# Swami Prasad Maurya v. State of U.P. & Anr. Opp. Parties

- **Citation:** (2023) 11 ILRA 326
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2023-10-31
- **Case number:** Application u/s 482 No. 10623 of 2023
- **Bench:** Subhash Vidyarthi
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/swami-prasad-maurya-v-state-of-u-p-anr-opp-parties-49453
- **Pages:** 9

## Headnote

G.A.
11 All. Swami Prasad Maurya Vs. State of U.P. & Anr.
327
(अ) फौजदारी कानून - भारतीय दंड प्रक्रिया संक्रिता ,1973 - धारा
482 - अंतक्रनिक्रित शक्रियां , भारतीय दंड संक्रिता, 1860 - धारा
153 - बल्वा कराने के आशय से स्वैररता से प्रकोपन देना - यक्रद बल्वा
क्रकया जाए- यक्रद बल्वा न क्रकया जाए, धारा 295 - क्रकसी वर्ि के धर्ि का
अपर्ान करने के आशय से उपासना के स्थान को क्षक्रत करना या अपक्रवत्र
करना, धारा 298 - धाक्रर्िक भावनाओं को ठेस पि ुँचाने के क्रवर्क्रशित
आशय से शब्द उच्चाररत करना आक्रद, धारा 505 - लोक ररक्रि-कारक
विव्य - न्याक्रयक क्रनर्िय क्रवक्रध को क्रवधाक्रयका द्वारा बनाए र्ए संक्रवक्रधयों के
अनुसार निीं पढा जाना चाक्रिए, अक्रपतु उन्िें उन तथ्यों के प्रकाश र्ें िी पढा
जाना चाक्रिए, क्रजनके पररप्रेक्ष्य र्ें वि क्रनर्िय क्रदया र्या िै - संक्रिता की धारा
482 के अंतर्ित शक्रि का प्रयोर् अपवाद िै न क्रक क्रनयर् - क्रकसी भी
ग्रंथ/अक्रभलेख र्ें क्रकए र्ए कथन सिी पररप्रेक्ष्य र्ें िी पढे तथा रखे जाने
चाक्रिए तथा किीं से भी कोई एक अंश क्रबना सम्पूर्ि संर्त तथ्यों के रखना
सम्पूर्ि सत्य कथन निीं िै तथा कुछ पररक्रस्थक्रतयों र्ें ऐसा कथन असत्य
कथन भी िो सकता िै - जब श्री रार् चररत र्ानस की कोई चौपाई
उद्धररत की जाए तो यि अक्रनवायि िै क्रक यि भी ध्यान र्ें रखा जाए क्रक उसर्ें
किा कथन क्रकस पात्र ने कैसी पररक्रस्थक्रत र्ें क्रकस व्यक्रि से किा। (पैरा -
14,20,24)

(ब) भारतीय दंड प्रक्रिया संक्रिता ,1973 - धारा 196 (1-क)(क) -
कोई न्यायालय भा०दं०सं०, 1860 की धारा 153(ख) या धारा 505
की उप-धारा (2) या उप-धारा (3) के अधीन दण्डनीय क्रकसी अपराध का
संज्ञान केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार या क्रजला र्क्रजस्रेट की पूवि स्वकृक्रत से
िी लेर्ा अन्यथा निीं - अक्रभक्रनधािररत - प्राथी के क्रवरुद्ध कक्रथत अपराध
धारा 505 की उप-धारा(1) के अधीन आते िैं तथा उि अपराध के क्रलए
धारा 196 र्ें अक्रभयोजन स्वीकृक्रत लेने की आवश्यकता निीं िै। (पैरा -
35)

प्राथी द्वारा श्री रार् र्ानस पर क्रदए र्ए बयान - पूरे भारत र्ें कुछ अन्य
नेतार्र् ने एक राय िोकर श्री रार् चररत र्ानस की प्रक्रतयां जलाई - सर्स्त
ब्राह्मर् संर्ठनों व क्रिन्दू सर्ाज के प्रक्रत र्ंदी-र्ंदी र्ाक्रलयां दीं - अपर्ान
जनक शब्दों का प्रयोर् क्रकया - सर्स्त र्ानस प्रेक्रर्यों के प्रक्रत अभद्रता की -
जन र्ानस र्ें काफी आिोश एवं अशांक्रत का वातावरर् उत्पन्न िो र्या -
क्रिन्दू धर्ि के क्रवक्रभन्न वर्ों र्ें शत्रुता एवं वैर्नस्य का भाव पैदा िो र्या।
(पैरा - 31)

