# Sompal v. State of U.P

- **Citation:** (2022) 7 ILRA 18
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2022-05-31
- **Case number:** Criminal Misc. First Bail Application No. 10884 of 2020
- **Bench:** Saurabh Shyam Shamshery
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/sompal-v-state-of-u-p-48876
- **Pages:** 6

## Headnote

A. Criminal Law - Code of Criminal
Procedure, 1973 - Section 439 - Indian
Penal Code, 1860-Sections 302, 304-B,
201, 498-A & 120-B - 3⁄4 DP Act, 1961deceased wife and her brother was
murdered while they went to Fair along
with applicant-husband but they did not
return
to
the
house
at
night-Next
morning, the dead body of wife and her
brother was recovered from two other
places and the husband was abscondedDeceased wife died within a period of 1
and half year after her marriage-Post
7 All. Sompal Vs. State of U.P.
19
mortem report reveals the cause of death
due to ante-mortem fire arm injury-chain
of
events
has
been
successfully
established
by
prosecution
and
the
applicant is actively participated along
with two accused who were traced out
during investigation.(Para 1 to 6)

The application is rejected. (E-6)

List of Cases cited:

## Text

18 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
parties and surprisingly some of them get
elected as well.

18. It is the responsibility of the
Parliament to show its collective will to
restrain the criminals from entering into the
politics, Parliament or legislature to save
democracy and the country governed on
democratic principles and rule of law.

19. There is responsibility of civil
society as well to rise above the parochial
and
narrow
considerations
of
caste,
community etc and to ensure that a
candidate with criminal background does
not get elected. Criminalization of politics
and corruption in public life have become
the biggest threats to idea of India, its
democratic polity and world's largest
democracy. There is an unholy alliance
between organized crime, the politicians
and the bureaucrats and this nexus between
them have become pervasive reality. This
phenomenon has eroded the credibility,
effectiveness, and impartiality of the law
enforcement agencies and administration.
This has resulted into lack of trust and
confidence in administration and justice
delivery system of the country as the
accused such as the present accusedapplicant win over the witnesses, influence
investigation and tamper with the evidence
by using their money, muscle and political
power. Alarming number of criminals
reaching Parliament and State Assembly is
a wake up call for all. Parliament and
Election Commission of India are required
to take effective measures to wean away
criminals from politics and break unholy
nexus between criminal politicians and
bureaucrats.

20.

This
unholy
nexus
and
unmindfulness of political establishment is
the result of reaching person like the
accused-applicant, a gangster, hardened
criminal and ''Bahubali' to the Parliament
and becoming a law maker. This Court,
looking at the heinousness of offence,
might of the accused, evidence available on
record, impact on society, possibility of
accused tampering with the evidence and
influencing/ winning over the witnesses by
using his muscle and money power does
not find that there is a ground to enlarge the
accused-applicant on bail at this stage. This
bail application is thus, rejected.
----------
(2022)07ILR A18
APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: ALLAHABAD 31.05.2022

BEFORE

THE HON'BLE SAURABH SHYAM
SHAMSHERY, J.

Criminal Misc. First Bail Application No. 10884 of
2020

Sompal ...Applicant
Versus
State of U.P. ...Opposite Party

Counsel for the Applicant:
Sri Mahipal Singh, Sri Jagdev Singh

Counsel for the Opposite Party:
Govt. Advocate

A. Criminal Law - Code of Criminal
Procedure, 1973 - Section 439 - Indian
Penal Code, 1860-Sections 302, 304-B,
201, 498-A & 120-B - 3⁄4 DP Act, 1961deceased wife and her brother was
murdered while they went to Fair along
with applicant-husband but they did not
return
to
the
house
at
night-Next
morning, the dead body of wife and her
brother was recovered from two other
places and the husband was abscondedDeceased wife died within a period of 1
and half year after her marriage-Post
7 All. Sompal Vs. State of U.P.
19
mortem report reveals the cause of death
due to ante-mortem fire arm injury-chain
of
events
has
been
successfully
established
by
prosecution
and
the
applicant is actively participated along
with two accused who were traced out
during investigation.(Para 1 to 6)

The application is rejected. (E-6)

List of Cases cited:

