# Shailendra Kumar Prajapati v. State Of U.P. & Anr. Opp. Parties 1418 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES

- **Citation:** (2022) 5 ILRA 1417
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2022-03-29
- **Case number:** Criminal Misc. Transfer Application No. 285 of 2021
- **Bench:** Saurabh Shyam Shamshery
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/shailendra-kumar-prajapati-v-state-of-u-p-anr-opp-parties-1418-indian-law-48517
- **Pages:** 6

## Headnote

Criminal Law - Criminal Procedure Code,
1973 - Sections 407 & 408 .- अर्गर निकसी
पकार को यL यर्थोनि]त आशंका Lै निक उसे न्याय की
प्रानिप्त िLैीैं Lैो पायेर्ी तो मामला या अपील का
अन्तरणग कर देिा ]ैानिLए। इस िाते पकार को यL दशा
िे की आवश्यकता िLैीैं Lै निक न्याय अनििवाय रुप
से निवफल Lैो जायेर्ाग, अर्गर वो ऐसे परररस्थर्थस्र्र्थनितयां
निदखािे में सफल Lैोता जाता Lै , नजजिसे यL अिुमाि
लर्ागया जा सकता Lै , निक उसको आशंका Lै , जो
परररस्थर्थस्र्र्थनितयों के मद्देिजर यर्थोनि]त भी Lै तो
स्र्र्थान्तरणग का मामला Lैो जायेर्ाग। परन्तु मात्र
अनशभकर्थगि की निकसी मामले में न्याय ि Lैोिे की
आशंका Lै , स्र्र्थान्तरणग का पया प्त कारणग िLैीैं Lैोर्ाग
तर्थाग न्याय के उद्देश्यों के नललये समी]ैीि भी िLैीैं
Lैोर्ाग। न्यायालय को यL निि/ैा रररत करिा Lैोर्ाग
निक उक्त आशंका यर्थोनि]त Lै ि निक काल्पनििक
जो मात्र अिुमाि और अटकलों पर आ/ैारररत.

Application Dismissed. (E-12)

List of Cases cited:-

## Text

5 All. Shailendra Kumar Prajapati Vs. State of U.P. & Anr.
1417
healthy rule is not followed, the result will
only be undue harassment to assessees and
chaos in administration of tax laws.

(b) Just as the judgments and
orders of the Supreme Court have to be
faithfully
obeyed
and
carried
out
throughout the territory of India under
Article 141 of the Constitution, so should
be the judgments and orders of the High
Court by all inferior courts and tribunals
subject to supervisory jurisdiction within
the State under Article 226 and 227 of the
Constitution.

(c) If an officer under the Income
Tax Act, 1961 refuses to carry out the clear
and unambiguous direction in a judgment
passed by the Hon'ble Supreme Court or
High Court or the Income Tax Appellate
Tribunal then in effect, it is denial of justice
and is destructive of one of the basic
principles in the administration of justice
based on hierarchy of the Court.

(d) Unless there is a stay obtained
by the authorities under the Income Tax
Act, 1961 from higher forum, the mere fact
of filing appeal or SLP will not entitle the
authority not to comply with the order of
the High Court. Even though the authority
may have filed an appeal or SLP but either
could not obtain a stay or the stay is
refused, the order of the High Court must
be complied with. Mere filing of an appeal
or SLP against the judgment or order of
High Court does not result in the assailed
judgment or order becoming inoperative
and unworthy of being complied with.

25. In view of the principles settled by
Hon'ble Supreme Court and by High Courts
in the judgments, briefly discussed above,
we direct the respondents to maintain
judicial
discipline
and
follow
the
doctrine of binding precedent and be
careful in future, having due regard to
the authorities of the Court, keeping in
mind
the
judicial
propriety
and
discipline.

26. The impugned notice dated
31.03.2021 issued on 01.04.2021 under
Section 148 of the Income Tax Act, 1961,
being without jurisdiction, cannot be
sustained
and
is
hereby
quashed.
Consequently, the order dated 19.03.2022
and
the
Reassessment
Order
dated
29.03.2022 for the Assessment Year 201314 can also not be sustained and are
hereby
quashed
inasmuch
as,
the
jurisdictional notice itself was without
jurisdiction.

