# Satya Narayan @ Sattan v. State of U.P

- **Citation:** (2023) 4 ILRA 1100
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2023-04-12
- **Case number:** Crl. Misc. Ist Bail Application No. 20211 of 2022
- **Bench:** Saurabh Shyam Shamshery
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/satya-narayan-sattan-v-state-of-u-p-49795
- **Pages:** 7

## Headnote

Sri Paritosh Malviya(A.G.A.)

आपराथिक कानून - भारतीय दंड संहहता, 1860 - िारा
147, 302/34 - दंड प्रकक्रया संहहता, 1973 - िारा
154, 161, 173 - हत्या - प्रिकम सूचना ररपोटक के
अनुसार - हदनांक 18.12.2021 को करीब सायं 6 बजे
सूचनाकताक (मृततका का ससुर) की बहू, शौच के मलए
गााँव के बाहर खेत के तरफ गई िी, उसके साि उसकी
पुत्री के साि अन्य महहलाए भी िी - शौच से वापस
लौटते समय रास्ते में ही आवेदक (मृततका का वपता) के
साि अन्य लोगों ने चाकू मार कर उसकी बहू की हत्या
कर दी - दो वर्क पूवक मृततका ने अपने पररवार की सहमती
के बबना सूचनाकताक के पुत्र से भागकर वववाह कर मलया
िा, ण्जसके कारण आवेदक के साि पररवार के अन्य लोग
रंण्जश रखते िे - आरोप पत्र - आवेदक और दो अन्य के
ववरुद्ि दार्खल ककया गया - न्यायलय ने माना कक
घटना के समय तीन चक्षुदशी उपण्स्ित िे - उन्होने सभी
हमलावरो को पहचान मलया िा, जो उसी गााँव के िे व
मृततका के रररश्तेदार भी िे - उन्होने यह बताया कक कैसे
घटना घटी व ककसने मृततका पर प्राण घातक वार ककया -
आवेदक घटना स्र्िल पर मौजूद िा, घूाँघट उठा कर अपनी
पुत्री को पहचाना व उसके पुत्र ने चाकू से उसकी हत्या कर
दी, ण्जसकी मृत्यु पश्चात शव ववच्छेदन में वर्णकत मृत्यु
पूवक चोटों से पुण्ष्ट भी होती है - आवेदक ने पूणक योजना के
तहत, सामान्य आशय को अग्रसर करने के मलए कायक
ककया - अतः वह इस अपराि में प्रिम दृष्टया शाममल है
- अन्वेर्ण के दौरन एकत्र ककये गए साक्ष्य घटना को
'सम्मान रक्षा हेतु हत्या' का मामला बनाते है| (पैरा
1,2,3,4,17,18)

जमानत अजी खारिज की गई| (E-13)
4 All. Satya Narayan @ Sattan Vs. State of U.P.
1101
उद्धृत मामलों की सूची:

## Text

1100 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES

19. The present case before me is of a
fair price shop which when checked by the
authorities was found short of certain stock.
The applicant has not been able to show
that the FIR was registered with some
ulterior motives. The offence shall fall in
the categories under Section 7(1)(a)(ii)
entailing punishment up to 7 years.

20. No probable defence or reason has
been offered for false implication.

21. I considered all the submissions,
facts, circumstances and material before
me, It may be kept in mind that anticipatory
bail is an extraordinary remedy to be
exercised in suitable cases only. The power
under Section 438 Cr.P.C. cannot be
utilized in a routine manner and definitely
not as a substitute for regular bail. This
discretionary power calls for existence of
facts of the kind where the court is satisfied
that its interference is necessary to further
the cause of justice and to prevent misuse
of process of law.

22. In view of the facts and
circumstances of the case I do not find it fit
case to grant benefit of anticipatory bail.

23. Hence the anticipatory bail
application is rejected.

24. The Registry is directed to
circulate this judgment to all concerned.
----------

(2023) 4 ILRA 1100
APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: ALLAHABAD 12.04.2023

BEFORE

THE HON'BLE SAURABH SHYAM
SHAMSHERY, J.
Crl. Misc. Ist Bail Application No. 20211 of 2022

Satya Narayan @ Sattan ...Applicant
Versus
State of U.P. ...Respondent

Counsel for the Applicant:
Sri Girish Kumar Singh, Sri Kamlesh Singh, Sri
Akhilesh Singh

Counsel for the Respondent:
Sri Paritosh Malviya(A.G.A.)