1. Ramesh Dasu Chauhan Vs St. of Mah. (2019)
7 SCC 476

2. St. of Raj. Jaipur Vs Balchand @ Balia (1977)
AIR 2447, 1978 SCR 1 535

3. Ram Govind Upadhyay Vs Sudarshan Singh
(2002) 3 SCC 598

4. Neeru Yadav Vs St. of U.P. (2016) 15 SCC
422

5. Gurcharan Singh Vs St.(Delhi Admin.) (1978)
1 SCC 118

6. St. of U.P. Vs Amarmani Tripathi (2005) 8 SCC
21

7. Manno Lal Jaiswal Vs St. of U.P. & ors. (2022)
SCC Online SC 89

8. Ashim Vs NIA (2022)1 SCC 695

9. Ishwarji Nagaji Mali Vs St. of Guj. & ors.
(2022) SCC Online SC 55

10. Prahlad Bhati Vs NCT of Delhi & ors. (2001)
4 SCC 280

11. Mahipal Vs Rajesh Kumar (2020) 2 SCC
118

12. Smt. Y Vs St. of Raj. & ors. (2022) SCC
Online SC 458

13. Manoj Kumar Khokhar Vs St. of Raj. & ors.
(2022) 3 NCC 501
(Delivered by Hon'ble Saurabh Shyam
Shamshery, J.)

1.1- विक्रम व िंह ( ूचनाकर्ाा एििं मृर्का ि
मृर्क के भाई) की विखिर् र्हरीर पर आिेदक/ज्ञार्
अवभयुक्त (मृर्का के पवर्/मृर्क के जीजा) के
विरुद्ध, धारा 302, भारर्ीय दण्ड िंवहर्ा (भा.दिं. िं.)
के अिंर्र्ार् अपराध काररर् होने की प्रथम ूचना
ररपोर्ा (0776 िर्ा 2019) वदनािंक 08.08.2019 को
11:46 बजे, थाना कोर्िािी शहर, वजिा वबजनौर में
अवभविखिर् की र्यी, जो िंविप्त रुप में वनम्नविखिर्
है:-

"मेरी बहन जयिर्ी उम्र करीब 22 िर्ा
की शादीिर्ा पहिे ोमपाि पुत्र रामौर्ार वनिा ी
धमरौिा थाना नूरपुर वबजनौर के ाथ हुई थी। मेरी
बहनोई ोमपाि ि उ के पररजन मेरी बहन का
देहज के विये र्िंर् ि परेशान रिर्े थे इ ी कारण
मेरी बहन करीब 10 वदन पहिे अपने मायके हमारे
घर आई थी। कि वदनािंक 7.8.2019 शाम के 7 बजे
िर्भर् मेरा बहनोई ोमपाि हमारे घर आया था
र्था जयिर्ी को र्ज मेिा वदिाने की बार् कहकर
मेिे में िे र्या र्िंज मेिे में मेरा छोर्ा भाई अरविन्द
जो हििाई राधे की दुकान पर काम करर्ा है। मेरा
बहनोई मेरी बहन जयिर्ी ि भाई अरविन्द को मेिे
घुमाने की बार् कहकर ाथ िे र्या था काफी देर
र्क इन िोर्ोिं के घर न आने पर हमने इनकी र्िाश
की र्ो प्रार्ः छः बजे िर्भर् मेरी बहन जयिर्ी का
रक्त रिंवजर् राय हररश्चन्द्र के र्न्ने के िेर् में पडा वमिा
र्था मेरे भाई अरविन्द उम्र करीब िर्भर् 21 िर्ा का
शि पर्राम के धान के िेर् में पडा वमिा है। मेरे भाई
अरविन्द ि मेरी बहन जयिर्ी की हत्या ोमपाि ने
अपने ावथयोिं के ाथ वमिकर कर दी है र्था
 ोमपाि फरार है दोनोिं शि मौके पर पडे है।
 ोमपाि द्वारा काररर् वकये र्ये इ दोहरो हत्या
कािंड े र्ािंि में भय का महोि है िोर्ोिं में काफी
आक्रोश है र्था र्ािंि के पा िेर् र्ज मेिे में अपरा
र्फरी का महोि पैदा हो र्या है िोर्ोिं ने रास्तो े
आना बन्द कर वदया है चारो र्रफ भय का महोि है।
 हाब ररपोर्ा वििाने आया हिं। मेरी ररपोर्ा वििकर
आिश्यक कायािाही करने की कृपा करे।"