27. For all the reasons afore-stated,
the writ petition is allowed to the extent
and in terms herein above.

28. Let copy of this judgment be sent
by the Registrar General of this Court to
the respondent no.1 for circulation amongst
the authorities under the Income Tax Act,
1961 and for observance of the principles
of the judicial discipline and propriety,
stated above.
----------
(2022)05ILR A1417
ORIGINAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: ALLAHABAD 01.04.2022

BEFORE

THE HON'BLE SAURABH SHYAM
SHAMSHERY, J.

Criminal Misc. Transfer Application No. 285 of
2021

Shailendra Kumar Prajapati ...Applicant
Versus
State Of U.P. & Anr. ...Opp. Parties
1418 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
Counsel for the Applicant:
Sri Ram Raj Prajapati, Sri D.K. Maurya

Counsel for the Opp. Parties:
G.A.

Criminal Law - Criminal Procedure Code,
1973 - Sections 407 & 408 .- अर्गर निकसी
पकार को यL यर्थोनि]त आशंका Lै निक उसे न्याय की
प्रानिप्त िLैीैं Lैो पायेर्ी तो मामला या अपील का
अन्तरणग कर देिा ]ैानिLए। इस िाते पकार को यL दशा
िे की आवश्यकता िLैीैं Lै निक न्याय अनििवाय रुप
से निवफल Lैो जायेर्ाग, अर्गर वो ऐसे परररस्थर्थस्र्र्थनितयां
निदखािे में सफल Lैोता जाता Lै , नजजिसे यL अिुमाि
लर्ागया जा सकता Lै , निक उसको आशंका Lै , जो
परररस्थर्थस्र्र्थनितयों के मद्देिजर यर्थोनि]त भी Lै तो
स्र्र्थान्तरणग का मामला Lैो जायेर्ाग। परन्तु मात्र
अनशभकर्थगि की निकसी मामले में न्याय ि Lैोिे की
आशंका Lै , स्र्र्थान्तरणग का पया प्त कारणग िLैीैं Lैोर्ाग
तर्थाग न्याय के उद्देश्यों के नललये समी]ैीि भी िLैीैं
Lैोर्ाग। न्यायालय को यL निि/ैा रररत करिा Lैोर्ाग
निक उक्त आशंका यर्थोनि]त Lै ि निक काल्पनििक
जो मात्र अिुमाि और अटकलों पर आ/ैारररत.

Application Dismissed. (E-12)

List of Cases cited:-

1. र्ुगरु]रि दास ]ड्ढा प्रनित राजस्र्र्थाि राज्य ए आई आर
: (1966) एस सी 1418,

2. अमरररन्दर नसंसL प्रनित प्रकाश नसंसL Tैादल :
(2009) 6 एस सी सी 260,

3. लालू प्रसाद यादव प्रनित झारखण्ड राज्य : (2013) 8
एस सी सी 593,

4. िाLर नसंसL यादव प्रनित भारत संघ (2011) 1 एस
सी सी 307

5. उसमाि र्गिी आदम भाई वोLरा प्रनित र्ुगजरात राज्य
व एक अन्य : (2016) 3 एस सी सी 370,

6. राजकुमार साTैू प्रनित मे. साTैू टरेड प्राइवेट
नललनिमटेड : 2021 एस सी सी ऑिलाइि एस सी
378
(Delivered by Hon'ble Saurabh Shyam
Shamshery, J.)

तथ्यात्मक प्रारुप

1. आवेदक (र्ैलेन्द्र कुमार प्रजापभत) ने
वतशमान स्थानान्तरण प्राथशना पत्र अूंतगशत धारा 407
दण्ड प्रभक्रया सूंभहता (सूंक्षेप में द. प्र.सूं.) के माध्यम
से सत्र परीक्षण सूंख्या 90 वषश 2021, राज्य प्रभत
र्ैलेन्द्र (मुकदमा अपराध सूंख्या 48 वषश 2019 धारा
376, 452, 506 िारतीय दण्ड सूंभहता, थाना
भवनवार, भजला हमीरपुर से अग्रसर) जो वतशमान में
अपर जनपद एवूं सत्र न्यायधीर् एफ.टी.सी. हमीरपुर
के न्यायालय में लूंभबत है को भजला हमीरपुर के उक्त
सत्र न्यायालय से उसी भजला के भकसी द सरे सत्र
न्यायालय में अन्तररत करने की प्राथशना की है।

