# Manager L.I.C. of India, Basti v. Permanent Lok Adalat, Basti & Anr

- **Citation:** (2022) 1 ILRA 274
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2021-12-03
- **Case number:** Writ C No. 2582 of 2014
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/manager-l-i-c-of-india-basti-v-permanent-lok-adalat-basti-anr-47657
- **Pages:** 7

## Headnote

Sri Uma Nath Pandey, Sri S.R. Dubey, Sri
Manan Kumar Chaubey

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## Text

274 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
before
Special
Judge
(Prevention
of
Corruption Act), Court No.2, Bareilly.

35. It is expected from the court
concerned that the provisions of Section 4
(4) of the Prevention of Corruption Act has
to be kept in mind and suitable endeavour
has to be made by the trial court to
conclude the trial within the time specified
therein.

36.

The
application
stands
DISMISSED being devoid of merit.

37. The Registrar (Compliance) is
directed to transmit the copy of this order
to the trial court concerned within a week
positively.
----------
(2022)01ILR A274
ORIGINAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 03.12.2021

BEFORE

THE HON'BLE SAURABH SHYAM
SHAMSHERY, J.

Writ C No. 2582 of 2014

Manager L.I.C. of India, Basti ...Petitioner
Versus
Permanent Lok Adalat, Basti & Anr.
 ...Respondents

Counsel for the Petitioner:
Sri Manish Goyal, Ms. Anjali Goklani

Counsel for the Respondents:
Sri Uma Nath Pandey, Sri S.R. Dubey, Sri
Manan Kumar Chaubey

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3- YkkbQ ba";ksjsUl dkWjiksjs"ku vkWQ bafM;k cuke
lS;n tSb?ke o vU; ( 2015 1⁄481⁄2 ,-Mh-ts- 668

(Delivered by Hon'ble Saurabh Shyam
Shamshery, J.)
1 All. Manager L.I.C. of India, Basti Vs. Permanent Lok Adalat, Basti & Anr.
275

1. विचारार्थ विविक प्रश्न

वतयमान
प्रकरण
के
तथ्य
व
पररस्थथदतर्ोां के सांदिय में एक महत्वपूणय दवदधक
प्रश्न, इस न्यार्ालर् के समक्ष दवचार के दलए
उत्पन्न होता है दक-

विविक
सेिा
प्राविकरण
अविवियम 1987 के अध्याय 6क (मुकदमा
पूिथ सुलह और समझौता) की िारा 22 ग ि
उपिारा (1) से (7) के अंतगथत 'स्र्ायी लोक
अदालत' द्वारा 'पूिोक्त सुलह कायथिावहयों'
की सहायता से 'सौहार्द्थ पूणथ समझौते' पर
पहुँचिे के वलये युक्तक्तयुक्त प्रयास करिा क्या
आिश्यक है तर्ा उक्त प्रयास असफल होिे
की क्तस्र्वत में 'वििाद का विविश्चय' (उपिारा
(8)) करिे के पूिथ उक्त कायथिाही का संक्षेप
में उल्लेख करिा भी क्या आिश्यक है, तर्ा
ऐसा ि होिे के कारणमात्र से क्या
उद्घोेेवित 'पंचाट' अिैिाविक हो जायेगा?

2. प्रकरण का तथ्यात्मक प्रारुप

(क) दवपक्षी सांख्या 2 ने 'हेल्थ प्लस
र्ोजना' के अांतगयत स्वाथथ सुरक्षा हेतु, र्ाची
(िारतीर् जीवन बीमा दनगम) से 25.3.2018
(बीमा पॉदलसी सांख्या 294568688) को करार्ा
था। दजसके अांतगयत, दवपक्षी सांख्या 2, उसकी
पत्नी प्रदमला दत्रपाठी और एक बच्चे का स्वास्थ्य
सांबांदधत बीमा हुआ था।

(ख) दवपक्षी सां0 2 ने अपनी पत्नी को
अपोलो अस्पताल, ददल्ली में उपचार हेतु िती
करार्ा, दजसका 6.9.2011 को शल्योपचार हुआ
तथा वो 11.9.2011 को अस्पताल से उन्मोदचत
हुई। दवपक्षी सां0 2, ने र्ाची से अपनी पत्नी की
अस्पताल में हुए खचों (तीन लाख चौसठ हजार
अठहत्तर रुपर्े) का दावा दकर्ा, परन्तु बीमा
दनगम ने वो दावा, ददनाांक 9.3.2012 के पत्रक
द्वारा अस्वीकार कर ददर्ा, दक वो दावा बीमा
नीदत (पॉदलसी) के अांतगयत नहीां था, क्योांदक नीदत
(पॉदलसी) के शुरु होने के बहुत साल पहले से ही
दवपक्षी सां0 2 की पत्नी उक्त बीमारी (मोटापे) से
पूवय ग्रदसत थी।