1.2- जािंच के दौरान वमिे ाक्ष्य ि र्िाहोिं के
कथन के अनु ार, दो अन्य अवभयुक्त शाविम ि
कावमि की भी इ घर्ना में िंविप्तर्ा पाई र्ई, अर्ः
आिेदक ि अन्य दो अपरावधयोिं पर धारा 302, 304-
20 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
ि, 201, 498-क, 120-ि, भा.द. िं. ि 3⁄4 दहेज
वनर्ेध अवधवनयम, 1961 के अन्तर्ार् अपराध काररर्
करने में िंविप्तर्ा त्य पाई र्ई ि आरोप पत्र
दाखिि वकया र्या। आिेदक 17.08.2019 े
कारार्ार में है र्था अभी र्क विचारण पूणा नहीिं हुआ
है।

शव ववच्छेदन आख्या:

2.1- मृर्का जयिर्ी के शि विच्छेदन आख्या
के अनु ार, उनकी मृत्यु के कारण का अवभमर्,
मृत्यु पूिा आग्नेयास्त्र द्वारा काररर् चोर् की िजह े
वनश्चेर्ािस्था था(Comma due to ante mortem
fire arm injury) (मखस्तष्क के दाये भार् में धार्ुिर्
र्ोिी पाई र्ई) ि दाये ऑखिवपर्ि भार् में फर्ा
हुआ घाि पाया र्या र्था दायें ऑखिवपर्ो-पैराइर्ि
भार् में प्रिेश घाि ि आखिवपर्ि-पैराइर्ि हड्डी में
फ्रैक्चर पाया र्या।

2.2- मृर्क अरविन्द के मृत्यु के कारण का
अवभमर्, मृत्यु पूिा आग्नेयास्त्र द्वारा काररर् चोर् के
कारण वनश्चेर्ािस्था था। बायीिं आिंि की पिक के
पाशविक भार् पर प्रिेश घाि ि दायें ऑखिवपर्ि
भार् में वनका घाि पाया र्या।

आवेदक पक्ष:

3.1- आिेदक के विद्वान अवधिक्ता, श्री जर्देि
व िंह ने प्रबिपूिाक र्का प्रस्तुर् वकये वक, आिेदक
मृर्का का पवर् ि मृर्क का जीजा है, अर्ः इ ररश्ते
के नार्े उ के पा इ अपराध को काररर् करने का
कोई भी कारण या उद्देश्य नहीिं है। प्रथम ूचना र्थ्य
के िणान की भार्ा, एक आम आदमी की न होकर,
पुवि द्वारा की जाने िािी कायािाही के वक ी
जानकार व्यखक्त के द्वारा वििाई प्रर्ीर् होर्ी है।

3.2- आिेदक के विरुद्ध कवथर् रुप े मात्र एक ही
 ाक्ष्य है, वक घर्ना की रार् में 8 बजे अपने ाथ मृर्का ि
उ के भाई (मृर्क) को उनके पैर्ृक घर े र्ज मेिे में
घुमाने के विए र्या था। घर्ना का कोई चिुदशी ाक्ष्य
नहीिं है। आिेदक के विरुद्ध मात्र पररखस्थर्जन्य ाक्ष्य है,
वज की कव़ियािं आप में नहीिं वमि रही हैं र्था यह एक
कमजोर ाक्ष्य की श्रेणी में आर्ा है।

3.3- आिेदक के विद्वान अवधिक्ता ने अपने
कथन को और बि देने के विये उच्चर्म न्यायािय
द्वारा
रमेश
दासू
चौहान
प्रवि
महाराष्ट्र
सरकार:(2019) 7 एस.सी.सी. 476 के मामिे में
वदये र्ये वनणाय पर इ न्यायािय का ध्यान आकवर्ार्
करिाया वक वजन पररखस्थवर्योिं े अपराध काररर् होने
का अनुमान िर्ाया जाना है, उन्हे दृ़िर्ा और िंजीदर्ी
 े स्थावपर् वकया जाना चावहए र्था पररखस्थवर्योिं को
एक ाथ वमिाकर एक श्रृिंििा बननी चावहये, वज े
इ वनष्कर्ा र्क पहुुँचने में कोई पिायन न हो वक
अपराध भी मानिीय िंभािनाओिं के अन्तर्ार्, केिि
अपराधी ने ही काररर् वकया है, न की वक ी अन्य के
द्वारा काररर् वकया र्या हो।