2. वतशमान आवेदन के प्रस्तुत करने से प वश,
आवेदक ने एक स्थानान्तरण प्राथशना पत्र जनपद एवूं
सत्र न्यायाधीर्, हमीरपुर के समक्ष धारा 408
िा.दूं.सूं. के अूंतगशत उपरोक्त प्राथशना के भलये भकया
था परन्तु वो जनपद एवूं सत्र न्यायाधीर् के आदेर्
भदनाूंक 4.10.2021 के द्वारा भनरस्त कर भदया
गया।

आवेदक का पक्ष

3. आवेदक के भवद्वान अभधवक्ता श्री डी.के.
मौयाश (आवेदक के अभधवक्ता श्री राम राज प्रजापभत
द्वारा भनदेभर्त) ने कथन भकया भक आवेदक के
भवरुद्ध एक गलत मुकदमा दायर भकया गया है तथा
उभचत जाूंच करे भबना ही उसके भवरुद्ध आरोप पत्र
प्रेभषत कर भदया गया है। आवेदक वतशमान में
जमानत पर है तथा अवर न्यायालय के समक्ष
कायशवाही में उपन्धस्थत हो रहा है।

4. आवेदक के भवद्वान अभधवक्ता ने
स्थानान्तरण की प्राथशना के पक्ष में कथन भकया की-

(i) आवेदक को कोई प वश स चना भदये
भबना ही, जब अभियोजन साक्ष्य सूंख्या 2 का ब्यान
भलखा जा रहा था, उसी दौरान उपरोक्त सत्र परीक्षण
फास्ट टरैक कोटश- II को स्थानान्तररत कर भदया गया
और आवेदक को अभग्रम भतभथ की स चना के अिाव
में साक्षी की प्रभत परीक्षा का अवसर िी समाप् कर
भदया गया। इस सूंदिश में उसने एक प्राथशना पत्र िी
5 All. Shailendra Kumar Prajapati Vs. State of U.P. & Anr.
1419
दान्धखल भकया। जब कोरोना महामारी के कारण
सम्प णश देर् में कायशवाभहयाूं/गभतभवभधयाूं रुक सी गयी
थी, तब िी प वाशग्रह से ग्रभसत होकर, आवेदक के
भवरुद्ध गैर जमानती वारन्ट जारी कर भदया गया, जो
बाद में प्राथशना पत्र देने पर भनरस्त भकया गया।

(ii) भवद्वान अभधवक्ता ने यह िी कथन
भकया भक सत्र न्यायालय में काम कर रहे पेर्कार
(जगदीर् भमश्रा) जो पीभडता के अभधवक्ता के दोस्त
है वो इस मामले में प वाशग्रह से ग्रभसत हो मामले में
आवेदक के भवरुद्ध आदेर् करवा रहा है। आवेदक
की अनुपन्धस्थभत को उपन्धस्थभत भदखा कर, प्रभत
परीक्षा के भलये भतभथ भनयत करवा दी, भजसकी
स चना आवेदक व उसके अभधवक्ता को न होने के
कारण अगली भनयत भतभथ पर वो अनुपन्धस्थत रहे,
भजसके कारण प्रभतपरीक्षा का अवसर समाप् कर
भदया गया।

(iii) उपरोक्त भनवेदन के आधार पर
भवद्वान अभधवक्ता ने कथन भकया भक अगर मेरे
पक्षकार को यथोभचत आर्ूंका है भक न्याय नहीूं हो
पायेगा, तो सत्र परीक्षण को स्थानान्तररत कर भदया
जाना चाभहए। भनष्पक्ष सुनवाई का आश्वासन, न्याय
व्यवस्था की प्रथम अभनवायशता है। अतः प्राथशना पत्र
स्वीकार भकया जाये।