(ग) दवपक्षी सां0 2, ने थथार्ी लोक
अदालत, के समक्ष एक आवेदन ददनाांक
14.6.2013 को प्रस्तुत दकर्ा तथा उपरोक्त तथ्योां
का वणयन करते हुए रु0 364678/- तथा ब्याज
की माांग की तथा कथन दकर्ा दक उसका दावा
असांगत आधारोां पर दनरस्त दकर्ा गर्ा था तथा
नीदत (पादलसी) की शतों का खुला उल्लांघन िी
दकर्ा गर्ा था।

(घ) उपरोक्त आवेदन का दवरोध
करते हुए र्ाची, द्वारा दलस्खत उत्तर ददनाांक
27.7.2013 को ददर्ा गर्ा दक, दवपक्षी सां0 2 ने
अपनी पत्नी के 12 वषों से वजन बढ़ने की बात व
उसके दलए दवा लेने व उपचार कराने की बात
नीदत (पॉदलसी) लेते समर् दिपार्ी, अतः बीमा
धारक की बीमारी (वजन बढ़ने की) नीदत
(पॉदलसी) लेने के पूवय की होने के कारण, दावा
देर् नहीां हो सकता था। 29.8.2011 को उनका
वजन 115 दकलो ग्राम था, जैसा डाक्टर
कृपलानी से अपने पचे पर दलखा था, परन्तु बीमा
लेते हुए उसका वजन मात्र 58 दक0ग्रा0 ददखार्ा
गर्ा, जो पूणयतः गलत था।

(ङ)
थथार्ी
लोक
अदालत
ने
आक्षेदपत पांचाट ददनाांक 22.10.2013 द्वारा
दवपक्षी सां0 2 की र्ादचका स्वीकार की व दनम्न
आदेश पाररत दकर्ा-

"र्ादचका स्वीकार की जाती है। र्ाची
के पक्ष में और दवपक्षी के दवरुद्ध रु0
3,64,678.04/- (तीन लाख चौसठ हजार िः सौ
अठहत्तर रुपर्े चार पैसे मात्र) तथा उस पर
र्ादचका प्रस्तुत करने की दतदथ से 10 प्रदतशत
प्रदतवषय की दर से ब्याज की िी वसूली आज्ञप्त
की जाती है अलावा इसके वाद व्यर् और वकील
िीस के मद में रु0 5,000-00 (पाांच हजार मात्र)
276 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
िी र्ाची, दवपक्षी से पाने का अदधकारी है।
आज्ञप्त धनरादश इस आदेश के दो माह के
अन्दर अदा न होने पर पूरी आज्ञप्त धनरादश पर
वसूली की दतदथ तक र्ाची को उक्त दर से ब्याज
िी देर् होगा।"

(च) थथाई लोक अदालत ने र्ह िी
दनधायररत दकर्ा दक-

"बीदमत व्यस्क्त सुश्री प्रदमला दत्रपाठी
की अपोलो अस्पताल में जो जाांच और इलाज
हुआ
उससे
सम्बस्ित
दडथचाजय
समरी
(Discharge Summary) (उन्मोचन सांक्षेपण)
19ग/18 के अवलोकन से र्ह स्पष्ट होता है दक
दनदान (Diagnosis) में वजन आदद का साक्ष्य,
प्रारस्िक लक्षण Morbid Obestity अवश्य
अांदकत है दकन्तु (Endoscopy) के उपरान्त र्ह
स्पष्ट हुआ था दक सुश्री प्रदमला दत्रपाठी का दजस
बीमारी हेतु आपरेशन दकर्ा गर्ा था वह र्ा
(Antral gastritis) तथा (erosive duodenitis)
र्ानी गैस सम्बिी बीमारी और िोटी आांत में
क्षरण और इसी कारण आपरेशन हुआ था और
र्ह बीमारी बीमा लेने के समर् अस्स्तत्व में होने
की साक्ष्य तो है ही नहीां, कथन तक नहीां है।