3.4- मृर्का अपने पैर्ृक घर में कुछ वदनोिं पूिा
 े अपनी इच्छा े रह रही थी। उ का आिेदक े
कोई मनमुर्ाि नहीिं हुआ था। आिेदक घर्ना के वदन
अपनी ुराि नहीिं र्या था र्था उ पर मनऱ्ििंर्
आरोप िर्ाये र्ये हैं। उ को घर्ना के िंबिंध में कोई
भी जानकारी नहीिं है।

3.5- मृर्का ि मृर्क के शि, एक दू रे े
करीब 700 मीर्र की दूरी पर अिर्-अिर् िेर्ोिं में
वमिे थे, अर्ः यह िंभाविर् है वक दोनोिं के ाथ
अिर्-अिर् कोई हाद ा हुआ हो।

3.6- आिेदक के द्वारा कवथर् रुप े बर्ाने ि
वदिाने पर, एक देशी कट्टा की बरामदर्ी की
कायािाही अ त्य है र्था उक्त कायािाही का कोई
 ािाजवनक ाक्ष्य भी नहीिं है, अर्ः कवथर् बरामदर्ी,
आिेदक के विरुद्ध कोई ारिान ाक्ष्य नहीिं माना जा
 कर्ा है।

3.7- प्रथम ूचनाकर्ाा के धारा 161 दिं.प्र. िं.
के अन्तर्ार् विखिर् ब्यान में ि उ के द्वारा वदये र्ये
प्रथम ूचना र्थ्य में वभन्नर्ा है, वक आिेदक मृर्क ि
मृर्का को कवथर् रुप े अिर्-अिर् ि अिर्-
अिर् स्थान े मेिा घुमाने िे र्या था, जबवक प्रथम
 ूचना र्थ्य के अनु ार आिेदक दोनोिं को एक ाथ
उनके घर े मेिा घुमाने िे र्या था।

3.8- आिेदक एक म्मावनर् पररिार का
 दस्य है, वज को जमानर् वदये जाने की दशा में
7 All. Sompal Vs. State of U.P.
21
न्यावयक प्रवक्रया े भार् जाने की कोई उम्मीद नहीिं है
र्था िो िचन देर्ा है वक र्िाहोिं े न र्ो कोई
छेडछाड करेर्ा और न ही उन पर कोई दबाि
डािेर्ा। िो वदनािंक 17.08.2019 े जेि में है र्था
विचारण अब र्क पूणा नहीिं हुआ है। त्वररर् न्याय एक
 िंिैधावनक अवधकार है, अर्ः आिेदक जमानर् का
अवधकारी है।

अवियोजन पक्ष:

4.1- अवभयोजन/शा न का पि, श्री चन्दन
अग्रिाि, अवर्ररक्त शा कीय अवधिक्ता ने प्रबिर्ा
के ाथ प्रस्तुर् वकया वक, अन्वेर्ण के दौरान एकवत्रर्
 ाक्ष्योिं ि ावियोिं के कथन े यह प्रथम दृष्टिा पूणार्ः
विवदर् होर्ा है, वक आिेदक घर्ना के वदन अपनी
 ुराि आया और अपनी पत्नी (मृर्का) ि उ के
भाई (मृर्क) को पुरानी घर्नाओ को भुिाकर शाखन्त
पूिाक जीिन व्यर्ीर् करने की वदशा में, मेिे में रार्
को घुमाने िे र्या। मृर्क को हििाई की दुकान े ि
मृर्का को घर े िे र्या था और ुबह दोनोिं के शि
पृथक-पृथक जर्ह े बरामद हुए र्था आिेदक न र्ो
रार् में िाप आया और न ही इन दोनोिं के ाथ वकन
पररखस्थवर्योिं में घर्ना घवर्र् हुई के बारे में कुछ बर्ा
ही पाया। जहािं र्क प्रथम ूचना के र्थ्य में र्था धारा
161 दिं.प्र. िं. के अिंर्र्ार् अवभविखिर् कथन इ
विर्य पर वभन्नर्ा का प्रश्न है, िो विचारण के मय का
विर्य रहेर्ा र्था विवध का अवर् ामान्य वनयम है वक
प्रथम ूचना ररपोर्ा कोई ज्ञान कोर् नहीिं होर्ा है।

