदया था मक
मशकायतकताट पक्ष से सात व्यमियों को चोटें आई थी मजसमें
मशकायतकताट टवयं को मसर पर चोट आई थी जो मक शरीर का
एक महत्वपूणट अंग है तथा मशकायतकताट के पररवार के पांच
अन्य सदटयों को भी चोटें आई थी। इस न्यायालय ने यह कहा
मक इन तथ्यों को दृमष्गत रखते हुए अमभयुि को मनयममत
जमानत प्राथटना-पत्र देना चामहए।

9. अपर सत्र न्यायाधीश ने र्ध्य प्रदेश रमज्य प्रवत
प्रदीप शर्मा, (2014) 2 एससीसी 171 के मनणटय का भी
आश्रय मलया। मजसमें यह मनधाटररत मकया गया है मक धारा
438 दण्ड प्रमिया संमहता के अंतगटत प्रदत्त शमियों का प्रयोग
अपवामदत मामलों में वहीं पर मकया जाना चामहए, जहां
अमभयुि को ममथ्या फसाये जाने का आधार हो।

10. विट 2014 के बाद माननीय उच्चतम न्यायालय
की इस मविय पर अनेक मवमध-व्यवटथाएं आ चुकी हैं तथा
1144 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
मवद्वान अपर सत्र न्यायाधीश ने 11 विट पुराने मनणटय का
आश्रय मलया जो मक उस समय मदया गया था जब अमग्रम
जमानत का प्रामवधान प्रदेश में लागू नहीं था।

11. गुरुबक्श वसंह वसवबबयम बनमर् पंजमब रमज्य
(1980) 2 एससीसी 565 में उच्चतम न्यायालय के पांच
माननीय न्यायमूमतटगण की संवैधामनक पीठ ने यह व्यवटथा दी
है मक ऐसा कोई उपबंध नहीं है मक अमग्रम जमानत मात्र
अपवाद टवरूप ही दी जा सकती है। मध्य प्रदेश बनाम प्रदीप
शमाट का मनणटय माननीय उच्चतम न्यायालय के दो माननीय
न्यायामूमतटगण की पीठ ने गुरुबक्श मसंह मसमब्बया बनाम पंजाब
राज्य के मनणटय में संमवधान पीठ के मनणटय को ध्यान में रखते
हुए पाररत नहीं मकया है। जहां दो माननीय न्यायमूमतटगण की
पीठ का मनणटय पांच न्यायमूमतटगण की संवैधामनक पीठ के
मनणटय में प्रमतपामदत मवमध-व्यवटथा के मवरुद्ध हों वहां यह
मवमधक मटथमत अमववामदत है मक पांच माननीय न्यायमूमतटगण
की संवैधामनक पीठ द्वारा मदया गया मनणटय ही प्रभावी होगा।

12. सुशीलम अग्रिमल बनमर् रमज्य (रमष्रीय
रमजधमनी क्षेि वदलली) तथम एक अन्य 2020 5
एससीसी पृष्ठ 1 का मनणटय भी एक पांच माननीय
न्यायमूमतटगण के संवैधामनक पीठ ने मदया है, मजसमें अमग्रम
जमानत के संबंध में मनम्नमलमखत मसद्धांत प्रमतपामदत मकए हैैः-

"1. श्री गुरबख्श मसंह मसमब्बया एवं अन्य बनाम
पंजाब राज्य के मामले में मदए गए मनणटय के अनुरूप, जब कोई
व्यमि मगरफ्तारी की आशंका की मशकायत करता है और
आदेश के मलए आवेदन करता है, तो आवेदन ठोस तथ्यों (न
मक अटपष् या सामान्य आरोपों) पर आधाररत होना चामहए जो
मक एक या दूसरे मवमशष् अपराध से संबंमधत हों। अमग्रम
जमानत के आवेदन में अपराध से संबंमधत केवल आवमयक
तथ्य होने चामहए और यह भी मक आवेदक को मगरफ्तारी की
उमचत आशंका क्यों है, साथ ही उसका अपना पक्ष भी होना
चामहए। ये न्यायालय के मलए आवमयक हैं, मजसे उसके
आवेदन पर मवचार करना चामहए, तामक धमकी या आशंका,
उसकी गंभीरता और लगाई जाने वाली मकसी भी शतट की
उपयुिता का मूकयांकन कर सके। यह आवमयक नहीं है मक
कोई आवेदन केवल प्रथम सूचना ररपोटट दजट होने के बाद ही
प्रटतुत मकया जाए; इसे पहले भी प्रटतुत मकया जा सकता है,
बशते तथ्य टपष् हों और मगरफ्तारी की आशंका के मलए उमचत
आधार है।