आपराथिक कानून - भारतीय दंड संहहता, 1860 - िारा
147, 302/34 - दंड प्रकक्रया संहहता, 1973 - िारा
154, 161, 173 - हत्या - प्रिकम सूचना ररपोटक के
अनुसार - हदनांक 18.12.2021 को करीब सायं 6 बजे
सूचनाकताक (मृततका का ससुर) की बहू, शौच के मलए
गााँव के बाहर खेत के तरफ गई िी, उसके साि उसकी
पुत्री के साि अन्य महहलाए भी िी - शौच से वापस
लौटते समय रास्ते में ही आवेदक (मृततका का वपता) के
साि अन्य लोगों ने चाकू मार कर उसकी बहू की हत्या
कर दी - दो वर्क पूवक मृततका ने अपने पररवार की सहमती
के बबना सूचनाकताक के पुत्र से भागकर वववाह कर मलया
िा, ण्जसके कारण आवेदक के साि पररवार के अन्य लोग
रंण्जश रखते िे - आरोप पत्र - आवेदक और दो अन्य के
ववरुद्ि दार्खल ककया गया - न्यायलय ने माना कक
घटना के समय तीन चक्षुदशी उपण्स्ित िे - उन्होने सभी
हमलावरो को पहचान मलया िा, जो उसी गााँव के िे व
मृततका के रररश्तेदार भी िे - उन्होने यह बताया कक कैसे
घटना घटी व ककसने मृततका पर प्राण घातक वार ककया -
आवेदक घटना स्र्िल पर मौजूद िा, घूाँघट उठा कर अपनी
पुत्री को पहचाना व उसके पुत्र ने चाकू से उसकी हत्या कर
दी, ण्जसकी मृत्यु पश्चात शव ववच्छेदन में वर्णकत मृत्यु
पूवक चोटों से पुण्ष्ट भी होती है - आवेदक ने पूणक योजना के
तहत, सामान्य आशय को अग्रसर करने के मलए कायक
ककया - अतः वह इस अपराि में प्रिम दृष्टया शाममल है
- अन्वेर्ण के दौरन एकत्र ककये गए साक्ष्य घटना को
'सम्मान रक्षा हेतु हत्या' का मामला बनाते है| (पैरा
1,2,3,4,17,18)

जमानत अजी खारिज की गई| (E-13)
4 All. Satya Narayan @ Sattan Vs. State of U.P.
1101
उद्धृत मामलों की सूची:

1. प्रिोद बनाि उिर प्रदेश सरकार (आपराधिक प्रकीणत
जिानत प्राथतना पत्र संख्या - 20211 सन् 2022

2. िगिान दास बनाि राज्य (एन.सी.टी. ऑफ ददलली)
(2011) 6 एस.सी.सी. 396

(Delivered by Hon'ble Saurabh Shyam
Shamshery, J.)

पूवक कायकवाही

१. िततिान, आपराधिक प्रकीणत जिानत
प्राथतना पत्र, आिेदक सत्य नारायण उफत सिन, जो
अपराि संख्या २५६/2021, िारा- १४७,३०२,३४
िारतीय दण्ड संदहता, थाना - बरहज, जनपद-
देिररया, िें एक आरोपी है, के द्िारा दार्खल जिानत
प्राथतना पत्र संख्या- ३९/२०२२, न्यायालय सत्र
न्यायािीश, देिररया आदेश ददनााँक - ०९.०२.२०२२
द्िारा ननरस्त होने के उपरान्त, दण्ड प्रकिया संदहता
की िारा- ४३९ के अंतगत, इस न्यायालय िें दायर
ककया गया है।