अक्रभक्रनधािररत:- स्वतंत्र सर्ीक्षा अथवा स्वस्थ आलोचना का तात्पयि यि
निीं िै क्रक ऐसे शब्दों का प्रयोर् क्रकया जाए क्रजससे लोर् अपराध काररत
करने को प्रेररत िोने लर्ें। आवेदक के कायों से लोर्ों र्ें क्रवद्रोि ि आ, पक्रवत्र
ग्रंथ श्री रार्चररतर्ानस को नुकसान पि ुँचाया र्या और उसका अपर्ान
क्रकया र्या। इसे उनके धर्ि का अपर्ान र्ाना र्या। आवेदक के बयान एक
वर्ि को दूसरे वर्ि के क्रखलाफ अपराध करने के क्रलए उकसाने के इरादे से क्रदए
र्ए प्रतीत िोते िैं, इस प्रकार, आवेदक ने धारा 153, 295, 298 और
505 (1) (सी) आईपीसी के तित अपराध क्रकया िै। प्राथी
कक्रथत
आरोपों के क्रलए दोषी िै या निीं, यि इस न्यायालय को इस स्तर पर निीं
देखना िै और यि क्रवचारर् के दौरान साक्ष्य लेकर क्रवचारर् न्यायालय तय
करेर्ा। (पैरा - 28, 32, 33)

प्राथिना पत्र क्रनरस्त क्रकया जाता िै। (E-7)

उद्धृत मामलों की सूची:-

## Text

326 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
reference to Sections 17 and 31 of the
Indian Evidence Act, 1872 can be made.
The same are reproduced below:-

"17. Admission defined.-An
admission
is
a
statement,
[oral
or
documentary or contained in electronic
form], which suggests any inference as to
any fact in issue or relevant fact, and which
is made by any of the persons, and under
the circumstances, hereinafter mentioned."

31. Admissions not conclusive
proof, but may estop.- Admissions are not
conclusive proof of the matters admitted,
but they may operate as estoppels under the
provisions hereinafter contained.

13. In view of Section 17 of the Act,
1872, the statement/admission contained in
the written statement filed by U.P.S.R.T.C.
before
M.A.C.T.
would
suggest
an
inference as to "NO NEGLIGENCE" of the
petitioner which was a fact in issue or a
relevant
fact
during
the
course
of
proceedings before the M.A.C.T., and,
though, the said admission may not be
treated to be a conclusive proof, it would
certainly operate as estoppel against
U.P.S.R.T.C.,
the
employer
in
the
departmental
proceedings
judging
allegation/charge of misconduct against the
petitioner. Hence, the U.P.S.R.T.C. is bound
by its admission contained in the written
statement that the driver (petitioner) was
not negligent in driving the bus and, as
such, it cannot use the finding of the
Tribunal alone to hold the petitioner as
guilty of misconduct. In the opinion of the
Court, more strict proof of negligence was
required
to
be
established
by
the
U.P.S.R.T.C. to hold the petitioner as guilty
in departmental proceedings, if, at all, it
was serious to award major or minor
penalty. No such exercise was carried,
rather departmental inquiry report too reads
in favour of the petitioner. In overall
circumstances, if, at all, weight to any
judgment can otherwise be attached, this
Court would give more significance to the
judgment of acquittal of the petitioner in
comparison to the award interpreting his
statement
recorded
before
M.A.C.T.,
particularly when, U.P.S.R.T.C. did not
assail the award but accepted the same as
per its own wisdom and choice. There
being no other material before the Court, I
find that the orders impugned cannot
sustain.

14. The writ petition succeeds and is
allowed. The orders impugned dated
31.05.2007 and 03.05.2008 are hereby
quashed.

15. Since the amount directed to be
deducted under the punishment order has
already been deducted, the respondents are
directed to refund the same to the petitioner
within a period two months from today,
alongwith simple interest @ 6% p.a. from
the date of deduction till the date of
payment.
----------
(2023) 11 ILRA 326
ORIGINAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: LUCKNOW 31.10.2023

BEFORE

THE HON'BLE SUBHASH VIDYARTHI, J.