4.2- भारर्ीय ाक्ष्य अवधवनयम की धारा 106
के अनु ार "जब भी कोई र्थ्य विशेर्र्ः वक ी व्यखक्त
के ज्ञान में है, र्ब उ र्थ्य को ावबर् करने का भार
उ पर है"। अर्ः िर्ामान प्रकरण में आिेदक जो
अपनी पत्नी ि उ के भाई को, अपने ाथ घर्ना की
रार् में मेिा घुमाने िे र्या था और ुबह उन दोनोिं
का शि बरामद हुए, उ पर यह भार है वक िो बर्ाये
वक उ रार् उन दोनोिं के ाथ क्या और कै े घवर्र्
हुआ था, जो िो बर्ाने में अब र्क अ फि रहा है।

4.3- जािंच के दौरान वमिे ाक्ष्य ि र्िाहोिं के
विखिर् कथन े पररखस्थवर्योिं को एक ाथ वमिा
कर प्रथम दृष्टया एक श्रृिंििा बन रही है वक आिेदक
अपनी पत्नी (मृर्का) के प्रवर् न केिि क्रूरर्ा काररर्
करर्ा था, बखि दहेज की मािंर् भी करर्ा था। घर्ना
के वदन िो अपनी ुराि र्या ि अच्छे आप ी
 म्बन्ध बनाने का झािं ा देकर दोनोिं को रार् में मेिे
घुमाने के बहाने ाथ िे र्या ि ुबह उनके शि
वमिे। आिेदक न र्ो िाप आया और न ही कोई
 ूचना दी। अर्ः दहेज मृत्यु का अपराध काररर् वकया
र्था अपनी पत्नी ि उ के भाई की हत्या अपने दो
 ावथयोिं के ाथ वमिकर काररर् कर हत्या का
अपराध भी काररर् वकया। यह श्रृिंििा आिेदक ि
अन्य दो अवभयुक्तोिं की प्रत्यि रुप े अपराध में
 िंविप्तर्ा दशाार्ी है न की वक ी और की।

4.4- आिेदक द्वारा अपने दो ावथयोिं के ाथ
वमिकर अपनी पत्नी ि उ के भाई की हत्या कर ि
उनके शिोिं को वछपाकर अपराध के ाक्ष्य को
वििोपन का अपराध भी काररर् वकया है। अर्ः
िर्ामान जमानर् का आिेदन वनरस्त वकया जाये।

जमानि की वववि:

5.(क) ारर्वभार् धारणा े िंभिर्: मूि
वनयम, जमानर् है न की कारार्ार (देिें : राजस्थान
राज्य, जयपुर बनाम बलचंद @ बवलया: (1977
एआईआर 2447, 1978 एससीआर (1) 535)।
भा.दिं. िं की धारा 439 के र्हर् जमानर् देने की
शखक्त के व्यापक आयाम है र्था न्यायािय को
अ ीवमर् र्ो नही परन्तु पयााप्त वििेकावधकार प्रदान
वकये र्ये है, वज का उपयोर् न र्ो ामान्य रुप े
और न ही मनमाने रुप े, परन्तु न्याय िंर्र् रुप े
करने के विए प्रस्ताविर् वकया र्या है । (देिें: राम
गोववंद उपाध्याय बनाम सुदशशन वसंह: (2002) 3
एससीसी 598 और नीरू यादव बनाम उत्तर
प्रदेश शासन (2016)15 एससीसी 422)।