प्रिम सूचना तथ्य

२. सूचनाकतात (शम्िू राजिर) ने एक प्रथि
सूचना ररपोटत संख्या- २५६ सन् २०२१ (अन्तगत िारा
- १५४ दंड प्रकिया संदहता), थाना- बरहज, जजला-
देिररया िें इस सूचना के साथ दजत करिाई कक,
ददनााँक १८.१२.२०२१ को सिय करीब सायं ६ बजे
उसकी बहू ज्योती राजिर पत्नी ज्ञानचन्र राजिर,
शौच के भलए गााँि के बाहर खेत के तरफ गयी थी,
उसके साथ उसकी पुत्री रानी राजिर, सोनि राजिर
पत्नी िुिर राजिर, कररचिा राजिर पुत्री श्री ककशुन
राजिर िी थे। शौच से िापस लौटते सिय रास्ते िें
ही उसके गााँि के सत्य नारायण उफत सिन पुत्र राि
सिुझ, राजनाथ पुत्र राि सिुझ, िोले उफत आशुतोष
पुत्र सत्य नारायण ि गोलू पुत्र राजनाथ ने चाकू िार
कर उसकी बहू ज्योनत की हत्या कर दी। ज्योनत पुत्री
सत्य नारायण दो िषत पहले उसके ल़िके के साथ घर
से िाग गयी थी, जजसके कारण सत्य नारायण,
राजनाथ ि इसके पररिार के लोग उससे रंजजश रखते
थे, इसभलये उपरोक्त चारों ने भिलकर ज्योनत की
हत्या कर दी।

आरोप पत्र

३. उपरोक्त सूचना पर अन्िेषण ककया गया
एिं दण्ड प्रकिया संदहता की िारा - १७३ के अंतगत
आरोप पत्र िारा - १४७,३०२,३४ िारतीय दण्ड संदहता
के अंतगत आरोपी १- सत्य नारायण उफत सिन
(आिेदक) ि २- राजनाथ के विरूद्ि दार्खल ककया
गया तथा बाल अपचारी िोलू उफत आशुतोष ि बाल
अपचारी गोलू उफत आशीष के विरूद्ि िारा -
१४७,३०२,३४ िारतीय दंड संदहता के अन्तगत
न्यायालय, ककशोर न्याय बोडत िें दार्खल ककया गया।

आवेदक का पक्ष

४. श्री धगरीश कुिार भसंह, आिेदक के विद्िान
अधििक्ता ने यह तकत ददया कक आिेदक िृतका का
वपता है, जबकक सूचनाकतात िृतका का ससुर है।
िो(आिेदक) ननदोष है तथा िततिान दाजण्डक
कायतिाही िें गलत रूप से फंसाया गया है।

५. विद्िान अधििक्ता नें यह िी तकत ददया कक
अभियोजन कथानक घटना को 'सम्िान रक्षा हेतु
हत्या (ऑनर ककभलंग)' का रूप देना चाहता है, कक
िृतका ने सूचनाकतात के पुत्र से दो िषत पूित उसकी ि
उसके पररिार की सहिनत के बबना वििाह कर भलया
था जजसका बदला लेने के भलए आिेदक ि उसके
1102 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
नाबाभलग पुत्रों ि अन्य ने आिेदक की पुत्री की हत्या
कर दी, जबकक सत्यता यह है कक, सूचनाकतात की
पत्नी िृतका को अपने घर िें रहने देना नही चाहती
थी। अतः सुननयोजजत ढंग से न केिल उसकी हत्या
करिाई बजलक सिस्त आरोप आिेदक ि उसके
पररिार पर डाल ददये।

६. घटना के ३ चक्षुदशी गिाह बतायें जाते है
परन्तु िो तीनों िदहलायें, सूचनाकतात के पररिार से
है और अन्िेषण अधिकारी ने घटना स्थल के आसपास रहनें िाले ग्राि िाभसयों का कोई िी ब्यान नही
भलया और न ही िो व्यजक्त जो िृतका को
सािुदानयक स्िास्थ केन्र पर लाया उसका ही ब्यान
दजत ककया।