5. प्रभतवादी सूंख्या 2 (भवनोद) जो प्रथम
स चना ररपोटश के भर्कायतकताश है उनको वतशमान
प्राथशना पत्र का नोभटस बजात खास तामील कराया
गया परन्तु न तो वो स्वयूं और न ही अभधवक्ता के
माध्यम से न्यायालय के समक्ष उपन्धस्थत हुए जबभक
इस कारण से दो बार वतशमान प्राथशना पत्र पर अगली
भतभथ िी भनयत की गयी।

िाज्य का पक्ष

6. राज्य का पक्ष उसके अतररक्त र्ासकीय
अभधवक्ता ने न्यायालय के समक्ष रखा। उन्होने
न्यायालय का ध्यान जनपद एवूं सत्र न्यायाधीर् के
आदेर् भदनाूंक 4.10.2021 पर आकभषशत करवाया
भजसके द्वारा आवेदक की स्थानान्तरण प्राथशना पत्र
(अन्तगशत धारा 408 दूं0प्र0सूं0) भनरस्त भकया गया
है। उक्त आदेर् में यह उल्लेन्धखत है भक जब
आवेदक के भवद्वान अभधवक्ता को प्राथशना पत्र पर
बहस करने हेतु आमूंभत्रत भकया गया तो उनके द्वारा
यह कथन भकया गया भक उन्हे कुछ नहीूं कहना है
तथा प्राथशना पत्र का पररर्ीलन करके ही आदेर्
पाररत कर दें। प्राथशना पत्र िी नवीन अभधवक्ता ने
दान्धखल भकया था जो सत्र परीक्षण में आवेदक के
अभधवक्ता नहीूं है। आवेदक को अभियोजन साक्ष्य
सूंख्या 2 को प्रभतपरीक्षा की अनुमभत उनके द्वारा
प्राथशना पत्र को स्वीकार करते हुए दी जा चुकी है।
वतशमान में भर्कायतकताश द्वारा एक प्राथशना पत्र धारा
319 िा.दूं.प्र.सूं. के अन्तगशत दो अन्य लोगोूं को
तलब करने हेतु भदया गया है। भजस पर कोई आदेर्
पाररत नहीूं हुआ है। आवेदक द्वारा स्थानान्तरण का
प्राथशना पत्र मात्र मामले को भवलन्धम्बत रखने के
उद्देश्य से भदया गया है तथा प्रकरण में कोई यथोभचत
आकाूंक्षा नहीूं है तथा ऐसा कारण िी नहीूं है भक
आवेदक को न्याय भमलने की सूंिावना न हो, अतः
प्राथशना पत्र भनरस्त भकया जाये।

7. आवेदक व राज्य के भवद्वान अभधवक्ताओूं
को सुना व पत्रावली की सम्यक पररर्ीलन भकया।

सोंदभग- आपिालधक मामि ों के अन्तिण की
लवलध-

8. िारतीय दण्ड प्रभक्रया सूंभहता के अध्याय
31 में आपराभधक मामलोूं के अन्तरण की प्रभक्रया
उल्लेन्धखत की गई है। धारा 408 के अन्तगशत मामलोूं
और अपीलोूं को अन्तररत करने की सत्र न्यायधीर्
की र्न्धक्त का उल्लेख है, जबभक धारा 407 के
अूंतगशत मामलोूं और अपीलोूं को अन्तररत करने की
उच्च न्यायालय की र्न्धक्त का उल्लेख भकया गया है।
सूंदिश के भलये दोनोूं धारा भनम्न उल्लेन्धखत की जा रही
है-

"407. मामि ों औि अपीि ों क
अन्तरित कििे की उच्च न्यायािय की शम्बक्त-
(1) जब किी उच्च न्यायालय को यह प्रतीत कराया
जाता है भक-

(क)
उसके
अधीनस्थ
भकसी
दूंड
न्यायालय में ऋजु और पक्षपातरभहत जाूंच या
भवचारण न हो सकेगा ; अथवा
1420 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES

(ख) भकसी असाधारणतः कभठन भवभध
प्रश्न के उठने की सूंिाव्यता है ; अथवा

(ग) इस धारा के अधीन आदेर् इस
सूंभहता के भकसी उपबूंध द्वारा अपेभक्षत है, या
पक्षकारोूं या साभक्षयोूं के भलए साधारण सुभवधाप्रद
होगा, या न्याय के उद्देश्योूं के भलए समीचीन है,