इस प्रकार दवपक्षी बीमा कम्पनी के
बचाव प्रकरण का एक मात्र आधार दक बीदमत
व्यस्क्त सुश्री प्रदमला दत्रपाठी लेने के समर्
अस्वथथ मोटापा जैसी बीमारी से ग्रदसत थी दजसे
उसने दिपार्ा। अतः उपरर उस्ल्लस्खत बीमा
शतों के अनुसार उसका दावा सकारण और वैध
रुप से खस्ित दकर्ा गर्ा, पूरी तरह धराशर्ी
हो जाता है। पररणाम में अदालत की रार् में
र्ादचका स्वीकार एवां आज्ञप्त दकए जाने र्ोग्य
है।"

3. याचीकताथ का पक्ष

(क) र्ाची (िारतीर् जीवन बीमा
दनगम) का पक्ष उसकी दवद्वान अदधवक्ता, सुश्री
अांजली गोकलानी, ने प्रबल पूवयक इस न्यार्ालर्
के समक्ष रखा। उन्ोनें तकय प्रस्तुत दकर्ा दक
'थथार्ी लोक अदालत' ने दवदधक सेवा प्रादधकरण
अदधदनर्म 1987 की धारा 22 ग, की उपधारा 4,
5, 6, व 7 के दवदिन्न प्रावधानोां का साक्षर
पररपालन दकर्े दबना ही दववाद का दवदनश्चर्,
गुण-दोष पर करके, आक्षेदपत पांचाट पाररत कर
ददर्ा, दजसके कारण आक्षेदपत पांचाट न केवल
न्यार् दवरुद्ध है, परन्तु दवदधक सेवा प्रादधकरण
अदधदनर्म 1987 के उद्देश्य व इस दवदध के
दनमायण के कारणोां के दवरुद्ध िी है।

(ख) दवद्वान अदधवक्ता ने आगे कथन
दकर्ा दक, आक्षेदपत पांचाट में दकसी िी स्तर पर
र्ह उल्लेस्खत नहीां दकर्ा गर्ा है दक, थथार्ी
लोक अदालत ने पक्षकारोां के बीच सुलह
कार्यवाही की कोई रीदत ही अपनाई हो र्ा
पक्षकारोां के दववाद को सौहार्द्यपूणय समझौते पर
पहुाँचाने के दलर्े कोई प्रर्ास ही दकर्ा हो। पांचाट
में दकसी िी थथान पर र्ह िी उल्लेस्खत नहीां है
दक, पक्षकार दकसी करार पर पहुाँचने में
असिल रहने के कारण, थथाई लोक अदालत ने
दववाद का दवदनश्चर् गुण-दोष पर करके पांचाट
की घोषणा की। अतः आक्षेदपत न्यार् सांगत न
होने के कारण दनरस्त दकर्े जाने र्ोग्य है।

4. विपक्षी संख्या 2 का पक्ष

(क) दवपक्षी सां0 2 (वादी) का पक्ष
उसके दवद्वान अदधवक्ता श्री मनन कुमार चौबे ने
रखा। उन्ोांने उपरोक्त तकय व कथन का दवरोध
दकर्ा और कहा दक थथाई लोक अदालत ने
पक्षकारोां के मध्य समझौते कराने के प्रर्ास दकर्े
थे तथा इस नाते 26.8.2013 को दतदथ दनधायररत
िी की थी, जैसा पांचाट में उल्लेस्खत िी है, परन्तु
र्ादचकाकताय (बीमा दनगम) ने इस प्रदिर्ा के
प्रदत कोई ददलचस्पी नहीां ददखाई व कोई प्रर्ास
करने की कोदशश िी नहीां की। अतः र्ह कथन
करना दक थथाई लोक अदालत ने पक्षकारोां के
मध्य दववाद की सुलह कराने का कोई प्रर्ास
नहीां दकर्ा, पूणय गलत है। दवद्वान अदधवक्ता ने
अपने कथन के समथयन में प्रदतउत्तर के प्रस्तर
1 All. Manager L.I.C. of India, Basti Vs. Permanent Lok Adalat, Basti & Anr.
277
20 पर इस न्यार्ालर् का ध्यान आकदषयत
करवार्ा।