७. अभियोजन कथानक के अनुसार िृतका
की हत्या करने के पूित उसको कुछ दूर तक िकेला
िी गया था, परन्तु उसके शरीर पर कोई िी िृत्यु
पूित चोटें नही पायी गयी।

८- घटना ४ व्यजक्तयों द्िारा काररत की गई,
आिेदक के नाबाभलग पुत्रो पर चाकू से िार करने का
आरोप लगाया गया है, परन्तु आिेदक पर कोई
विभशष्ट कृत्य करने का आरोप नही है और न ही
कोई ऐसा साक्ष्य एकत्र ककया गया है, कक आिेदक ने
सिान्य आशय को अग्रसर करने के भलए या विधि
विरूद्ि जिाि के सिान्य उद्देचय को अग्रसर
करने के भलए कोई कृत्य ककया है।

राज्य (अमभयोजन) का पक्ष

९. श्री पाररतोष िालिीय, अनतररक्त
शासकीय अधििक्ता नें उपरोक्त तकों का पुरजोर
विरोि ककया और कथन ककया कक आिेदक पर
एक संगीन अपराि करने का आरोप है, कक िो
अपनी पुत्री के कत्ल िें शाभिल रहा और सािान्य
आशय के अग्रसर िे अपराि िें सिीय रूप से
शाभिल रहा।

१०. अन्िेषण के दौरान यह साक्ष्य िी
उजागर हुआ कक िृतका (आिेदक की पुत्री) ने िषत
२०१९ िे सूचनाकतात के पुत्र से िागकर ि पररिार
की इच्छा के विरूद्ि वििाह कर भलया था। जजसके
कारण सिाज िें उनकी बदनािी हुई और इस नाते
ग्राि िासी उनको तानें िारते रहते थे, इसभलए
योजनाबद्ि तरीके से अपराि काररत कर पुत्री की
हत्या कर दी।

११. घटना के तीन चक्षुदशी गिाह है,
उन्होनें िारा १६१ दं.प्र.सं. के अन्तगत ब्यान दजत
करायें हैं तथा घटना का वििरण िी बताया है, जो
प्रथि सूचना के तथ्यों का सिथतन करता है कक,
जब िह (घर की िदहलायें) शौच करने जा रही थी
तो आरोवपयों ने पहले तो उनको घेर भलया और
कफर घूंघट उठाकर िृतका की पहचान करके
उसको दूसरे खेत िे ले जा कर उसकी हत्या कर
दी। आिेदक के नाबाभलग पुत्र ने चाकू से िृतका
पर कई िार ककये जजसका सिथतन िृत्यु पचचात
शि विच्छेदन आख्या िें भलर्खत िृत्यु पूित चोटों
से पूणतः भसद्ि होता है जो संख्या िे पााँच है।
अतः यह एक 'सम्िान रक्षा हेतु हत्या' है

१२. आिेदक के विद्िान अधििक्ता के शेष
तकत उनके बचाि के तकत है जजस पर इस स्तर पर
विचार नही ककया जा सकता है। जिानत प्राथतना
पत्र ननरस्त करने योग्य है।

१३. िेरे द्िारा उिय पक्षों की बहस को सुना
गया एिं पत्रािली का पररशीलन ककया गया।
4 All. Satya Narayan @ Sattan Vs. State of U.P.
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१४. न्यायालय द्िारा जिानत की विधि को
विस्तृत
रूप
से
अपने
तनणकय
हदनांक
०४.०४.२०२३,आपराथिक प्रकीणक जमानत प्रािकना
पत्र संख्या- २०२११ सन् २०२२ (प्रमोद प्रतत उत्तर
प्रदेश सरकार) िें उललेर्खत ककया गया, जजसके
कुछ अंश ननम्नभलर्खत हैंः-