(ि) जमानर् देने के विये विचारात्मक कारक
है, अपराध होने की पररखस्थवर्योिं की प्रकृवर् और
र्िंभीरर्ा; पीवडर् और र्िाहोिं के िंदभा में आरोपी की
खस्थवर् और हैव यर्; आरोपी के न्याय प्रवक्रया े
भार्ने की िंभािना; अपराध दोहराने की िंभािना;
मामिे में िंभाविर् जा की कठोर िंभािना के ाथ
अपने स्वयिं के जीिन को िर्रे में डािना; र्िाहोिं के
 ाथ छेडछाड; मामिे का इवर्हा और ाथ ही
इ की जािंच और अन्य प्रा िंवर्क आधार, जो अन्य
22 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
महत्वपूणा कारकोिं पर ध्यान करर्े हुए, व्यापक रूप
 े वनधााररर् नहीिं वकये जा कर्े है।(देिें : गुरचरण
वसंह बनाम राज्य (वदल्ली प्रशासन), (1978) 1
एससीसी 118)

(र्) प्रा िंवर्क कारक कौन े हो कर्े हैं,
इ का कोई वनधााररर् वनयम (स्ट्रेर् जैकेर् फॉमूािा)
कभी भी वनयर् नहीिं वकया जा कर्ा है, हािािंवक,
कुछ महत्वपूणा कारक वजन्हें अन्य कारकोिं के ाथ
हमेशा विचारणीय माना जार्ा है, िो हैं , प्रथम दृष्टया
अवभयुक्त की िंविप्तर्ा, प्रकृवर् और आरोप की
र्िंभीरर्ा, जा की र्िंभीरर्ा, आरोपी का चररत्र,
खस्थवर् और उ की अिखस्थवर् े िंबिंवधर् है।(देखें:
उत्तर प्रदेश शासन प्रवि अमरमवण विपाठी,
(2005) 8 एससीसी 21)

(घ) मन्नो लाल जायसवाल बनाम उत्तर प्रदेश
शासन और अन्य: 2022 एससीसी ऑनलाइन
एससी 89 में उच्चर्म न्यायािय ने कहा है वक, जब
अवभयुक्तोिं को भारर्ीय दिंड िंवहर्ा की धारा 149 के
र्हर् दिंडनीय अपराधोिं के विए आरोवपर् वकया र्या
है और जब उनकी उपखस्थवर् स्थावपर् हो जार्ी है
और यह कहा र्या हो वक िो विवध विरुद्ध जमाि के
 दस्य थे, र्ो उनकी व्यखक्तर्र् भूवमका और/या
व्यखक्तर्र् आरोपी द्वारा वकया र्या अत्युखक्त
महत्वपूणा और/या प्रा िंवर्क नहीिं होर्ी है।

(ङ) आवशम बनाम राष्ट्रीय जांच एजेंसी :
(2022) 1 एससीसी 695 में, उच्चर्म न्यायािय ने
कहा है वक एक बार जब यह स्पष्ट हो जाये वक
 मयोवचर् विचारण िंभि नहीिं हो पायेर्ा और
आरोपी कारार्ार में एक दीघा अिवध व्यर्ीर् कर
चुका है, र्ो न्यायािय आम र्ौर पर उ े जमानर् पर
छोडने के विए बाध्य हो जार्े है।

(च) आरोपी को जमानर् पर ररहा करने का
आधार मात्र इ विए वक अवभयोजन का मामिा,
पररखस्थवर्जन्य ाक्ष्य पर आधाररर् है, नहीिं हो कर्ा
है, अर्र जािंच के दौरान ाक्ष्य/र्थ्य एकत्र वकये र्ये
हो और प्रथम दृष्टया घर्नाओिं की पूरी श्रृिंििा स्थावपर्
हो र्ई है। (देिें : ईश्वरजी नागाजी माली बनाम
गुजराि राज्य और अन्य 2022 एससीसी
ऑनलाइन एससी 55)

(छ) यह भी ध्यान में रिा जाना चावहए वक
जमानर् देने के विए विधावयका ने " ाक्ष्य" के स्थान
पर "विश्वा करने के विए उवचर् आधार" शब्ोिं का
प्रयोर् वकया है, वज का अथा है वक जमानर् देने े
 िंबिंवधर् न्यायािय केिि इर्नी िंर्ुवष्ट कर कर्ा है
वक क्या आरोपी के खििाफ कोई िास्तविक मामिा
है और अवभयोजन पि आरोप के मथान में प्रथम
दृष्टया ाक्ष्य पेश करने में िम होर्ा। (देिें :
प्रहलाद वसंह िाटी बनाम एनसीटी आफ वदल्ली
और अन्य:(2001) 4 एससीसी 280)।