2. धारा 438 के अंतगटत आवेदन के साथ
संपकट करने वाले न्यायालय के मलए यह उमचत हो सकता है
मक वह (मगरफ्तारी की) धमकी की गंभीरता के आधार पर
सरकारी अमधविा को नोमटस जारी करे और तथ्य प्राप्त करे,
यहााँ तक मक सीममत अंतररम अमग्रम जमानत देते समय भी।

3. दंड प्रमिया संमहता की धारा 438 में ऐसा
कुछ भी नहीं है जो अदालतों को समय के संदभटमें राहत को
सीममत करने वाली शतें लगाने के मलए मजबूर या बाध्य करे,
या पुमलस द्वारा प्रथम सूचना ररपोटट दजट करने पर, या मकसी
गवाह का बयान दजट करने पर, जांच या पूछताछ के दौरान,
आमद। मकसी आवेदन पर मवचार करते समय (अमग्रम जमानत
देने के मलए) न्यायालय को अपराध की प्रकृमत, व्यमि की
भूममका, जांच की प्रमिया को प्रभामवत करने की उसकी
संभावना, या साक्ष्यों के साथ छेडछाड (गवाहों को धमकाने
समहत), न्याय से भागने की संभावना (जैसे देश छोडना),
आमद पर मवचार करना होगा। न्यायालयों के मलए यह उमचत
होगा - और उन्हें दण्ड प्रमिया संमहता की धारा 437 (3)
(धारा 438 (2) के आधार पर] में उमकलमखत शतें लागू
करनी चामहए। अन्य प्रमतबंधात्मक शतें लगाने की आवमयकता
का मनणटय मामले दर मामले के आधार पर, और राज्य या
जांच एजेंसी द्वारा प्रटतुत सामग्री के आधार पर मकया जाना
चामहए। ऐसी मवशेि या अन्य प्रमतबंधात्मक शतें लगाई जा
सकती हैं यमद मामला या मामलों की आवमयकता हो, लेमकन
सभी मामलों में मनयममत रूप से नहीं लगाई जानी चामहए। इसी
प्रकार, अमग्रम जमानत की अनुममत को सीममत करने वाली
शतें दी जा सकती हैं, यमद मकसी मामले या मामलों के तथ्यों
में उनकी आवमयकता हो; हालााँमक, ऐसी सीममत शते
अमनवायट रूप से नहीं लगाई जा सकीं।

4. न्यायालयों को आम तौर पर अपराधों की
प्रकृमत और गंभीरता, आवेदक को सौंपी गई भूममका और
मामले के तथ्यों जैसे मवचारों से मनदेमशत होना चामहए, जब वे
9 All. Jibrail @ Baba Vs. State of U.P.
1145
इस बात पर मवचार कर रहे हों मक अमग्रम जमानत दी जाए या
नहीं। देना या न देना मववेक का मविय है; इसी तरह, यमद हााँ,
तो मकस प्रकार की मवशेि शतें लगाई जाएाँ (या नहीं लगाई
जाएाँ) यह भी मामले के तथ्यों पर मनभटर करता है और
न्यायालय के मववेक के अधीन है।

5. अमग्रम जमानत, अमभयुि के आचरण और
व्यवहार के आधार पर, आरोप पत्र दामखल होने के बाद
मुकदमे के अंत तक जारी रह सकती है।

6. अमग्रम जमानत का आदेश इस अथट में
"व्यापक" नहीं होना चामहए मक यह अमभयुि को आगे कोई
अपराध करने और मगरफ्तारी से अमनमश्चतकालीन सुरक्षा का
दावा करने का अमधकार न दे। यह उस अपराध या घटना तक
ही सीममत होना चामहए मजसके मलए मगरफ्तारी की आशंका
मकसी मवमशष् घटना के संबंध में मांगी गई हो। यह मकसी ऐसी
भमवष्य की घटना के संबंध में लागू नहीं हो सकता मजसमें
अपराध का मकया जाना शाममल हो।