"(क) सारगभित िारणा से संिित: िूल
ननयि, जिानत है न की कारागार (देखें : राजस्िान
राज्य, जयपुर बनाम बलचंद @ बमलया: (१९७७
एआईआर २४४७, १९७८ एससीआर (१) ५३५)।
िा.दं.सं की िारा ४३९ के तहत जिानत देने की
शजक्त के व्यापक आयाि है तथा न्यायालय को
असीभित तो नही परन्तु पयातप्त वििेकाधिकार
प्रदान ककये गये है, जजसका उपयोग न तो सािान्य
रुप से और न ही िनिाने रुप से, परन्तु न्यायसंगत
रुप से करने के भलए प्रस्तावित ककया गया है ।
(देखें: राम गोववंद उपा्याय बनाम सुदशकन मसंह:
(२००२) ३ एससीसी ५९८ और नीरू यादव बनाम
उत्तर प्रदेश शासन (२०१६)१५ एससीसी ४२२)।

(ख) जिानत देने के भलये विचारात्िक कारक
है, अपराि होने की पररजस्थनतयों की प्रकृनत और
गंिीरता; पीड़ित और गिाहों के संदित िें आरोपी की
जस्थनत और हैभसयत; आरोपी के न्याय प्रकिया से
िागने की संिािना; अपराि दोहराने की संिािना;
िािले िें संिावित सजा की कठोर संिािना के
साथ अपने स्ियं के जीिन को खतरे िें डालना;
गिाहों के साथ छे़िछा़ि; िािले का इनतहास और
साथ ही इसकी जांच और अन्य प्रासंधगक आिार,
जो अन्य िहत्िपूणत कारकों पर ध्यान करते हुए,
व्यापक रूप से ननिातररत नहीं ककये जा सकते
है।(देखें : गुरचरण भसंह बनाि राज्य (ददलली
प्रशासन), (१९७८) १ एससीसी ११८)

(ग) प्रासंधगक कारक कौन से हो सकते हैं,
इसका कोई ननिातररत ननयि (स्रेट जैकेट फॉिूतला)
किी िी ननयत नहीं ककया जा सकता है, हालांकक,
कुछ िहत्िपूणत कारक जजन्हें अन्य कारकों के साथ
हिेशा विचारणीय िाना जाता है, िो हैं , प्रथि
दृष्टया अभियुक्त की संभलप्तता, आरोप की प्रकृनत
और गंिीरता, सजा की कठोरता, आरोपी का चररत्र,
जस्थनत और उसकी अिजस्थनत से संबंधित है।(देखें:
उत्तर प्रदेश शासन प्रतत अमरमर्ण बत्रपाठी, (२००५)
८ एससीसी २१)

(घ) मन्नो लाल जायसवाल बनाम उत्तर प्रदेश
शासन और अन्य: २०२२ एससीसी ऑनलाइन
एससी ८९ िें उच्चति न्यायालय ने कहा है कक, जब
अभियुक्तों को िारतीय दंड संदहता की िारा १४९ के
तहत दंडनीय अपरािों के भलए आरोवपत ककया गया
है और जब उनकी उपजस्थनत स्थावपत हो जाती है
और यह कहा गया हो कक िो विधि विरुद्ि जिाि
के सदस्य थे, तो उनकी व्यजक्तगत िूभिका और/या
व्यजक्तगत आरोपी द्िारा ककया गया अत्युजक्त
िहत्िपूणत और/या प्रासंधगक नहीं होती है।

(ङ) आभशि बनाि राष्रीय जांच एजेंसी :
(२०२२) १ एससीसी ६९५ िें, उच्चति न्यायालय ने
कहा है कक एक बार जब यह स्पष्ट हो जाये कक
सियोधचत विचारण संिि नहीं हो पायेगा और
आरोपी कारागार िें एक दीघत अिधि व्यतीत कर
चुका है, तो न्यायालय आि तौर पर उसे जिानत
पर छो़िने के भलए बाध्य हो जाते है।

(च) आरोपी को जिानत पर ररहा करने का
आिार िात्र इसभलए कक अभियोजन का िािला,
पररजस्थनतजन्य साक्ष्य पर आिाररत है, नहीं हो
सकता है, अगर जांच के दौरान साक्ष्य/तथ्य एकत्र
ककये गये हो और प्रथि दृष्टया घटनाओं की पूरी
श्रृंखला स्थावपत हो गई है। (देखें : ईचिरजी नागाजी
1104 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
िाली बनाि गुजरात राज्य और अन्य २०२२
एससीसी ऑनलाइन एससी ५५)