(ख) प्रदतवादी के दवद्वान अदधवक्ता ने
र्ह िी कथन दकर्ा दक एक तरि बीमा दनगम
ने समझौते के दलए कोई प्रर्ास नहीां दकर्ा और
दूसरी तरि पांचाट की कार्यवाही में इस दवरोध
को पांचो के समक्ष उठार्ा िी नहीां, अतः वो अब
र्ह तकय नहीां ले सकते हैं। बीमा दनगम के
अदधवक्ता ने बहस के दौरान िी र्ह मुद्दा पांचो
के समक्ष नहीां रखा था। दवदधक सेवा प्रादधकरण
अदधदनर्म की धारा 22 ग व उसकी उपधारा 2
लगात 7 में र्ह कहीां िी उल्लेस्खत नहीां है दक
अगर पक्षकार दकसी करार में पहुाँचने में
असिल होते है तो उस तथ्य का उल्लेख स्पष्ट
रुप से पांचाट में होना आवश्यक है। अगर
पक्षकारोां द्वारा पांचाट की कार्यवाही के दौरान
ऐसा दवरोध न दकर्ा गर्ा हो, तो र्ह मानना
चादहर्े दक थथाई लोक अदालत ने आपसी सुलह
के प्रर्ास अवश्य दकर्े होांगे। र्ादचका कताय के
पास गुण-दोष पर पांचाट का दवरोध करने का
कोई र्ुस्क्त र्ुक्त कारण न होने के कारण वो,
पांचाट का तकनीकी दवरोध इस आधार पर कर
रहें। जो दवदध दवरुद्ध हैं।

5. पक्षोां के दवद्वान अदधवक्ताओां को सुना व
पत्रावली के समस्त दस्तावेजोां का सम्यक पूवयक
पररशीलन दकर्ा।

6. विश्लेिण

(क) वतयमान प्रकरण में उत्पन्न
दवदधक प्रश्न, दजसका उल्लेख इस दनणयर् के
प्रस्तर 1 में दकर्ा गर्ा है, उस पर दोनोां पक्षोां की
बहस के मद्देनजर, दनणयर् लेने के दलर्े, सवयप्रथम
दवदधक सेवा प्रादधकरण अदधदनर्म1983, के
अदधदनर्दमत करने के उद्देश्य का उल्लेख करना
अदत आवश्यक है, जो दनम्नदलस्खत है-

"समाज के दुबयल वगों को
दनःशुल्क और सक्षम दवदधक सेवा र्ह सुदनदश्चत
करने हेतु उपलब्ध कराने के दलए दक आदथयक
र्ा अन्य दनर्ोग्यताओां के कारण कोई िी
नादगरक न्यार् पाने के अवसर से वांदचत न रह
जाए, दवदधक सेवा प्रादधकरणोां का गठन करने
के दलए और र्ह सुदनदश्चत करने हेतु दक दवदधक
पद्धदत के प्रवतयन से समान अवसर के आधार
पर न्यार् का सांवधनय हो, लोक अदालतें सांदगठत
करने के दलए अदधदनर्म"

(ख) उपरोक्त उद्देश्य की प्रास्प्त के
हेतू 'लोक अदालतोां के आर्ोजन' का प्रावधान
उक्त अदधदनर्म के अध्यार् 6 में दकर्ा गर्ा है।
अध्यार् 6क, के धारा 22 (ख) की उपधारा (1) में
'थथार्ी लोक अदालत' की थथापना का प्रावधान
है। 'लोक अदालत' व 'थथार्ी लोक अदालत' में
एक महत्वपूणय बुदनर्ादी अांतर है। जहााँ लोक
अदालत पक्षकारोां के बीच समझौता र्ा
पररदनधायरण करने का प्रर्ास करेगा और र्दद
ऐसा न हो पार्े तो वाद दवदध के अनुसार दनपटाने
के दलर्े लौटा ददर्ा जार्ेगा। (देखे उक्त
अदधदनर्म की धारा 20 व उसकी उपधारा)
परन्तु उक्त अदधदनर्म की धारा 22 ग के
अनुसार 'थथार्ी लोक अदालत' मामलोां का
सांज्ञान लेने के उपरान्त सवयप्रथम पक्षकारोां के
बीच सुलह कार्यवाही करेगी और स्वतांत्र और
दनष्पक्ष रीदत से सौहार्द्यपूणय समझौते पर पहुाँचने
के दलए, पक्षकारोां के प्रर्ास में सहार्ता करेगी।
परन्तु र्दद पक्षकार दकसी करार पर पहुांचने में
असिल रहते हैं और र्दद दववाद दकसी अपराध
से सांबांदधत नहीां है, उस दशा में ही थथाई लोक
अदालत दववाद का दवदनश्चर् कर सकती है (देखे
उक्त अदधदनर्म की धारा-22 (ख) व उसकी
उपधारा)