Application u/s 482 No. 10623 of 2023

Swami Prasad Maurya ...Applicant
Versus
State of U.P. & Anr. ...Opp. Parties

Counsel for the Applicant:
Saurabh Yadava, Divya
Counsel for the Opp. Parties:
G.A.
11 All. Swami Prasad Maurya Vs. State of U.P. & Anr.
327
(अ) फौजदारी कानून - भारतीय दंड प्रक्रिया संक्रिता ,1973 - धारा
482 - अंतक्रनिक्रित शक्रियां , भारतीय दंड संक्रिता, 1860 - धारा
153 - बल्वा कराने के आशय से स्वैररता से प्रकोपन देना - यक्रद बल्वा
क्रकया जाए- यक्रद बल्वा न क्रकया जाए, धारा 295 - क्रकसी वर्ि के धर्ि का
अपर्ान करने के आशय से उपासना के स्थान को क्षक्रत करना या अपक्रवत्र
करना, धारा 298 - धाक्रर्िक भावनाओं को ठेस पि ुँचाने के क्रवर्क्रशित
आशय से शब्द उच्चाररत करना आक्रद, धारा 505 - लोक ररक्रि-कारक
विव्य - न्याक्रयक क्रनर्िय क्रवक्रध को क्रवधाक्रयका द्वारा बनाए र्ए संक्रवक्रधयों के
अनुसार निीं पढा जाना चाक्रिए, अक्रपतु उन्िें उन तथ्यों के प्रकाश र्ें िी पढा
जाना चाक्रिए, क्रजनके पररप्रेक्ष्य र्ें वि क्रनर्िय क्रदया र्या िै - संक्रिता की धारा
482 के अंतर्ित शक्रि का प्रयोर् अपवाद िै न क्रक क्रनयर् - क्रकसी भी
ग्रंथ/अक्रभलेख र्ें क्रकए र्ए कथन सिी पररप्रेक्ष्य र्ें िी पढे तथा रखे जाने
चाक्रिए तथा किीं से भी कोई एक अंश क्रबना सम्पूर्ि संर्त तथ्यों के रखना
सम्पूर्ि सत्य कथन निीं िै तथा कुछ पररक्रस्थक्रतयों र्ें ऐसा कथन असत्य
कथन भी िो सकता िै - जब श्री रार् चररत र्ानस की कोई चौपाई
उद्धररत की जाए तो यि अक्रनवायि िै क्रक यि भी ध्यान र्ें रखा जाए क्रक उसर्ें
किा कथन क्रकस पात्र ने कैसी पररक्रस्थक्रत र्ें क्रकस व्यक्रि से किा। (पैरा -
14,20,24)

(ब) भारतीय दंड प्रक्रिया संक्रिता ,1973 - धारा 196 (1-क)(क) -
कोई न्यायालय भा०दं०सं०, 1860 की धारा 153(ख) या धारा 505
की उप-धारा (2) या उप-धारा (3) के अधीन दण्डनीय क्रकसी अपराध का
संज्ञान केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार या क्रजला र्क्रजस्रेट की पूवि स्वकृक्रत से
िी लेर्ा अन्यथा निीं - अक्रभक्रनधािररत - प्राथी के क्रवरुद्ध कक्रथत अपराध
धारा 505 की उप-धारा(1) के अधीन आते िैं तथा उि अपराध के क्रलए
धारा 196 र्ें अक्रभयोजन स्वीकृक्रत लेने की आवश्यकता निीं िै। (पैरा -
35)

प्राथी द्वारा श्री रार् र्ानस पर क्रदए र्ए बयान - पूरे भारत र्ें कुछ अन्य
नेतार्र् ने एक राय िोकर श्री रार् चररत र्ानस की प्रक्रतयां जलाई - सर्स्त
ब्राह्मर् संर्ठनों व क्रिन्दू सर्ाज के प्रक्रत र्ंदी-र्ंदी र्ाक्रलयां दीं - अपर्ान
जनक शब्दों का प्रयोर् क्रकया - सर्स्त र्ानस प्रेक्रर्यों के प्रक्रत अभद्रता की -
जन र्ानस र्ें काफी आिोश एवं अशांक्रत का वातावरर् उत्पन्न िो र्या -
क्रिन्दू धर्ि के क्रवक्रभन्न वर्ों र्ें शत्रुता एवं वैर्नस्य का भाव पैदा िो र्या।
(पैरा - 31)