(छ) यह िी ध्यान िें रखा जाना चादहए कक
जिानत देने के भलए वििानयका ने "साक्ष्य" के
स्थान पर "विचिास करने के भलए उधचत आिार"
शब्दों का प्रयोग ककया है, जजसका अथत है कक
जिानत देने से संबंधित न्यायालय केिल इतनी
संतुजष्ट कर सकता है कक क्या आरोपी के र्खलाफ
कोई िास्तविक िािला है और अभियोजन पक्ष
आरोप के सिथतन िें प्रथि दृष्टया साक्ष्य पेश करने
िें सक्षि होगा। (देखें : प्रहलाद मसंह भाटी बनाम
एनसीटी आफ हदल्ली और अन्य:(२००१) ४
एससीसी २८०)।

(ज) िुक्त न्याय का एक िौभलक आिार है,
जजसके भलए हिारी न्यानयक प्रणाली प्रनतबद्ि है,
कक िो कारक जो न्यायािीश के िानस िें ज़िानत
को अस्िीकृत या स्िीकृत करने के भलए िूलयांककत
ककये गये, िो पाररत आदेश िें उललेर्खत ककये
जायें। िुक्त न्याय इस िारणा पर आिाररत है कक
न्याय न केिल ककया जाना चादहए, बजलक स्पष्ट
और ननस्संदेह रूप से होता हुआ ददखना िी चादहए।
न्यायसंगत ननणतय देने का न्यायािीशों का कततव्य
इस प्रनतबद्िता का हृदय है। (देखें: महहपाल बनाम
राजेश कुमार,: (२०२०) २ एससीसी ११८ और सुश्री
वाई बनाम राजस्िान राज्य और अन्य :२०२२
एससीसी ऑन लाइन एस सी ४५८)

(झ) जिानत के आिेदन पर आदेश पाररत
करते सिय विस्तृत वििरण का उललेख, इस
िारणा के नाते नहीं ककया जा सकता है, कक िािला
ऐसा है जजसके पररणािस्िरूप दोषभसद्धि हो सकती
है या इसके विपरीत, दोषिुजक्त हो सकती है।
हालांकक, जिानत के आिेदन पर ननणतय लेने िाला
न्यायालय िािले के िौनतक पहलुओं से अपने
ननणतय को पूरी तरह से अलग नहीं कर सकता, जैसे
आरोपी के र्खलाफ लगाए गए आरोप ; अगर आरोप
यथोधचत संदेह से परे साबबत होते हैं और इसके
पररणािस्िरूप दोषभसद्धि होती है तो सजा की
कठोरता; अभियुक्त द्िारा गिाहों को प्रिावित
करने की उधचत आशंका; साक्ष्यों से छे़िछा़ि;
अभियोजन के िािले िें ननरािारता; आरोपी का
आपराधिक पूितिृि; और आरोपी के विरुद्ि आरोप
के सिथतन िें न्यायालय की प्रथि दृष्टया संतुजष्ट।
(देखेः मनोज कुमार खोखर बनाम राजस्िान राज्य
और अन्य (२०२२)३ एनसीसी ५०१, दीपक यादव
प्रतत उत्तर प्रदेश राज्य व एक अन्य (२०२२)८
एससीसी ५५९)।"

सम्मान रक्षा हेतु हत्या (ऑनर ककमलंग)

१५. 'सम्िान रक्षा हेतु हत्या' हिारे सिाज के
भलए एक कलंक के सिान है, जहां िारत का
संवििान जीिन का अधिकार देता है, िही ककसी को
िी सािारणतया जीिन छीनने का अधिकार नही
देता है। सिाज िें अपनी झूठी शान बरकरार रखने
को एक कारण बताते हुए, यदद पररिार के ही सदस्य
या अन्य कोई, अपनी पुत्री या बहन का कत्ल कर
देता है तो यह कृत्य सभ्य सिाज का घोतक कदावप
नही हो सकता, बजलक एक ऐसे सिाज के होने का
प्रिाण देता है, जो बबतर है, जो िूर है, जो असभ्य है।
ऐसे सिाज ि ऐसी व्यिस्था को यदद इस सदी िें िी
सहन करना प़िे तो इस देश के िविष्य के भलए
उधचत नही होगा। विरोि और इच्छा के विरूद्ि
कायत करने िाले पररिार के सदस्य को िौत के घाट
उतारने से न तो ककसी का सम्िान बढेगा और न ही
उसके साहस की तारीफ होगी, बजलक यह कायरता
ही कहलायेगी।