तब वह आदेर् दे सकेगा भक-

(I) भकसी अपराध की जाूंच या भवचारण
ऐसे भकसी न्यायालय द्वारा भकया जाए जो धारा 177
से 185 तक के (भजनके अन्तगशत ये दोनोूं धाराएूं िी
हैं) अधीन तो अभहशत नहीूं है, भकन्तु ऐसे अपराध की
जाूंच या भवचारण करने के भलए अन्यथा सक्षम है ;

(ii) कोई भवभर्ष्ट मामला या अपील या
मामलोूं या अपीलोूं का वगश उसके प्राभधकार के
अधीनस्थ भकसी दूंड न्यायालय से ऐसे समान वररष्ठ
अभधकाररता वाले भकसी अन्य दूंड न्यायालय को
अूंतररत कर भदया जाए ;

(iii) कोई भवभर्ष्ट मामला सेर्न न्यायालय
को भवचारणाथश सुपुदश कर भदया जाए ; अथवा

(iv) कोई भवभर्ष्ट मामला या अपील स्वयूं
उसको अन्तररत कर दी जाए, और उसका भवचारण
उसके समक्ष भकया जाए।

(2) उच्च न्यायालय भनचले न्यायालय की
ररपोटश पर, या भहतबद्ध पक्षकार के आवेदन पर या
स्वप्रेरणा पर कायशवाही कर सकता है :

परन्तु भकसी मामले को एक ही सेर्न
खूंड के एक दूंड न्यायालय से द सरे दूंड न्यायालय को
अन्तररत करने के भलए आवेदन उच्च न्यायालय से
तिी भकया जाएगा जब ऐसा अन्तरण करने के भलए
आवेदन सेर्न न्यायाधीर् को कर भदया गया है और
उसके द्वारा नामूंज र कर भदया गया है।

(3) उपधारा (1) के अधीन आदेर् के
भलए प्रत्येक आवेदन समावेदन द्वारा भकया जाएगा,
जो उस दर्ा के भसवाय जब आवेदक राज्य का
महाभधवक्ता हो, र्पथपत्र या प्रभतज्ञान द्वारा समभथशत
होगा।

(4) जब ऐसा आवेदन कोई अभियुक्त
व्यन्धक्त करता है, तब उच्च न्यायालय उसे भनदेर् दे
सकता है भक वह भकसी प्रभतकर के सूंदाय के भलए,
जो उच्च न्यायालय उपधारा (7) के अधीन
अभधभनणीत करे, प्रभतिुओूं सभहत या रभहत बूंधपत्र
भनष्पाभदत करे।

(5) ऐसा आवेदन करने वाला प्रत्येक
अभियुक्त व्यन्धक्त लोक अभियोजक को आवेदन की
भलन्धखत स चना उन आधारोूं की प्रभतभलभप के सभहत
देगा भजन पर वह भकया गया है, और आवेदन के
गुणावगुण पर तब तक कोई आदेर् न भकया जाएगा
जब तक ऐसी स चना के भदए जाने और आवेदन की
सुनवाई के बीच कम से कम चौबीस घूंटे न बीत गए
होूं।

(6) जहाूं आवेदन भकसी अधीनस्थ
न्यायालय से कोई मामला या अपील अूंतररत करने
के भलए है, वहाूं यभद उच्च न्यायालय का समाधान हो
जाता है भक ऐसा करना न्याय के भहत में आवश्यक
है, तो वह आदेर् दे सकता है भक जब तक आवेदन
का भनपटारा न हो जाए तब तक के भलए अधीनस्थ
न्यायालय की कायशवाभहयाूं, ऐसे भनबूंधनोूं पर, भजन्हें
अभधरोभपत करना उच्च न्यायालय ठीक समझे, रोक
दी जाएूंगी:

परन्तु ऐसी रोक धारा 309 के अधीन
प्रभतप्रेषण की अधीनस्थ न्यायालयोूं की र्न्धक्त पर
प्रिाव न डालेगी।