अक्रभक्रनधािररत:- स्वतंत्र सर्ीक्षा अथवा स्वस्थ आलोचना का तात्पयि यि
निीं िै क्रक ऐसे शब्दों का प्रयोर् क्रकया जाए क्रजससे लोर् अपराध काररत
करने को प्रेररत िोने लर्ें। आवेदक के कायों से लोर्ों र्ें क्रवद्रोि ि आ, पक्रवत्र
ग्रंथ श्री रार्चररतर्ानस को नुकसान पि ुँचाया र्या और उसका अपर्ान
क्रकया र्या। इसे उनके धर्ि का अपर्ान र्ाना र्या। आवेदक के बयान एक
वर्ि को दूसरे वर्ि के क्रखलाफ अपराध करने के क्रलए उकसाने के इरादे से क्रदए
र्ए प्रतीत िोते िैं, इस प्रकार, आवेदक ने धारा 153, 295, 298 और
505 (1) (सी) आईपीसी के तित अपराध क्रकया िै। प्राथी
कक्रथत
आरोपों के क्रलए दोषी िै या निीं, यि इस न्यायालय को इस स्तर पर निीं
देखना िै और यि क्रवचारर् के दौरान साक्ष्य लेकर क्रवचारर् न्यायालय तय
करेर्ा। (पैरा - 28, 32, 33)

प्राथिना पत्र क्रनरस्त क्रकया जाता िै। (E-7)

उद्धृत मामलों की सूची:-

1. पी. ए. रंजीत बनार् पुक्रलस क्रनरीक्षक, क्रतरुपनथल पुक्रलस स्टेशन और
अन्य, सीआरएल. ओ.पी. (एर्डी) नंबर 8893/2019 और
सीआरएल एर्पी (एर्डी) नंबर 5643/2019 र्ें र्द्रास उच्च
न्यायालय (र्दुरै बेंच)

2. उत्तर प्रदेश राज्य बनार् ललई क्रसंि यादव, (1976) 4 SCC
213

3. एस. वीराबद्रन चेरियार बनार् ई.वी. रार्ास्वार्ी नायकर, ए.आई.आर
1958 एस सी 1032

4. चि बेिरा बनार् बालकृष्र् र्िापात्र, एआईआर 1963 उडीसा 23

5. कर्ािटक राज्य बनार् एर् देवेन्द्रप्पा, (2002) 3 एससीसी 892

6. केंद्रीय जांच ब्यूरो बनार् आयिन क्रसंि आक्रद, 2023 एससीसी
ऑनलाइन एससी 379

7. बृंदा करात बनार् राज्य (एनसीटी क्रदल्ली), 2022 एससीसी
ऑनलाइन क्रदल्ली 1775 पृष्ठ 162

(Delivered by Hon'ble Subhash Vidyarthi,
J.)

1. प्राथी के नवद्वाि अनिवक्तागर् श्री जहाज नसंह
कश्यप, श्री सौरभ यािव िथा श्री आिोक रंजि एवं नवपक्षी-
उत्तर प्रिेश राज्य की िरि से नवद्वाि अनिररक्त महानिवक्ता श्री
नविोि कुमार शाही, नवद्वाि शासकीय अनिवक्ता डा० नवजय
कुमार नसंह िथा नवद्वाि अनिररक्त शासकीय अनिवक्ता प्रथम श्री
अिुराग वमाद को सुिा िथा पत्राविी का अविोकि नकया।