१६. उपरोक्त विषय पर उच्चति न्यायालय
द्िारा भगवान दास प्रतत राज्य (एन.सी.टी. ऑफ
4 All. Satya Narayan @ Sattan Vs. State of U.P.
1105
हदल्ली)(२०११) छ एस.सी.सी. ३९६ के ननणतय िे की
गई दटप्पणी का उललेख करना साथतक रहेगा ककः-

" --- इस ननणतय को सिाप्त करने से पूित हि
यह कहना चाहेंगे कक 'सम्िान रक्षा हेतु हत्या'
(ऑनर ककभलंग), इस देश के कई िागों िें, विशेष
रूप से हररयाणा, पजचचिी उिर प्रदेश ि राजस्थान
िें सािान्य हो गई है।

बहुिा युिा युगल जो प्यार करने लगते है,
उनको पुभलस लाईन्स या आश्रय गृह िें पनाह
लेनी प़िती है। हिनें लता भसंह के प्रकरण (पूित
िे उललेर्खत) िें यह ननिातररत ककया कक '
सम्िान रक्षा हेतु हत्या' िें, 'सम्िान' जैसा कुछ
िी नही होता तथा इस तरह के कृत्य, कट्टर
व्यजक्तयों ि सािंती िानस िाले व्यजक्तयों द्िारा
ककये गये बबतर और िूर हत्याओं के अनतररक्त
कुछ िी नहीं है। हिारी राय िें, 'सम्िान रक्षा हेतु
हत्या' ,चाहे कारण कोई िी हो, दुलति से दुलति
िािलों की श्रेणी िे आते है जो िृत्यु दंड िांनछत
करते है। अब सिय है, कक इन बबतर व्यजक्तयों ि
सािंती प्रथाओं को धचजन्हत ककया जायें, जो
हिारे देश पर कलंक है, जो अपिानजनक एिं
असभ्य व्यिहार के भलए आिचयक रूप से एक
ननिारक है। िह सिी लोग, जो 'सम्िान रक्षा हेतु
हत्या' हेतु योजना बना रहे है, उनको ज्ञात होना
चादहये कक फांसी का तख्ता उनकी प्रतीक्षा कर
रहा है।"

ववश्लेर्ण-

१७. उपरोक्त िर्णत तथ्यों, तकों ि
विधिक पररजस्थनतयों से यह उजागर होता है
ककः-

(क) आिेदक की पुत्री (िृतका) ने अपने
पररिार से विरूद्ि ि घर से िागकर सूचनाकतात
के पुत्र से करीब दो िषत पूित वििाह कर भलया था।

(ख) घटना के सिय तीन चक्षुदशी
उपजस्थत थे। उन्होने सिी हिलािरो को पहचान
भलया था, जो उसी गांि के थे ि िृतका के
ररचतेदार िी थे। उन्होने यह बताया कक कैसे
घटना घटी ि ककसने िृतका पर प्राण घातक िार
ककया।

(ग) आिेदक घटना स्थल पर िौजूद था,
घूंघट उठा कर अपनी पुत्री को पहचाना ि उसके
पुत्र ने चाकू के कई िारों से अपनी बहन की
बबतरता पूितक हत्या कर दी, जजसकी िृत्यु पचचात
शि विच्छेदन िें िर्णत िृत्यु पूित चोटों से पुजष्ट
िी होती है।