(ज) मुक्त न्याय का एक मौविक आधार है,
वज के विए हमारी न्यावयक प्रणािी प्रवर्बद्ध है, वक
िो कारक जो न्यायाधीश के मान में ज़मानर् को
अस्वीकृर् या स्वीकृर् करने के विए मूल्ािंवकर् वकये
र्ये, िो पाररर् आदेश में उल्लेखिर् वकये जायें। मुक्त
न्याय इ धारणा पर आधाररर् है वक न्याय न केिि
वकया जाना चावहए, बखि स्पष्ट और वनस्सिंदेह रूप
 े होर्ा हुआ वदिना भी चावहए। न्याय िंर्र् वनणाय
देने का न्यायाधीशोिं का कर्ाव्य इ प्रवर्बद्धर्ा का
हृदय है। (देिें: मवहपाल बनाम राजेश कुमार,:
(2020) 2 एससीसी 118 और सुश्री वाई बनाम
राजस्थान राज्य और अन्य :2022 एससीसी ऑन
लाइन एस सी 458)

(झ) जमानर् के आिेदन पर आदेश पाररर्
करर्े मय विस्तृर् वििरण का उल्लेि, इ धारणा
के नार्े नहीिं वकया जा कर्ा है, वक मामिा ऐ ा है
वज के पररणामस्वरूप दोर्व खद्ध हो कर्ी है या
इ के विपरीर्, दोर्मुखक्त हो कर्ी है। हािािंवक,
जमानर् के आिेदन पर वनणाय िेने िािा न्यायािय
मामिे के भौवर्क पहिुओिं े अपने वनणाय को पूरी
र्रह े अिर् नहीिं कर कर्ा, जै े आरोपी के
खििाफ िर्ाए र्ए आरोप ; अर्र आरोप यथोवचर्
 िंदेह
 े
परे
 ावबर्
होर्े
हैं
और
इ के
पररणामस्वरूप दोर्व खद्ध होर्ी है र्ो जा की
र्िंभीरर्ा; अवभयुक्त द्वारा र्िाहोिं को प्रभाविर् करने
की उवचर् आशिंका; ाक्ष्योिं े छेडछाड; अवभयोजन
के मामिे में वनराधारर्ा; आरोपी का आपरावधक
पूिािृत्त; और आरोपी के विरुद्ध आरोप के मथान में
न्यायािय की प्रथम दृष्टया िंर्ुवष्ट। (देिेः मनोज
कुमार खोखर बनाम राजस्थान राज्य और अन्य
(2022)3
एनसीसी
501)।
7 All. Smt. Ramo Devi & Ors. Vs. ICICI General Insurance & Ors.
23

ववश्लेषण व वनष्कषश:

6.1- पिोिं के विद्वान अवधिक्ताओिं के कथन को
उपरोक्त िवणार् जमानर् की विवध के पररपेि में ुना
ि पत्राििी का म्यक पररशीिन वकया।

6.2- आिेदक मृर्का का पवर् ि मृर्क का
जीजा है। िर्ामान प्रकरण में मृर्का की आिेदक के
 ाथ शादी के मात्रिर्ा के भीर्र शारीररक िवर् द्वारा
मृत्यु काररर् हुई है और ाथ ही ाथ मृर्का के भाई
की भी हत्या हुई है।