(ग) सुलिता के दलए दवदधक सेवा
प्रादधकरण अदधदनर्म 1983 की धारा 22 ग व
उसकी सिी उपधारा दनम्न उल्लेस्खत की जा रही है।
278 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES

"22 ग. थथार्ी लोक अदालत द्वारा
मामलोां का सांज्ञान-

(1) दकसी दववाद का कोई पक्षकार,
दववाद को दकसी न्यार्ालर् के समक्ष लाने से
पूवय, दववाद के दनपटारे के दलए थथार्ी लोक
अदालत को आवेदन कर सकेगा परन्तु थथार्ी
लोक अदालत को ऐसे अपराध से, जो दकसी
दवदध के अधीन शमनीर् नहीां है, सांबांदधत दकसी
दवषर् के सांबांध में कोई अदधकाररता नहीां होगी
परन्तु र्ह और दक थथार्ी लोक अदालत को ऐसे
मामले में िी अदधकाररता नहीां होगी दजसमें
वादग्रस्त सांपदत्त का मूल्य दस लाख रुपए से
अदधक है परन्तु र्ह िी दक केन्द्रीर् सरकार
राजपत्र में अदधसूचना द्वारा, केन्द्रीर् प्रादधकरण
से परामशय करके दूसरे परांतुक में दवदनददयष्ट दस
लाख रुपए की सीमा को बढ़ा सकेगी।

(2) थथार्ी लोक अदालत को उपधारा
(1) के अधीन आवेदन दकए जाने के पश्चात्, उस
आवेदन का कोई पक्षकार उसी दववाद के दलए
दकसी न्यार्ालर् की अदधकाररता का अवलांब
नहीां लेगा।

(3) जहाां दकसी थथार्ी लोक अदालत
को उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन दकर्ा
जाता है वहाां वह,-

(क) आवेदन के प्रत्येक पक्षकार को
उसके समक्ष दलस्खत कथन िाइल करने का
दनदेश देगी दजसमें आवेदन के अधीन दववाद के
तथ्योां और प्रकृदत, ऐसे दववाद के मुद्दोां र्ा
दववाद्यकोां और, र्थास्थथदत, ऐसे मुद्दोां र्ा
दववाद्यकोां के समथनय में र्ा उसके दवरोध में
अवलांदबत आधारोां का कथन होगा और ऐसा
पक्षकार ऐसे कथन की अनुपूदतय में ऐसा कोई
दस्तावेज र्ा अन्य साक्ष्य दे सकेगा दजसे ऐसा
पक्षकार ऐसे तथ्योां और आधारोां के सबूत में
समुदचत समझता है और ऐसे कथन की एक प्रदत
ऐसे दस्तावेज र्ा अन्य साक्ष्य, र्दद कोई हो, के
साथ आवेदन के प्रत्येक पक्षकार को िेजेगी;

(ख) आवेदन के दकसी पक्षकार से
सुलह कार्यवादहर्ोां के दकसी प्रिम पर उसके
समक्ष अदतररक्त कथन िाइल करने की अपेक्षा
कर सकेगी;

(ग) आवेदन के दकसी पक्षकार से,
उसे प्राप्त दकसी दस्तावेज र्ा कथन को, अन्य
पक्षकार को, उसका उत्तर देने के दलए समथय
बनाने हेतु सांसूदचत करेगी ।

(4) जब कोई कथन, अदतररक्त कथन
और उत्तर, र्दद कोई हो, उपधारा (3) के अधीन
थथार्ी लोक अदालत के समाधानप्रद रूप में
िाइल दकर्ा गर्ा है तब वह आवेदन के
पक्षकारोां के बीच सुलह कार्यवादहर्ाां ऐसी रीदत
से करेगी दजसे वह दववाद की पररस्थथदतर्ोां को
ध्यान में रखते हुए उदचत समझे।

