# Jyoti Rawat v. State of U.P. & Anr

- **Citation:** (2025) 8 ILRA 831
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2025-08-01
- **Case number:** Application U/S 482 No. 5919 of 2025
- **Bench:** Subhash Vidyarthi
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/jyoti-rawat-v-state-of-u-p-anr-53814
- **Pages:** 5

## Headnote

G.A.

Issue for consideration
Matter pertains to Rape on false pretext of
marriage.

Headnotes
Indian Penal Code-sec. 376-Allegation of
rape on false promise of marriage-claim 7
years
of
love
relationship-victim
married
someone else-claim to divorce him-but accused
refused to marry the victim-impugned FIRaccused cannot marry a married women-proof
of divorce not given-refusal to marry a married
women cannot be criminalized -proceedings
quashed. Application allowed. (E-9)

Case Law Cited
1.Bharat Sangh vs. Prafful Kumar, 1989,CRLJ
154 (S.C.)

## Text

8 All. Jyoti Rawat Vs. State of U.P. & Anr.
831
----------
(2025) 8 ILRA 831
ORIGINAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: LUCKNOW 01.08.2025

BEFORE

THE HON'BLE SUBHASH VIDYARTHI, J.

Application U/S 482 No. 5919 of 2025

Jyoti Rawat ...Applicant
Versus
State of U.P. & Anr. ...Opposite Parties

Counsel for the Applicant:
Shabnam

Counsel for the Opposite Parties:
G.A.

Issue for consideration
Matter pertains to Rape on false pretext of
marriage.

Headnotes
Indian Penal Code-sec. 376-Allegation of
rape on false promise of marriage-claim 7
years
of
love
relationship-victim
married
someone else-claim to divorce him-but accused
refused to marry the victim-impugned FIRaccused cannot marry a married women-proof
of divorce not given-refusal to marry a married
women cannot be criminalized -proceedings
quashed. Application allowed. (E-9)

Case Law Cited
1.Bharat Sangh vs. Prafful Kumar, 1989,CRLJ
154 (S.C.)
2. Deepak Kumar Gulati vs. State of Haryana,
(2013) 7 SCC 675
3. Uday vs. State of Karnataka, (2003) 4 SCC 46
4. Pramod Suryabhan Pawar vs. State of
Maharashtra and others, (2019) 9 SCC 608

List of Acts
Indian Penal code,1860

Appearances of parties
Counsel for Applicant :- Shabnam, Counsel for
Opposite Party :- G.A.

(Delivered by Hon'ble Subhash Vidyarthi, J.)

1.
प्रागथगनी के विद्िान अगििक्ता सुश्री
शबनम शेि तथा विद्िान अपर शासकीय
अगििक्ता श्री अिय कुमार भसंह को सुना तथा
पत्रािली का अिलोकन क्रकया।

2.
िारा 482 दडि प्रक्रिया संहहता के अंतिगत
प्रस्तुत इस प्राथगना पत्र द्िारा प्रागथगनी ने विशेष
न्यायािीश एस.सी. / एस.टी. एक्ट, लिनऊ
द्िारा सत्र िाद संख्या 1089 सन 2024 में
पाररत आदेश हदनांक 02.06.2025 की िैिता को
िुनौती दी है ण्जसके द्िारा वििारण न्यायालय
ने प्राथी के विरुद्ि मात्र िारा 504, 506
िा०दं०सं० ि िारा 3(1) ब (ii) एस०सी० /
एस०टी० में आरोप विरिन का मामला पाया एिं
िारा 376, 313 िा०दं०सं० के अपरािों से विपक्षी
संख्या 2 तथा 3 को उन्मोगित कर हदया, की
िैिता को िुनौती दी ियी है।