6.3- प्रथम ूचना ररपोर्ा के र्थ्य ि जाुँच के
दौरान ाक्ष्योिं ि र्िाहोिं के कथनोिं में यह प्रथम दृष्टया
स्पष्ट रुप े विवदर् होर्ा है वक आिेदक घर्ना के
वदन रार् में अपनी पत्नी ि उ के भाई को मेिा घुमाने
िे र्या था। रार् में कोई भी िाप नहीिं आया र्था
 ुबह मृर्का ि मृर्क का शि अिर्-अिर् स्थान े
बरामद हुए र्था आिेदक फरार रहा। भारर्ीय ाक्ष्य
अवधवनयम की धारा 106 के अन्तर्ार् आिेदक पर
भार है वक िो बर्ाये वक मेिे में ाथ िे जाने के बाद
ि उनके शि वमिने र्क उन दोनोिं के ाथ, कै े क्या
घवर्र् हुआ। यह भी विवदर् रहे वक यह भार आिेदक
पर र्ब आयेर्ा जब अवभयोजन पररखस्थयोिं की श्रृिंििा
पूणा करने में कामयाब हो पायेर्ा और अर्र िो ऐ े
र्थ्य ावबर् करने में अ फि रहर्ा र्ो अपराध व द्ध
होने की िंभािना प्रबि हो जार्ी है। (देिें विर्री
 ामान्तरे प्रवर् उडी ा राज्य:2022 ए . ी. ी. ऑन
िाइन ए . ी. 673)

6.4- पत्राििी पर उपखस्थर् जािंच के दौरान
र्िाहान के ब्यान, शि विच्छेदन ररपोर्ा ि
अवधिक्ताओिं के कथन े प्रथम दृष्टया ि केिि
जमानर् के आिेदन पर विचार करने के उद्देश्य े
यह प्रर्ीर् होर्ा है वक आिेदक पूिा में अपनी पत्नी के
 ाथ दहेज की मािंर् के विये उ के ाथ क्रूरर्ा करर्ा
था। घर्ना के कुछ वदन पूिा े मृर्का अपने पैर्ृक
वनिा पर रह रही थी र्था घर्ना के वदन आिेदक
िहािं जार्ा है ि अपनी पत्नी ि उ के भाई को अपने
 ाथ मेिे घुमाने िे जार्ा है, यह र्थ्य स्वर्िंत्र र्िाहोिं
के ब्यान में भी उल्लेखिर् है र्था न र्ो आिेदक न ही
उ की पत्नी ि उ का भाई रार् में िाप आर्े हैं।
 ुबह दोनोिं के शि एक दू रे े कुछ दूरी पर बरामद
होर्े है र्था दोनोिं के शि पर मृत्यु पूिा आग्नेयास्त्र
काररर् चोर् पाई जार्ी है और एक देशी कट्टा
आिेदक के वदिाने पर बरामद भी होर्ा है।

6.5- उपरोक्त पररखस्थवर्योिं की कडी जोडी
जाये र्ो प्रथम दृष्टया एक श्रृिंििा बन जार्ी है र्था
जाुँच के दौरान आिेदक के दो ावथयोिं का नाम भी
उजार्र होर्ा है वजनकी भी अपराध में िंविप्तर्ा पाई
जार्ी है। प्रथम दृष्टया पररखस्थयोिं की श्रृिंििा का एक
ही वनष्कर्ा है वक आिेदक इ जघन्य अपराध में
 वक्रय रुप े विप्त रहा।

6.6- अर्ः उपरोक्त िवणार् जमानर् की विवध
को ध्यान में रिर्े हुए र्था महत्वपूणा कारक जै े
प्रथम दृष्टया अवभयुक्त (आिेदक) की अपराध में
 िंविप्तर्ा, आरोप की र्िंभीरर्ा, मामिे में िंभाविर्
 जा की िंभािना ि कठोरर्ा ि र्िाहोिं े छेडछाड
की िंभािना को भी ध्यान में रिर्े हुए, यह न्यायािय
इ वनष्कर्ा पर पहुुँचर्ा है वक आिेदक को जमानर्
नहीिं दी जा कर्ी है।

6.7- अर्ः जमानर् का आिेदन बिहीन होने
के कारण वनरस्त वकया जार्ा है।
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(2022)07ILR A23
APPELLATE JURISDICTION
CIVIL SIDE
DATED: ALLAHABAD 30.05.2022

BEFORE

THE HON'BLE DR. KAUSHAL JAYENDRA
THAKER, J.
THE HON'BLE AJAI TYAGI, J.

First Appeal From Order No. 3406 of 2014

Smt. Ramo Devi & Ors. ...Appellants
Versus
ICICI General Insurance & Ors.
 ...Respondents

Counsel for the Appellants:
Sri Sanjay Kumar Singh

Counsel for the Respondents:
Sri Rahul Sahai, Sri Vishwambhar Nath