(5) थथार्ी लोक अदालत उपधारा (4)
के अधीन सुलह कार्यवादहर्ाां करने के दौरान
पक्षकारोां को दववाद के स्वतांत्र और दनष्पक्ष रीदत
में सौहार्द्यपूणय समझौते पर पहुांचने के दलए,
उनके प्रर्ास में सहार्ता करेगी।

(6) आवेदन के प्रत्येक पक्षकार का
र्ह कतयव्य होगा दक वह आवेदन से सांबांदधत
दववाद की सुलह कराने में थथार्ी लोक अदालत
के साथ सद्भावनापूवयक सहर्ोग करे और थथार्ी
लोक अदालत के, उसके समक्ष साक्ष्य और अन्य
सांबांदधत दस्तावेज प्रस्तुत करने के दनदेश का
अनुपालन करे।

(7) जब थथार्ी लोक अदालत की
पूवोक्त सुलह कार्यवादहर्ोां में र्ह रार् है दक ऐसी
कार्यवादहर्ोां में समझौते के ऐसे तत्व दवद्यमान हैं
जो पक्षकारोां को स्वीकार्य हो सकेंगे, तब वह
दववाद के सांिाव्य समझौते के दनबांधन दवरदचत
कर सकेगी और सांबांदधत पक्षकार को उनके
सांप्रेक्षण के दलए देगी और र्दद पक्षकार दववाद
के समझौते के दलए सहमत हो जाते हैं तो वे
समझौता करार पर हस्ताक्षर करेंगे तथा थथार्ी
लोक अदालत उसके दनबांधनानुसार अदधदनणयर्
पाररत करेगी और उसकी एक-एक प्रदत प्रत्येक
सांबांदधत पक्षकार को देगी।

(8) जहाां पक्षकार उपधारा (7) के
अधीन दकसी करार पर पहुांचने में असिल रहते
1 All. Manager L.I.C. of India, Basti Vs. Permanent Lok Adalat, Basti & Anr.
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हैं, वहाां र्दद दववाद दकसी अपराध से सांबांदधत
नहीां है तो थथार्ी लोक अदालत, दववाद का
दवदनश्चर् कर देगी।"

(घ) इस उच्च न्यार्ालर् की एक
समवती न्यार्पीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य प्रदत
श्रीमती कादमनी देवी व अन्य; 2017 (9) ए.डी.जे.
44, के दनणयर् में अन्य उच्च न्यार्ालर्ोां के कई
दनणयर्ोां को आधार मानते हुए र्ह दनधायररत दकर्ा
दक थथाई लोक अदालत का र्ह एक पदवत्र
कतयव्य है दक, वो अपनी बुस्द्धमत्ता, ज्ञान व
अनुिव का सद्प्रर्ोग करते हुए पक्षकारोां के
मध्य समझौता करने का िरसक प्रर्ास करेंगे
और ऐसे प्रर्ासोां में असिल होने की दशा में ही
दववाद का दवदनदश्चर् गुण-दोष पर कर सकेंगे।
समझौते की प्रदिर्ा को दकर्े दबना थथाई लोक
अदालत सीधे गुण-दोष पर दनणयर् नहीां दे सकते
हैं।

(ङ) इस न्यार्ालर् की एक और
समवती न्यार्पीठ ने नेशनल इांश्योरेन्स कां0 दल0
प्रदत थथाई लोक अदालत (ररट सी नां0
34170/2012 दनणयर् दतदथ 02.05.2014) में
प्रदतपाददत दकर्ा है दक-