2. िारा 482 िण्ड प्रनिया संनहिा के अन्िगदि प्रस्िुि
इस प्राथदिा पत्र द्वारा प्राथी िे मु०अ०सं०80 सि् 2023
अन्िगदि िारा 153, 295 , 298 िथा 505 भारिीय िण्ड
संनहिा,थािा कोिवािी िगर, जिपि प्रिापगढ़ के संिभद में
328 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
प्रस्िुि आरोप पत्र संख्या-237 नििांक 05.04.2023, उक्त के
सन्िभद में नवद्वाि मुख्य न्यानयक मनजस्ट्रेट/नवशेर् न्यायािीश
एम.पी/एम.एि.ए प्रिापगढ़ द्वारा मुकिमा संख्या-11811 सि्
2023 में पाररि आिेश नििांक 12.07.2023, नजसके द्वारा
उपरोक्त अपराि का संज्ञाि निया गया िथा प्राथी िथा सहअनभयुक्त राकेश कुमार वमाद को नवचारर् हेिु ििब नकया
गया, िथा उपरोक्त आपरानिक वाि की सम्पूर्द कायदवाही को
निरस्ि नकए जािे की प्राथदिा की है।

3. नििांक 31.01.2023 को प्राथी - जो एक
राजिीनिक िि का िेिा है, डा० आर.के वमाद- नविायक
रािीगंज िथा कुछ अन्य िेिागर् के नवरुद्ध निखाई गई प्रथम
सूचिा ररपोटद में कहा गया है नक अनभयुक्तगर् द्वारा एक राय
होकर श्री राम चररि मािस की प्रनियां जिाई गई व समस्ि
ब्राह्मर् संगठिों व नहन्िू समाज के प्रनि गंिी-गंिी गानियां िी
िथा अपमािजिक शब्िों का प्रयोग करके समस्ि मािस प्रेनमयों
के प्रनि अभद्रिा की गई, नजससे जि मािस में कािी आिोश
उत्पन्ि हुआ और अशांनि का वािावरर् उत्पन्ि होिे की
आशंका उत्पन्ि हुई।

4. नववेचिा के िौराि नशकायिकिाद िे नववेचक के
समक्ष निए गए अपिे बयाि से प्रथम सूचिा ररपोटद के कथिों
का समथदि नकया। गवाह नविम प्रिाप नसंह िथा सुिीि कुमार
गुप्ता िे कहा नक प्राथी िथा अन्य िानमि अनभयुक्त के द्वारा श्री
राम चररि मािस पर निए गए बयाि के कारर् पूरे भारि में
कुछ अन्य िेिागर् िे एक राय होकर श्री राम चररि मािस की
प्रनियां जिाई, िानमदक स्थािों को अपनवत्र नकया और समस्ि
ब्राह्मर् संगठिों व नहन्िू समाज के प्रनि गंिी-गंिी गानियां िीं,
अपमाि जिक शब्िों का प्रयोग नकया िथा समस्ि मािस
प्रेनमयों के प्रनि अभद्रिा की, नजससे जि मािस में कािी
आिोश एवं अशांनि का वािावरर् उत्पन्ि हो गया, इस कारर्
से नहन्िू िमद के नवनभन्ि वगों में शत्रुिा एवं वैमिस्य का भाव
पैिा हो गया।

5. नववेचिा के िौराि नशकायिकिाद िे नववेचक को
एक पेि ड्राइव िी, नजसको िेखिे पर नववेचक िे पाया नक
प्राथी द्वारा श्री राम चररि मािस की चौपाई "ढोि गंवार सूद्र
पसु िारी, सकि िाड़िा के अनिकारी" व "पूनजअ नबप्र सीि
गुि हीिा, सूद्र ि गुि गि ज्ञाि प्रवीिा।" आनि चौपाइयों पर
आपनत्त की गई। केस डायरी में नववेचक िे यह भी अंनकि
नकया है नक उपरोक्त बयाि निखे जािे के बाि जब उसिे वािी
मुकिमा के घर जाकर उससे अन्य व्यनक्तयों के संबंि में
पूछिाछ नकया िो उसिे बिाया नक वह अन्य व्यनक्तयों के बारे
में िही जाििा है, नकन्िु िानमि अनभयुक्तगर् द्वारा श्री राम
चररि मािस पर बयाि िेिे के पररर्ामस्वरूप ही पूरे प्रिेश में
एक राजिैनिक िि के िेिाओं एवं कायदकिादओं द्वारा श्री राम
चररि मािस की प्रनियां जिाई गई एवं अपमाि नकया गया,
नजससे नहन्िू िमद के नवनभन्ि वगों में शत्रुिा एवं द्वेर् की भाविा
पैिा हुई। नववेचक िे यह भी अंनकि नकया है नक अनभयुक्तगर्
द्वारा कनथि अपराि अपिे नविाि पररर्ि सिस्य एवं नविाि
सभा सिस्य के रूप में किदव्यों के निवदहि करिे के िौराि
काररि िहीं नकया गया है, अनपिु राजिैनिक िाभ िेिे के निए
काररि नकया गया है।