7. अमग्रम ज़मानत का आदेश मकसी भी तरह से
पुमलस या जााँच एजेंसी के अमधकारों या कतटव्यों को सीममत या
प्रमतबंमधत नहीं करता है, मक वे उस व्यमि के मखलाफ आरोपों
की जााँच करें जो मगरफ़्तारी-पूवट ज़मानत चाहता है और उसे
ज़मानत दी जाती है।

8. मसमब्बया मामले में "सीममत महरासत" या
"मानी गई महरासत" के संबंध में की गई मटप्पमणयााँ, जााँच
अमधकारी की आवमयकताओं को पूरा करने के मलए, धारा 27
के प्रावधानों को पूरा करने के मलए पयाटप्त होंगी, मकसी वटतु की
बरामदगी या मकसी तथ्य का पता चलने की मटथमत में, जो ऐसी
घटना (अथाटत मानी गई महरासत) के दौरान मदए गए बयान से
संबंमधत हो। ऐसी मटथमत में, अमभयुि को अलग से आत्मसमपटण
करने और मनयममत ज़मानत लेने के मलए कहने का कोई प्रश्न (या
आवमयकता) नहीं है। मसमब्बया (सुप्रा) ने मटप्पणी की थी मक "
यमद और जब अवसर उत्पन्न होता है, तो अमभयोजन पक्ष के मलए
साक्ष्य अमधमनयम की धारा 27 का लाभ लेना संभव हो सकता
है, तथ्यों की खोज के संबंध में, जमानत पर ररहा मकए गए व्यमि
द्वारा दी गई जानकारी के अनुसरण में, इस न्यायालय द्वारा उत्तर
प्रदेश राज्य बनाम देवमन उपाध्याय मामले में बताए गए मसद्धांत
का आह्वान करके।"

9. पुमलस या जााँच एजेंसी के मलए यह टवतंत्र है
मक वह संबंमधत न्यायालय में, जो अमग्रम ज़मानत प्रदान करती है,
धारा 439 (2) के अंतगटत अमभयुि को मगरफ्तार करने के
मनदेश के मलए आवेदन करे, यमद मकसी भी शतट का उकलंघन
होता है, जैसे मक फरार होना, जााँच के दौरान सहयोग न करना,
टालमटोल करना, धमकी देना या जााँच या मुकदमे के पररणाम को
प्रभामवत करने के उद्देमय से गवाहों को प्रलोभन देना, आमद।

10. उपयुटि प्रटतर (9) में उमकलमखत न्यायालय
वह न्यायालय है जो प्रचमलत प्रामधकाररयों के अनुसार, प्रथम
दृष्या अमग्रम जमानत प्रदान करता है।

11. ज़मानत देने वाले आदेश की सत्यता पर,
राज्य या जााँच एजेंसी के कहने पर अपील या उच्च न्यायालय
द्वारा मवचार मकया जा सकता है, और इस आधार पर रद्द मकया जा
सकता है मक आदेश देने वाले न्यायालय ने महत्वपूणट तथ्यों या
महत्वपूणट पररमटथमतयों पर मवचार नहीं मकया। (देखें प्रकाश कदम
व अन्य बनाम रामप्रसाद मवश्वनाथ गुप्ता व अन्य; जय प्रकाश मसंह
(सुप्रा) सीबीआई के माध्यम से राज्य बनाम अमरममण मत्रपाठी)।
यह दण्ड प्रमिया संमहता की धारा 439 (2) के अनुसार
"मनरटतीकरण" नहीं है।

12. मसद्धराम सतमलंगप्पा म्हेत्रे बनाम महाराष्र
राज्य एवं अन्य (और इसी तरह के अन्य मनणटयों ) में की गई
यह मटप्पणी मक अमग्रम जमानत देते समय कोई भी
प्रमतबंधात्मक शतें नहीं लगाई जा सकतीं, को एत्‌द्वारा खाररज
मकया जाता है। इसी प्रकार, सलाउद्दीन अब्दुलसमद शेख
बनाम महाराष्र राज्य और उसके बाद के मनणटयों (मजनमें के.
एल. वमाट बनाम राज्य एवं अन्य; सुनीता देवी बनाम मबहार
राज्य एवं अन्य; अरी धरन दास बनाम पमश्चम बंगाल राज्य;
मनमटल जीत कौर बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य;
एचडीएफसी बैंक मलममटेड बनाम जे.जे. मन्नान; सतपाल मसंह
1146 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
बनाम पंजाब राज्य और नरेश कुमार यादव बनाम रवींर कुमार)
में मदए गए मनणटय , जो ऐसी प्रमतबंधात्मक शतें या अमग्रम
ज़मानत देने को एक मनमश्चत अवमध तक सीममत करने वाली
शतें मनधाटररत करते हैं, एत्‌द्वारा खाररज मकए जाते हैं।"