3.
 प्रस्तुत प्रकरण प्रागथगनी द्िारा विपक्षी
संख्या 2 तथा 3 के विरुद्ि हदनांक 08.11.2023
को भलिाई िई प्रथम सूिना ररपोटग के आिार
पर संण्स्थत हुआ ण्जसमें कहा िया है क्रक
प्रागथगनी का संबंि लििि 7 िषग पूिग विपक्षी
संख्या 2 से हुआ था तथा उनमें प्रेम प्रसंि हो
िया एिं शादी का झांसा देकर विपक्षी संख्या 2
ने कई बार शारीररक संबंि बनाये ण्जससे
प्रागथगनी ििगिती हो ियी। दिा खिलाने से
उसका ििगपात हो िया। प्रागथगनी का अन्यत्र
वििाह हो िया। प्रागथगनी का अन्यत्र वििाह हो
िया क्रकन्तु इसके बाद िी विपक्षी संख्या 2 उसे
फोन करके वििाह करने का झांसा देता रहा
832 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
तथा उसने पुनः प्रागथगनी से शारीररक संबंि
बनाये। विपक्षी संख्या 2 के कहने पर प्रागथगनी
ने अपने पतत को छोड़कर वििाह विच्छेद करा
भलया क्रकन्तु उसके बाद पुनः जब प्रागथगनी
ििगिती हो ियी तो उसे कोई दिा वपलाकर
पुनः ििगपात करा हदया एिं इसके उपरान्त
विपक्षी संख्या 2 ने प्रागथगनी से शादी करने से
अस्िीकार कर हदया।

4.
िारा 161 दं०प्र०सं० के अंतिगत अंक्रकत
अपने बयान में प्रागथगनी ने कहा क्रक िषग 2020
में उसका वििाह उसके घरिालों ने करा
हदया था क्रकन्तु उसके बाद उसके ससुराल से
अलिाि हो िया और िह मायके में रहने
लिी। इसके उपरान्त उसके और प्राथी के
बीि कई बार शारीररक संबंि बने ण्जससे
िह ििगिती हुई क्रकन्तु अंततः प्राथी ने
उससे शादी करने से मना कर हदया एिं
कोई दिा दी ण्जससे प्रागथगनी का ििगपात हो
िया।

5.
 पीडड़ता का गिक्रकत्सकीय परीक्षण नहीं
हुआ ण्जससे इन आरोपों के समथगन में कोई
गिक्रकत्सकीय साक्ष्य उपलब्ि नहीं है।

6.
 िारा 164 दं०प्र०सं० के अंतिगत अंक्रकत
अपने बयान में प्रागथगनी ने कहा क्रक िह विपक्षी
संख्या 2 के साथ 7 साल से प्यार के ररश्ते में
थी। हदनांक 17.05.2020 को उसकी शादी एक
अन्य व्यण्क्त के साथ हो ियी क्रकन्तु कुछ हदन
बाद िह अपने घर िापस आ ियी।

7.
 विपक्षी संख्या 2 से िह िषग 2021 ि िषग
2023 में ििगिती हुई क्रकन्तु विपक्षी संख्या 2
द्िारा दिा देने से उसका ििगपात हो िया।
8.
 वििेिक ने हदनांक 24.12.2023 को प्राथी
के विरुद्ि िारा 376, 313, 504, 506 िा०दं०सं०
एिं िारा 3 (1) द, ि एस.सी. / एस.टी.
अगितनयम के अपराि के भलए आरोप-पत्र
प्रस्तुत क्रकया।

9.
 ण्जस उन्मोिन प्राथगना-पत्र पर आलोच्य
आदेश हदनांक 02.06.2025 पाररत हो िया,
ण्जसकी प्रतत प्राथगना-पत्र के साथ संलग्न नहीं
की ियी है तथा इस कारण से मात्र आलोच्य
आदेश के कथनों के आिार पर ही आदेश की
िैिता का परीक्षण क्रकया जा रहा है।

10. अभियुक्तिण द्िारा उन्मोिन के संबंि
में कथन क्रकया िया क्रक पीडड़ता ियस्क थी,
उसका बिपन से अभियुक्तिण के पररिार से
संबंि था।