(7) जहाूं उपधारा (1) के अधीन आदेर्
देने के भलए आवेदन खाररज कर भदया जाता है वहाूं,
यभद उच्च न्यायालय की यह राय है भक आवेदन तुच्छ
या तूंग करने वाला था तो वह आवेदक को आदेर् दे
सकता है भक वह एक हजार रुपए से अनभधक इतनी
राभर्, भजतनी वह न्यायालय उस मामले की
पररन्धस्थभतयोूं में समुभचत समझे, प्रभतकर के तौर पर
उस व्यन्धक्त को दे भजसने आवेदन का भवरोध भकया था।
5 All. Shailendra Kumar Prajapati Vs. State of U.P. & Anr.
1421

(8) जब उच्च न्यायालय भकसी न्यायालय
से भकसी मामले का अन्तरण अपने समक्ष भवचारण
करने के भलए उपधारा (1) के अधीन आदेर् देता है
तब वह ऐसे भवचारण में उसी प्रभक्रया का अनुपालन
करेगा भजस मामले का ऐसा अन्तरण न भकए जाने
की दर्ा में वह न्यायालय करता।

(9) इस धारा की कोई बात धारा 197
के अधीन सरकार के भकसी आदेर् पर प्रिाव डालने
वाली न समझी जाएगी।

408. मामि ों
औि
अपीि ों
क
अन्तरित कििे की सेशि न्यायाधीश की शम्बक्त-
(1) जब किी सेर्न न्यायाधीर् को यह प्रतीत
कराया जाता है भक न्याय के उद्देश्योूं के भलए यह
समीचीन है भक इस उपधारा के अधीन आदेर् भदया
जाए, तब वह आदेर् दे सकता है भक कोई भवभर्ष्ट
मामला उसके सेर्न खूंड में एक दूंड न्यायालय से
द सरे दूंड न्यायालय को अन्तररत कर भदया जाए।

(2) सेर्न न्यायाधीर् भनचले न्यायालय
की ररपोटश पर या भकसी भहतबद्ध पक्षकार के आवेदन
पर या स्वप्रेरणा पर कायशवाही कर सकता है।

(3) धारा 407 की उपधारा (4), (5),
(6), (7) और (9) के उपबूंध इस धारा की उपधारा
(1) के अधीन आदेर् के भलए सेर्न न्यायाधीर् को
आवेदन के सूंबूंध में वैसे ही लाग होूंगे जैसे वे धारा
407 की उपधारा (1) के अधीन आदेर् के भलए
उच्च न्यायालय को आवेदन के सूंबूंध में लाग होते हैं,
भसवाय इसके भक उस धारा की उपधारा (7) इस
प्रकार लाग होगी मानो उसमें आने वाले "एक हजार
रुपए" र्ब्ोूं के स्थान पर "दो सौ पचास रुपए"
र्ब् रख भदए गए हैं।"

9. उच्चतम न्यायालय ने कई भनणशयोूं में
स्थानान्तरण के कारणोूं की व्याख्या की है। न्याय न
केवल होना चाभहये परन्तु हुआ है ऐसा दभर्शत िी
होना चाभहये। अन्तरण की भवभध सुस्थाभपत है भक
अगर भकसी पक्षकार को यह यथोभचत आर्ूंका है भक
उसे न्याय की प्रान्धप् नहीूं हो पायेगी तो मामला या
अपील का अन्तरण कर देना चाभहए। इस नाते
पक्षकार को यह दर्ाशने की आवश्यकता नहीूं है भक
न्याय अभनवायश रुप से भवफल हो जायेगा, अगर वो
ऐसे पररन्धस्थभतयाूं भदखाने में सफल होता जाता है,
भजनसे यह अनुमान लगाया जा सकता है, भक उसको
आर्ूंका है, जो पररन्धस्थभतयोूं के मद्देनजर यथोभचत िी
है तो स्थान्तरण का मामला हो जायेगा। परन्तु मात्र
अभिकथन की भकसी मामले में न्याय न होने की
आर्ूंका है, स्थान्तरण का पयाशप् कारण नहीूं होगा
तथा न्याय के उद्देश्योूं के भलये समीचीन िी नहीूं
होगा। न्यायालय को यह भनधाशररत करना होगा भक
उक्त आर्ूंका यथोभचत है न भक काल्पभनक जो मात्र
अनुमान और अटकलोूं पर आधाररत है।