"वो सिी मामले जो इस न्यार्ालर् के
समक्ष आते हैं, दनरअपवाद रुप से न्यार्ालर् र्ह
पार्ा जाता है दक िले ही अदधदनर्म की धारा-
22 ग की उप-धारा (5) और उप-धारा (6),
थथार्ी लोक अदालत, पर सुलह की कार्यवाही
के दौरान समझौता कराने का दादर्त्व होता है
और दिर उप-धारा (7) के सांदिय में एक रार्
बनाना होता हैं, दक ऐसी कार्यवाही में समझौते
के तत्व मौजूद हैं, जो पक्षकार को स्वीकार्य हो
सकते हैं, तो सांिादवत समझौते के दनबिन
दवचररत कर सकते हैं और पक्षकारोां से
दटप्पदणर्ाां आमांदत्रत की जा सकती है। लेदकन
ऐसा प्रतीत होता है दक थथार्ी लोक अदालतें,
उक्त वैधादनक प्रावधानोां के पुणयत्य दवपरीत में
गुण-दोष के आधार पर इस मुद्दे पर दनणयर् लेने
से पहले केवल "समाधान का प्रर्ास दकर्ा परन्तु
दविल रहा" का पाठ कर रही है। इस बारे में
कोई सामग्री नहीां है दक र्ह सुलह कब की गर्ी,
दकस तरीके से और दकस तरह से समझौते की
शते तैर्ार की गई तादक सांबांदधत पक्षोां की
दटप्पदणर्ाां आमांदत्रत की जा सकें। र्ह न तो
प्रावधान की िावना है और न ही इसे सावयजदनक
उपर्ोदगता सेवा प्रदाता में शादमल करने के दलए
एक िल के रुप में इस्तेमाल दकर्ा जा सकता
है। र्ह कोई औपचाररकता नहीां है, दजसे र्ांत्रवत्
रुप से दनवयहन दकर्ा जाना है। पत्रावली से र्ह
प्रदतदबांदबत होना चादहए दक एक सांिादवत
समझौते तक पहुाँचने के दलर्े, एक प्रस्तादवत
समझौता बनाने के दलए वास्तदवक और
ईमानदार प्रर्ास दकर्े गर्े थे और केवल जब
प्रस्तादवत समझौते को वाांदित प्रदतदिर्ा नहीां
दमलती है, तब ही थथार्ी लोक अदालत को गुणदोष के आधार पर दनणयर् लेने के दलर्े आगे
बढ़ना चादहए।" (अनुवाद न्यार्ालर् द्वारा दकर्ा
गर्ा है)

(च) इसके अदतररक्त एक और
समवती न्यार्पीठ द्वारा लाइि इांश्योरेन्स
कॉरपोरेशन ऑि इांदडर्ा प्रदत सैर्द जैइघम व
अन्य; 2015 (8) एडीजे 668, के मामले में इस
सांदिय में थथाई लोक अदालतोां को कुि ददशा
दनदेश िी ददर्े गर्े थे, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है
दक वो ददशा दनदेश थथाई लोक अदालतोां द्वारा
पूणय रुप से अपनार्े नहीां जा रहे हैं। प्रमुख दनदेश
हैं दक

"थथाई लोक अदालत का मुख्य कार्य
पररदनधारण कराना है परन्तु पक्षकार जब दकसी
करार तक नहीां पहुाँच पाते हैं तब थथाई लोक
अदालत न्यार् दनणायर्क दनकार् में रुपान्तररत हो
जाता है" तथा "थथाई लोक अदालत को दववाद के
पक्षकारोां को र्ह धारणा नहीां बनाने देना चादहर्े
दक, आरि से ही उसका कार्य न्यार् दनणायर्क
का है" (अनुवाद न्यार्ालर् द्वारा दकर्ा गर्ा है)

(ि) जैसा दक उक्त अदधदनर्म की धारा
22 ग की उपधारा 3 व 4 में वदणयत है, दक पक्षकारोां
280 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
के दलस्खत कथन व दववाद के मुद्दोां के दववाधकोां को
ध्यान में रखते हुए, पक्षकारोां की बीच थथाई लोक
अदालत, सुलह कार्यवादहर्ाां द्वारा पक्षकारोां को दववाद
के स्वांतत्र और दनष्पक्ष रीदत में सौहार्द्यपूणय समझौते
पर पहुाँचने के दलए उनके प्रर्ास में सहार्ता करेगी।
अतः र्ह आवश्यक है दक थथाई लोक अदालत, उक्त
प्रर्ासोां का सांक्षेप में अपने आदेश में उल्लेख करे
क्योांदक उपधारा (8) के अनुसार र्दद पक्षकार दकसी
करार पर पहुाँचने से असिल रहते हैं, उस दशा में ही,
थथार्ी लोक अदालत दववाद का दवदनश्चर् कर सकती
हैं (र्दद दववाद दकसी अपराध से सांबांदधत नहीां है)।
उपधारा (8) तक की स्थथदत तक पहुाँचने से पहले
उपधारा (3), (4), (5) व (6) में दकर्े गर्े प्रर्ास व
उपधारा (7) में समझौते पर न पहुाँचने की स्थथदत के
उपरान्त ही, थथाई लोक अदालत, उपधारा (8) के
अन्तगयत गुण-दोष पर दनणयर् ले सकती है। अतः उक्त
कार्यवाही का उल्लेख, सांदक्षप्त में ही सही, परन्तु
अवश्य होना चादहर्े।