11. वििारण न्यायालय ने आलोच्य आदेश में
यह अंक्रकत क्रकया क्रक वििेिक ने एक होटल के
ररसेप्शतनस्ट का बयान अंक्रकत क्रकया है ण्जसने
कहा िया है क्रक हदनांक 30.07.2023 की शाम
को भशकायतकती एिं अभियुक्त होटल के एक
कमरे में लििि 4 घडटे तक रुके थे। वििारण
न्यायालय ने पाया क्रक पीडड़ता वििाहहता है तथा
िषग 2020 में उसका वििाह क्रकसी अन्य व्यण्क्त
से हो िुका है। उसका अपने पतत से वििाह
विच्छेद नहीं हुआ है इसके उपरान्त िी उसने
अभियुक्त से संबंि बनाये हैं। पीडड़ता ने एक
भ्रूण
की
फोटो
दाखिल
की
है
क्रकन्तु
अलरासाउडि की कोई ततगथ अंक्रकत नहीं है।
वििाहहत होते हुए ििगिती होना तथा क्रकसी
भ्रूण की फोटो दाखिल करने से प्रथम दृटट्या
यह माना जाएिा क्रक िह अपने पतत से ही
ििगिती हुई। बबना वििाह विच्छेद के अभियुक्त
8 All. Jyoti Rawat Vs. State of U.P. & Anr.
833
से संबंि बनाने से मात्र िारा 497 िा०दं०सं०
का अपराि बनेिा क्रकन्तु यह अपराि माननीय
उच्ितम न्यायालय द्िारा असंिैिातनक घोवषत
क्रकया जा िुका है। ऐसी पररण्स्थतत में वििारण
न्यायालय ने भारत संघ बनाम प्रफुल्ल कुमार
1989 सी०आर०एल० जे० 154 (एस०सी०) के
तनणगय का आश्रय भलया ण्जसमें यह कहा िया
है क्रक यहद साक्ष्य के मूलयांकन से दो दृण्टटकोण
सामने आ रहे हों तथा अभियुक्तिण के विरुद्ि
मात्र संदेह हो, जो िंिीर संदेह की श्रेणी में न
आ रहा हो तो ऐसी दशा में अभियुक्त का
उन्मोगित कर हदया जाना िाहहए।

12. उपरोक्त कारणों से वििारण न्यायालय ने
विपक्षी संख्या 3 को पूणगतया तथा विपक्षी
संख्या 2 को िारा 376, 313 िा०दं०सं० के
आरोपों से उन्मोगित कर हदया तथा मात्र
विपक्षी संख्या 2 के विरुद्ि िारा 504, 506
िा०दं०सं० एिं िारा 3(1) ब (ii) एस०सी० /
एस०टी० एक्ट के आरोप विरिन के भलए
प्रकरण में ततगथ लिायी।

13. उपरोक्त आदेश की िैिता को िुनौती देते
हुए प्राथी के विद्िान अगििक्ता ने दीपक
गुलाटी बनाम हररयाणा राज्य (2013) 7 SCC
675, उदय बनाम कनााटक राज्य (2003) 4 SCC
46 तथा प्रमोद सूयाभान पवार बनाम महाराष्ट्र
राज्य तथा एक अन्य (2019) 9 SCC 608 के
तनणगयों का आश्रय भलया। उपरोक्त आिारों पर
माननीय उच्ितम न्यायालय ने अपील स्िीकार
करते हुए दोषभसद्गि तथा दडिादेश को तनरस्त
कर हदया।

14. दीपक िुलाटी बनाम हररयाणा राज्य का
प्रकरण सत्र न्यायालय द्िारा अपीलाथी को िारा
365 एिं 376 िा०दं०सं० के अपराि के भलए
दोषभसद्ि तथा दंडित क्रकए के जाने के आदेश
तथा उपरोक्त आदेश को उच्ि न्यायालय द्िारा
पुटट क्रकए जाने के विरुद्ि प्रस्तुत अपील में
पाररत क्रकया िया था। माननीय उच्ितम
न्यायालय ने अपील स्िीकार करके दोषभसद्गि
तथा दडिादेश को तनरस्त कर हदया। माननीय
उच्ितम न्यायालय ने इस तनणगय में कहा क्रक
बलात्कार तथा सहमतत से यौन संबंि बनाने में
एक स्पटट अंतर है। ऐसे प्रकरणों में न्यायालय
को बहुत साििानीपूिगक यह परीक्षण करना
िाहहए क्रक क्या अभियुक्त पीडड़ता से िास्ति में
वििाह करना िाहता था अथिा उसके उद्देश्य
दुराशयपूणग थे और उसने मात्र अपनी िासना की
तृण्प्त के भलए शादी का झूठा िादा क्रकया। एक
क्रकए हुए िादे को तोड़ने और एक झूठे िादे को
पूरा न करने में अंतर है। न्यायालय को यह
देिना िाहहए क्रक क्या प्रारंि से ही अभियुक्त ने
वििाह का झूठा आश्िासन हदया था। क्या पीडड़ता
ने सहमतत यौन संबंिों की प्रकृतत और असर
समझते हुए दी थी। यहद पीडड़ता ने शारीररक
संबंि की स्िीकृतत अभियुक्त के साथ प्रेम संबंि
के िलते दी थी तथा यह मात्र अभियुक्त द्िारा
क्रकए िए भमथ्या कथन पर आिाररत नहीं थी
अथिा अभियुक्त बाद में क्रकसी कारण से पीडड़ता
से वििाह नहीं कर पाया, जबक्रक िह पीडड़ता से
वििाह करने का इच्छुक था, ऐसे प्रकरण को
भिन्न तरह से देिना िाहहए, अभियुक्त को
बलात्कार के भलए तिी दोषी भसद्ि क्रकया जा
सकता है, जबक्रक उसका आशय दुिागिनापूिगक था
तथा उसके कुछ िुप्त उद्देश्य थे।