10. स्थान्तरण के आवेदन को भनस्ताररत
करने के कोई भनयभमत या सख्त भनयम भवभहत नहीूं
भकये जा सकते है तथा मामले की पररन्धस्थभतयोूं के
सूंदिश में ही आवेदन भनस्ताररत भकये जाने चाभहये।
पक्षकारोूं व साभक्षयोूं की सुभवधा का अथश अभनवायश
रुप से आवेदक की ही सुभवधा नहीूं है, जो न्यायालय
के समक्ष आर्ूंका की भमथ्य धारणा के आधार पर
आवेदन करता है। स्थान्तरण के सूंदिश में सुभवधा का
तात्पयश अभियोजन, अन्य अभियोगी, साभक्षयोूं व वृहत
रुप से समाज की सुभवधा से है। भनष्पक्ष सुनवाई का
आश्वासन, न्याय व्यवस्था की प्रथम अभनवायशता है।
आपराभधक भवचारण का उद्देश्य, ऐसा उभचत व
भनष्पक्ष न्याय प्रदान करना है, जो भकसी िी प्रकार के
वाह्य प्रभतफल से अप्रिाभवत हो।

11. प्रकरण में अगर यह भवभदत हो जाये भक
समाज का भवचारण के भनष्पक्षता पर भवश्वास गूंिीर
रुप से दुबशल हो गया है, पीभडत पक्ष स्थानान्तरण के
भलये आवेदन कर सकता है। अगर आपराभधक
भवचारण भनष्पक्ष व स्वतूंत्र नहीूं है और अगर वो
पक्षपात प णश हो तो आपराभधक न्याय व्यवस्था दााँव
पर लग जायेगी और जन सामान्य का व्यवस्था के
प्रभत भवश्वास अन्धस्थर हो जायेगा।

12. न्याय की भनष्पक्षता, सूंभवधान का म ल
ि त भवभर्ष्टता है, जो यह अपेक्षा करता है भक
न्यायधीर्, र्ासकीय अभियोजक, अपराधी का
अभधवक्ता या न्यायालय भमत्र का सामाभजक भहतोूं
में ताल मेल रखते हुए तथा अपराधी के हैभसयत व
र्ासन के प्रिाव से अप्रिाभवत होकर कायश
करेंगे।
1422 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES

(देखें : र्ुरुचिि दास चड्ढा प्रलत
िािस्थाि िाज्य ए आई आि : (1966) एस सी
1418, अमरिन्दि लसोंह प्रलत प्रकाश लसोंह बादि :
(2009) 6 एस सी सी 260, िािू प्रसाद यादव
प्रलत झाििण्ड िाज्य : (2013) 8 एस सी सी
593, िाहि लसोंह यादव प्रलत भाित सोंघ (2011)
1 एस सी सी 307 व उसमाि र्िी आदम भाई
व हिा प्रलत र्ुििात िाज्य व एक अन्य : (2016)
3 एस सी सी 370, िािकुमाि साबू प्रलत मे. साबू
िरेड प्राइवेि लिलमिेड : 2021 एस सी सी
ऑििाइि एस सी 378)