(घ) आिेदक ने पूणत योजना के तहत,
सािान्य आशय को अग्रसर करने के भलए कायत
ककया। अतः िो इस संगीन अपराि िें प्रथि
दृष्टिा शाभिल है। अन्िेषण के दौरन जो साक्ष्य
एकत्र ककये गये है, िो िी प्रथि दृष्टिा इस
घटना को ' सम्िान रक्षा हेतु हत्या' की घटना है,
ऐसा दृजष्टगोचर करते है, क्योकक आिेदक ि
उसके
पररिारजन
अपनी
पुत्री(िृतका)
से,
सूचनाकतात के पुत्र से िाग कर वििाह करने से
सिाज िें हुए अपने अपिान से नाराज़ थे।

(ङ) आिेदक के विद्िान अधििक्ता द्िारा
ददये गये अन्य तकत िात्र उनके बचाि के तकत है,
जजस पर इस स्तर पर विचार नही ककया जा
सकता है।

तनष्कर्क

१८. उपरोक्त तथ्यात्मक ि विविक विश्लेिण
का एक माि वनष्किव है, वक ितवमान जमानत प्रार्थवना
1106 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
पिवनरस्त करने योग्य है, अतः वनरस्त वकया जाता
है।
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(2023) 4 ILRA 1106
REVISIONAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: LUCKNOW 28.03.2023

BEFORE

THE HON'BLE SURESH KUMAR GUPTA, J.

Criminal Revision No. 1357 of 2022

Raj Kumar Yadav @ Kalu & Ors.
 ...Revisionists
Versus
State of U.P. & Anr. ...Opp. Parties

Counsel for the Revisionists:
Prem Kumar Singh

Counsel for the Opp. Parties:
G.A., Rajesh Shukla, Surya Narayan Mishra

Criminal Law - Indian Penal Code, 1860 -
Sections 323, 325, 307, 504 & 506 - The
Code of Criminal Procedure, 1973 -
Sections 311, 397, 401 - Revisionist
moved application u/s 311 CrPC before
Trial Court for the cross-examination of
PW-1 - Application was rejected with
detailed speaking order by Trial Court -
Being aggrieved, revision filed - Held, the
object of Section 311 CrPC enable the
Court at any stage of inquiry summon any
person as a witness - The object is to do
justice - It is done neither to fill up any
gap in the prosecution evidence nor to
give any unfair advantage against the
accused - This is the admitted fact that
accused persons are well known to PW-1
and they are villagers, so, the identity of
accused persons could not be doubted -
They could be identified even by word
spoken by them and time of incident is
about 6:30 p.m - At that time the question
of darkness is not arise - Hence, no
illegality in the impugned order. (Para 2,
3, 4, 8, 9)

Revision dismissed. (E-13)
(Delivered by Hon'ble Suresh Kumar
Gupta, J.)

1. Heard Sri Prem Kumar Singh,
learned counsel for revisionists, Sri Surya
Naryan
Mishra,
learned
counsel
for
opposite party no.2, learned AGA for the
State and perused the record.

2. This Criminal Revision has been
preferred u/s 397/401 CrPC against the
order dated 26.11.2022 on the Application
dated 26.11.2022 u/s 311 CrPC moved by
revisionists, passed by Additional Session
Judge, Court No.7, Gonda in Session Trial
No.
85/2018,
vide
Crime
No.
C14/2014,u/s 323/325/307/504/506 IPC, P.S.
Wzir Ganj, Gonda.

3. Learned counsel for revisionists
submitted that the application u/s 311 CrPC
has been moved before learned trial court
with prayer that for the interest of justice he
want to cross-examine the PW-1 Sri Umesh
Dutt Singh on following points:

(i) Was it dark at the time of incident?

(ii) Were people's faces visible at the
time of incident?

(iii) Were you able to recognize the
accused Raj Karan, Krishna Kumar and
Shiv Kumar at the time of incident.

(iv) Was the accused name in written
report on the advice of villager's?

4. The trial court rejected the
application
of
revisionists
for
crossexamination of above points by detail
speaking order dated 29.11.2022, order of
learned trial court reflect that sufficient
cross examination has been done by
learned counsel for revisionist. Each and
every aspect touch by the trial court. Trial
is fix for 313 CrPC and on behalf of
revisionist delay tactics adopted by the