15. प्रस्तुत प्रकरण में पीडड़ता पहले से ही
शादीशुदा थी तथा ऐसे में उसके द्िारा प्राथी
834 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
द्िारा उससे वििाह क्रकए जाने के िादे के कारण
उसने शारीररक संबंि बनाये, यह स्िीकार नहीं
क्रकया जा सकता, क्योंक्रक एक वििाहहता दूसरा
वििाह नहीं कर सकती।

16. उदय बनाम कनागटक राज्य का प्रकरण िी
अपीलाथी को वििारण न्यायालय द्िारा िारा
376
िा०दं०सं०
के
अपराि
के
भलए
दोषभसद्ि करके दण्डित क्रकए जाने एिं
उक्त आदेश को उच्ि न्यायालय द्िारा पुटट
क्रकये जाने के आदेश से उत्पन्न विशेष
अनुमतत यागिका में पाररत क्रकया िया था।
इस तनणगय में माननीय उच्ितम न्यायालय
कई पूिग तनणगयों का आश्रय भलया ण्जसमें
यह अििाररत क्रकया िया क्रक यहद कोई
पीडड़ता क्रकसी व्यण्क्त से क्रकसी व्यण्क्त से
अिाि प्रेम करती है तथा ऐसी पररण्स्थतत
में उसके इस िादा करने पर क्रक िह आिे
िलकर उससे वििाह करेिा, शारीररक संबंि
बनाती है तो ऐसी सहमतत तथ्यों के
मूलिूत िलतफहमी के आिार पर दी हुई
नहीं मानी जायेिी।

17. प्रमोद सूयगिान पिार का तनणगय िारा
482 दं०प्र०सं० के अंतिगत प्रथम सूिना ररपोटग
तनरस्त करने का अनुरोि अस्िीकार क्रकये
जाने के आदेश के विरुद्ि प्रस्तुत आपरागिक
अपील में पाररत क्रकया िया था ण्जसमें
माननीय उच्ितम न्यायालय ने यह कहा क्रक
यह भसद्ि करने के भलए क्रक वििाह हेतु
सहमतत क्रकसी तथ्यात्मक िलतफहमी से ली
ियी थी, दो िीजें देिना आिश्यक है, 1-
वििाह के भलए हदया िया ििन दुराशय से
हदया िया हो जबक्रक इस ििन के पालन का
कोई इरादा न रहा हो तथा ऐसा झूठा ििन
महहला द्िारा शारीररक संबंि बनाने की
सहमतत देने से तात्काभलक जुड़ाि रिता हो।

18. उपरोक्त तीनों ही तनणगयों में माननीय
उच्ितम न्यायालय ने वििाह की सहमतत के
कारण बनाये हुए शारीररक संबंि को बलात्कार
नहीं माना।

19. उपरोक्त पररण्स्थतत में, जबक्रक पीडड़ता
ने लििि 7 िषग पूिग से प्रेम प्रसंि होना
कहा है, िषग 2020 में पीडड़ता ने क्रकसी अन्य
व्यण्क्त से वििाह कर भलया तथा प्रथम
दृटट्या अभियुक्त से वििाह करने से पीडड़ता
स्ियं ही पीछे हट ियी; पीडड़ता के पतत से
उसका वििाह विच्छेद हुआ है इसका कोई
साक्ष्य उपलब्ि नहीं है तथा अभियुक्त एक
वििाहहत से वििाह नहीं कर सकता,
न्यायालय का मत है क्रक ऐसी पररण्स्थतत में
अभियुक्त ने पीडड़ता से वििाह न करने में
कोई अिैिातनकता काररत नहीं की तथा इस
कारण से उसको उसके विरुद्ि आपरागिक
कायगिाही िलाकर उसको दण्डित नहीं क्रकया
जा सकता।