लवश्लेिण व लिष्किग

13. आवेदक की भनष्पक्ष व स्वतूंत्र न्याय न
भमलने की आर्ूंका का आधार भवचारण न्यायालय में
कायशरत एक कमशचारी है, जो कभथत रुप से पीभडता
के अभधवक्ता का भमत्र है और अपने पद का अनुभचत
उपयोग कर न्याभयक प्रभक्रया में पीभडता के अनुक ल
व आवेदक के प्रभतक ल आदेर् न्यायालय से पाररत
करवाने में सहायता करता है तथा इसी प्रिाव के
कारण न्यायालय ने अभियोजन साक्ष्य की प्रभतपररक्षा
का अवसर समाप् कर भदया था। परन्तु यह
आकाूंक्षा पत्रावली पर न्यायालय की आदेर् के
पररर्ीलन से भनराधार प्रतीत होती है, क्योूं भक
आवेदक को प्रभतपरीक्षा का आवेदन अपर न्यायालय
द्वारा 10.2.2021को स्वीकार भकया जा चुका है
तथा अभियोजन साक्ष्य सूंख्या 2 (वन्दना) को तलब
िी भकया जा चुका है। परन्तु आवेदक के हाभजर न
होने के कारण उसके भवरुद्ध गैर जमानतीय वारन्ट
भदनाूंक 05.03.2021 व 10.3.2021 को जारी
भकये गये जो प्राथशनापत्र के आधार पर आदेर् भदनाूंक
02.04.2021 द्वारा भनरस्त कर भदये गये। यहााँ यह
उल्लेख करना आवश्यक है भक उपरोक्त आदेर्
भवभधनुसार व उभचत प्रभक्रया के अूंतगशत भकये है।
भजनका भनदान िी प्रभक्रया के अूंतगशत भकया गया है।
इसी दौरान भर्कायतकताश ने एक प्राथशना पत्र धारा
319 िा.द.सूं., के अन्तगशत दान्धखल कर भदया तथा
पत्रावली वतशमान में उक्त प्राथशना पत्र के भनस्तारण के
स्तर पर है। अतः आवेदक का स्थान्तरण का आधार
यथोभचत आकाूंक्षा पर आधाररत नहीूं है। उपरोक्त
वभणशत आदेर् के कारण यह यथोभचत आकाूंक्षा नहीूं
हो जाती है भक आवेदक को भनष्पक्ष व उभचत न्याय
नहीूं प्राप् होगा और यह िी नहीूं प्रतीत होता है भक
आवेदक के प्रभतक ल पाररत आदेर् भकसी प वाशग्रह
या दबाव या अनुभचत प्रिाव के अूंतगशत पाररत भकये
गये हैं। अतः आवेदक इस न्यायालय के समक्ष, ऐसा
कोई यथोभचत कारण या ऐसी पररन्धस्थभतयाूं भजनके
कारण यथोभचत आकाूंक्षा हो भक भनष्पक्ष न्याय नहीूं
भमल पायेगा, प्रस्तुत करने में असमथश रखा है और न
ही कोई ऐसा कारण उपन्धस्थत है भक वतशमान प्रकरण
में स्थान्तरण की प्राथशना स्वीकार करना, न्याय के
उद्देश्य के भलये समीचीन होगा।

14. उपरोक्त भवभधक व तथ्यात्मक भवश्लेषण
का एक ही भनष्कषश है भक वतशमान प्रकरण में
आवेदक, स्थान्तरण के भलये उभचत या भनष्पक्ष न्याय
न भमलने का कोई यथोभचत या वास्तभवक आकाूंक्षा
स्थाभपत करने में असमथश रहा है। अतः वतशमान
आवेदन में की गई स्थान्तरण की प्राथशना बलहीन होने
के कारण अस्वीकार की जाती है तथा वतशमान
प्राथशना पत्र इस आदेर् के साथ अूंभतम रुप से
भनस्ताररत की जाती है भक सत्र न्यायालय प्रकरण की
सुनवाई र्ीघ्रता व भनयमनुसार करेगा तथा इस सूंदिश
में इस न्यायालय द्वारा पाररत आदेश लदिाोंक
07.06.2021, िलवन्द्र प्रताप शाही उर्ग पप्पू
शाही बिाम उत्ति प्रदेश िाज्य (आपिालधक
प्रकीणग
िमाित
प्राथगिा
पत्र
सोंख्या-
20591/2021) के मामले में 'त्वररत न्याय' के
भवश्लेषण को ध्यान में रखेगा।
----------

(2022)05ILR A1422
REVISIONAL JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 07.05.2022

BEFORE

THE HON'BLE NEERAJ TIWARI, J.

S.C.C. Revision No. 42 of 2022

Tara Prasad Sonkar & Anr. ...Revisionists
Versus
Smt. Binod Devi & Ors. ...Opposite Parties

Counsel for the Revisionists:
Sri Devid Kumar Singh, Sri Neeraj Rai, Sri
Prateek Rai, Sri Chandan Sharma