(ज) उपरोक्त दवश्लेषण से र्ह पूणयतः
दवददत होता है दक, थथाई लोक अदालत, को सवयप्रथम
पक्षकारोां को सौहार्द्यपूणय समझौते पर पहुाँचाने के
दलर्े अपनी बुस्द्धमत्ता, ज्ञान व अनुिव का उपर्ोग
करके प्रर्ास करना चादहए। जो उसका सवयप्रथम
कतयव्य है। इस प्रर्ास में असिल होने के उपरान्त ही
दववाद का दवदनश्चर् करना चादहर्े। परन्तु उपरोक्त
कार्यवादहर्ोां का उल्लेख (सांक्षेप में) पांचाट में अवश्य
होना चादहए, दजसमें उसके द्वारा दववाद का दवदनश्चर्
करने का कारण पता चल सके। ऐसा उल्लेस्खत न
होने से र्ह प्रतीत होगा दक थथाई लोक अदालत, द्वारा
पक्षकारोां के बीच समझौता कराने का कोई प्रर्ास
नहीां दकर्ा गर्ा, जो उक्त अदधदनर्म के प्रावधानोां का
हनन करने के समकक्ष होगा। अतः ऐसी दशा में
'पांचाट' दवदधक रुप से मान्य नहीां माना जार्ेगा।
प्रकरण में उत्पन्न दवदधक प्रश्न का दनधायरण उपरोक्त
वणयन द्वारा दकर्ा जाता है।

(झ) वतयमान प्रकरण में पांचाट में समझौते
के प्रर्ास के सांबांध में कोई उल्लेख नहीां दकर्ा गर्ा है,
केवल एक थथान पर समझौते के दलए तारीख
दनधायररत की गर्ी, ऐसा उल्लेस्खत है, परन्तु उक्त
तारीख पर क्या प्रर्ास दकर्े गर्े व क्योां पक्षकार
समझौता नहीां कर पार्े, ऐसा कुि िी नहीां दलखा गर्ा
है। अतः र्ह प्रतीत होता है 'थथाई लोक अदालत' ने
सौहार्द्यपूणय समझौते के दलए कोई िी प्रर्ास नहीां
दकर्ा होगा र्ा र्ुस्क्त र्ुक्त प्रर्ास की कमी रही होगी
तथा वो सीधे दववाद में दवदनश्चर् की स्थथदत पर पहुाँच
गर्े जो, उपरोक्त दवश्लेषण के पूणयतः दवपरीत है।
अतः आक्षेदपत पांचाट इसी कारणवश, अदवदधक व
दूदषत हो जाता है। क्योां दक र्ह न्यार्ालर् इस दनष्कषय
पर पहुाँचता है दक थथाई लोक अदालत द्वारा समझौते
की प्रदिर्ा का प्रर्ास दकर्े दबना दववाद पर गुण-दोष
पर दनणयर् देना अवैधादनक है, अतः इस स्तर पर पांचाट
की गुण-दोष पर जााँच करने की आवश्यकता नहीां है।

7. विष्किथ

उपरोक्त दवश्लेषण के िलस्वरुप,
आक्षेदपत 'पांचाट' दनरस्त दकर्ा जाता है तथा वाद 'थथाई
लोक अदालत' को प्रदतप्रेदषत दकर्ा जाता है और
दनदेदशत दकर्ा जाता है दक वो समझौता कराने की
प्रदिर्ा को अपना कर पक्षकारोां के मध्य सुलह कराने
का र्ुस्क्तर्ुक्त प्रर्ास करेगी व उसके असिल होने
के उपराांत ही वाद का गुण-दोष पर दवदनश्चर् करेगी
तथा समझौते के प्रर्ास असिल होने का सांक्षेप में
उल्लेख पांचाट में िी करेगी। उपरोक्त दनदेश के साथ
र्ह र्ादचका आांदशक रुप से स्वीकार की जाती है।
----------

(2022)01ILR A280
ORIGINAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 04.12.2021

BEFORE

THE HON'BLE JAYANT BANERJI, J.

Writ C No. 7012 of 2016

Sone Lal Kushwaha ...Petitioner
Versus
Presiding Officer Labour Court-III, U.P.
Kanpur & Anr. ...Respondents