20. उपरोक्त समीक्षा के आलोक में न्यायालय
का मत है क्रक वििारण न्यायालय द्िारा िाद
संख्या 1089 सन 2024 में पाररत आदेश हदनांक
02.06.2025 में कोई अिैिातनकता नहीं है तथा
आलोच्य आदेश से न्याय के उद्देश्य विफल
नहीं होते हैं।

21. अतः िारा 482 दं०प्र०सं० के अंतिगत
प्रस्तुत प्राथगना-पत्र बलहीन है तद् नुसार तनरस्त
क्रकया जाता है।
8 All. Jubli & Anr. Vs. State of U.P. & Anr.
835
---------
(2025) 8 ILRA 835
APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: ALLAHABAD 14.08.2025

BEFORE

THE HON'BLE SALIL KUMAR RAI, J.
THE HON'BLE SANDEEP JAIN, J.

Criminal Appeal No. 393 of 1984

Jubli & Anr. ...Appellants
Versus
State of U.P. & Anr. ...Respondents

Counsel for the Appellants:
Apul Mishra, P.N. Misra

Counsel for the Respondents:
A.P. Tewari

Issue for Consideration
Whether the conviction of the appellants under
Section 302 IPC could be sustained on the basis
of ocular testimony of related eye-witnesses,
corroborated by medical evidence and a
statement of the deceased recorded under
Section
161
Cr.P.C.
treated
as
a
dying
declaration, despite acquittal of other coaccused
and
alleged
contradictions
in
prosecution evidence.

Headnotes
Indian Penal Code, 1860 - s.302 -
Criminal Trial - Appreciation of evidence
-
Related
eye-witnesses
-
Dying
declaration recorded under s.161 Cr.P.C.
- Absence of medical fitness certificate -
Evidentiary value - Acquittal of coaccused - "Falsus in uno, falsus in
omnibus" - Not applicable - Conviction
affirmed.

Held:
Testimony of PW-1 (informant) and PW-3 (eyewitness), though related to the deceased, was
natural,
consistent
and
trustworthy.
Their
presence at the place of occurrence was fully
explained and could not be doubted merely on
the ground of relationship. Minor inconsistencies
and embellishments did not affect the core
prosecution version. [Paras 36-40]

Statement of the injured recorded under Section
161 Cr.P.C., followed by his death, assumed the
character of a dying declaration. Absence of a
doctor's certificate regarding mental fitness was
not fatal where evidence of witnesses and
Investigating
Officer
established
that
the
deceased was conscious and capable of making
the statement. The dying declaration stood
corroborated by ocular and medical evidence.
[Paras 46-51]

Medical evidence fully supported the prosecution
case. Gunshot injuries, direction of wounds and
absence of blackening/tattooing corroborated
the manner of assault described by the eyewitnesses. Time of death as opined in postmortem report was consistent with ocular
testimony. [Paras 38-39, 58-59]

Acquittal of six co-accused did not render the
entire prosecution case doubtful. The maxim
falsus in uno, falsus in omnibus has no
application in Indian criminal jurisprudence;
court is duty-bound to separate truth from
embellishment. Conviction of the appellants
could be sustained on reliable residue of
evidence. [Paras 52-55]

Prosecution proved motive, prompt lodging of
FIR, place of occurrence and chain of events
beyond reasonable doubt. Conviction under
Section
302
IPC
and
sentence
of
life
imprisonment rightly recorded by the trial court.
Appeal dismissed. [Paras 41-45, 60-64]

Appeal dismissed. (E-14)

Case Law Cited
Dharmendra Kumar @ Dhamma v. State of M.P.,
(2024) 8 SCC 60 - applied; Laxman v. State of
Maharashtra, (2002) 6 SCC 710 - relied on;
Mahendran v. State of Tamil Nadu, (2019) 5 SCC
67 - followed; Ramesh Harijan v. State of U.P.,
(2012) 5 SCC 777 - relied on; Gangadhar
Behera v. State of Orissa, (2002) 8 SCC 381 -
referred; Balaka Singh v. State of Punjab,
(1975) 4 SCC 511 - referred.

List of Acts / Statutes