13. उपरोि तथ्यों के दृमष्गत मवद्वान अपर सत्र
न्यायाधीश ने मवमध-व्यवटथा का समयक रूप से अनुपालन
नहीं मकया है।

14. जबमक प्रटतुत प्रकरण में प्राथी को मात्र सहअमभयुि के अमभरक्षा में मदए गए बयान के आधार पर आरोपी
बनाया जा रहा है तथा उि के अमतररि प्राथी की प्रश्नगत प्रकरण
में संमलप्ततता दशाटनें के मलए कोई अन्य वैधामनक आधार नहीं है,
न्यायालय का मत है मक प्राथी अमग्रम जमानत पाने का अमधकारी
है।

15. तद््‌नुसार अमग्रम जमानत प्राथटना-पत्र स्िीकमर
मकया जाता है।

16. उपरोि मुकदमा अपराध संख्या में आवेदक
की मगरफ्तारी /न्यायालय के समक्ष उपमटथमत की दशा में,
उसे संबंमधत थाने के भारसाधक अमधकारी / न्यायालय
की संतुमष् के अनुसार व्यमिगत बंध पत्र एवं दी प्रमतभू
प्रटतुत करने पर परीक्षण के अंमतम रूप से मनटतारण तक,
मनम्न शतों के अधीन अमग्रम जमानत पर ररहा मकया
जाएगाैः-

क- आवेदक, यमद आवमयक होगा तो पुमलस
अमधकारी द्वारा जॉच हेतु अपेमक्षत समय पर उपमटथत होगा।

ख- आवेदक मामले के तथ्यों से पररमचत मकसी
व्यमि या पुमलस अमधकाररयों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से
कोई धमकी, वादा या प्रलोभन नहीं देगा मजससे मक वह ऐसे
तथ्य को न्यायालय के समक्ष या मकसी पुमलस अमधकारी के
समक्ष प्रकट न करने पर मान जाए।

ग- आवेदक अदालत की पूवट अनुममत के मबना
भारत नहीं छोडेगा;

घ- आवेदक को प्रत्येक मनधाटररत मतमथ पर
रायल कोटट के समक्ष उपमटथत होना होगा, जब तक मक
व्यमिगत उपमटथमत से छूट न दी गयी हो;

ङ- आवेदक अमभयोजन पक्ष के गवाह पर दबाव
नहीं डालेगा / धमकी नहीं देगा।

च- आवेदक मववेचना एवं मवचारण के दौरान
सहयोग करेंगे और जमानत की टवतंत्रता का दुरुपयोग नहीं
करेगा।

17. इस आदेश की एक प्रमत अपर सत्र न्यायाधीश,
कक्ष सं०-5, लखीमपुर-खीरी को प्रेमित की जाए।
----------
(2025) 9 ILRA 1146
ORIGINAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: LUCKNOW 24.09.2025

BEFORE

THE HON'BLE RAJESH SINGH CHAUHAN, J.
THE HON'BLE SYED QAMAR HASAN RIZVI, J.

Criminal Misc. Writ Petition No. 1314 of 2024

Ketan Rastogi & Ors. ...Petitioners
Versus
State of U.P. & Ors. ...Respondents

Counsel for the Petitioners:
Mohd. Ghayasuddin Khan, Lav Singh,
Mohd. Ghayasuddin Khan, Shyam Narain
Mishra

Counsel for the Respondents:
G.A., Manish Soni, Mohit Kumar Rawat,
Saurabh Kr Shahi

Issues for Consideration
Whether an application seeking recall of an
order passed by a co-ordinate Bench on the
basis of a verified compromise, allowing a
criminal writ petition and quashing criminal
proceedings, was maintainable on the ground of