6. नववेचिा के उपरान्ि नववेचक िे नििांक
05.04.2023 को आरोप पत्र प्रस्िुि करिे हुए कहा नक
अनभयुक्तगर् द्वारा मीनडया एवं ट्नवटर के माध्यम से श्री राम
चररि मािस की चौपाइयों पर निए गए बयाि के कारर् पूरे
भारि में नवरोि प्रिशदि नकया गया, नजसमें उिके कायदकिादओं
द्वारा श्री राम चररि मािस की प्रनियां जिाई गई एवं अपमानिि
नकया गया, नजससे नवनभन्ि वगों में शत्रुिा एवं वैमिस्य पैिा
हुआ। अनभयुक्तगर् के नवरुद्ध अपराि अन्िगदि िारा 153,
295,298, 505 भा०िं०नव० बखूबी सानबि है।

7. उक्त आरोप पत्र के अिुिम में नवद्वाि मुख्य
न्यानयक मनजस्ट्रेट/नवशेर् न्यायािीश एम.पी./एम.एि.ए
प्रिापगढ़ िे मुकिमा संख्या-11811 सि् 2023 में
नििांक 12.07.2023 को आिेश पाररि नकया, नजसमें
कहा गया है नक केस डायरी में उपिब्ि गवाहों के बयाि
अन्िगदि िारा 161 िं०प्र०सं० िथा पत्राविी पर
उपिब्ि साक्ष्य से अनभयुक्तगर् के नवरुद्ध प्रथम दृष्टया
अपराि अन्िगदि िारा 153, 295, 298, 505
भा०िं०सं० काररि नकया जािा दृनष्टगि होिा है। इस
आिार पर न्यायािय िे उपरोक्त अपरािों का संज्ञाि िेिे
हुए अनभयुक्तगर् को नवचारर् हेिु ििब करिे के निए
समि प्रेनर्ि नकए और उन्हें नििांक 01.08.2023 को
प्रस्िुि होिे का आिेश निया।

8. आरोप पत्र, संज्ञाि िथा ििबी आिेश एवं
कायदवाही के निरस्िीकरर् की प्राथदिा के समथदि में प्राथी के
नवद्वाि अनिवक्ता िे पहिा िकद निया नक प्रथम सूचिा ररपोटद
अथवा नकसी भी बयाि या आरोप पत्र में कनथि आरोप काररि
होिे की निनथ, समय अथवा स्थाि अंनकि िहीं नकया गया है,
नजससे आरोप अस्पष्ट हो जािे है।
11 All. Swami Prasad Maurya Vs. State of U.P. & Anr.
329

9. प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता का अगिा िकद है नक
पत्राविी पर उपिब्ि सामग्री से कनथि अपरािों का काररि
नकया जािा प्रथम दृष्टया प्रिीि िहीं होिा है िथा संग्रहीि
सामग्री के आिार पर प्राथी के नवरुद्ध मुकिमा चिाए जािे का
कोई आिार िहीं है। उन्होंिे यह भी कहा नक श्री राम चररि
मािस की प्रनियां जिाए जािे की बाि नकसी भी साक्षी िे
अपिे बयाि में िहीं कही है।

10. प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता िे यह भी िकद निया
नक प्राथी का कथि उसके स्वंय का कथि िहीं था िथा उसिे
मात्र श्री राम चररि मािस की चौपाइयों का उद्धरर् निया था।
प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता िे यह भी कहा नक प्राथी भारि का
िागररक है और संनविाि के अिुच्छेि 19(1)(A) के अन्िगदि
उसे अनभव्यनक्त की स्विंत्रिा का मौनिक अनिकार प्राप्त है।
प्राथी िे नववानिि कथि अपिे उपरोक्त मौनिक अनिकार के
अन्िगदि निया था।

11. प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता िे अगिा िकद यह
निया नक प्राथी के नवरुद्ध अनभयोजि चिाए जािे की स्वीकृनि
केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार या नजिा मनजस्ट्रेट द्वारा िहीं िी
गई है िथा ऐसी पररनस्थनि में िारा 196 िं०प्र०सं० के
प्राविािों के अिुसार कोई भी न्यायािय िारा 505 के अिीि
िण्डिीय अपराि का संज्ञाि िहीं िे सकिा है।

12. उक्त के उत्तर में नवद्वाि अनिररक्त महानिवक्ता िथा
नवद्वाि अनिररक्त शासकीय अनिवक्ता िे कहा नक नवद्वाि
अनिवक्ता प्राथी द्वारा उठाए गए नबन्िु िारा 482 िं०प्र०सं० के
अन्िगदि इस न्यायािय को प्राप्त क्षेत्रानिकार की सीमाओं से परे
हैं। िारा 482 िं०प्र०सं० के अन्िगदि न्यायािय को िघु
नवचारर् िहीं करिा होिा है िथा मात्र यह िेखिा होिा है नक
क्या अनभयुक्तगर् के नवरुद्ध इस स्िर पर अनभयोजि द्वारा कनथि
अपरािों के निए नवचारर् चिाए जािे हेिु प्रथम दृष्टया मामिा
बि रहा है या िहीं । इस स्िर पर न्यायािय को ि िो कथिों
की सत्यिा का परीक्षर् करिा होिा है और ि ही साक्ष्यों की
नववेचिा करिी होिी है।

13. प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता िे पी. ए. िांजीत
बनाम पुदलस दनिीक्षक, दतरुपनथल पुदलस स्टेशन औि
अन्य, सीआिएल. ओ.पी. (एमडी) नांबि 8893/2019 औि
सीआिएल एमपी (एमडी) नांबि 5643/2019 में मद्रास
उच्च न्यायालय (मिुिै बेंच) के माििीय एकि न्यायािीश
वािी एक पीठ के निर्दय नििांक 12.11.2021 को प्रस्िुि
नकया, जहां यानचकाकिाद िे राजा राजाराज चोि द्वारा शुरू की
गई जानि व्यवस्था के बारे में एक सावदजनिक बैठक में कहा नक
चोि युग के शासि के कारर् भूनम िोगों की जोि से िे िी
गई थी और वे भूनमहीि गरीब हो गए थे; नक चोि युग िे
िेविासी प्रर्ािी की शुरुआि की, जो विदमाि नस्थनि का मूि
कारर् था; नक वे मवेनशयों को खा रहे हैं, जो समाज के अन्य
वगों द्वारा पूजिीय है। उन्होंिे कहा नक चोि युग इनिहास में
कािा युग है। वह जानि व्यवस्था का भी नजि कर रहे थे,
नजसे राजिीनिक ििों द्वारा अपिाया गया है, जो जानि के
आिार पर चुिाव के निए उम्मीिवारी का िामांकि करिे हैं।
उन्होंिे उपनस्थि िोगों को डॉ. अंबेडकर की पुस्िक पढ़िे और
उमर िारूक का अिुसरर् करिे की भी सिाह िी। उपरोक्त
नवशेर् िथ्यों के दृनष्टगि मद्रास उच्च न्यायािय िे कहा नक
यानचकाकिाद िे केवि नसस्टम पर एक नशकायि व्यक्त की थी
और उसे आपरानिक अनभयोजि के निए इससे आगे िहीं
बढ़ाया जा सकिा है। उक्त निर्दय नवनशष्ट िथ्यों पर आिाररि हैं
िथा प्रस्िुि प्रकरर् में िागू होिे वािा कोई नसद्धान्ि इसमें
प्रनिपानिि िहीं नकया गया है।

14. प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता िे माििीय सवोच्च
न्यायािय के निर्दय उत्ति प्रिेश िाज्य बनाम ललई दसांह
यािि, (1976) 4 SCC 213 को भी प्रस्िुि नकया, जो
उत्तर प्रिेश सरकार द्वारा िंड प्रनिया संनहिा की िारा 99-ए के
अन्िगदि अंग्रेजी में प्रकानशि पुस्िक "Ramayan - A
True Reading" और नहंिी में प्रकानशि इसके अिुवाि
को जब्ि करिे के निए पाररि एक आिेश को उच्च न्यायािय
द्वारा निरस्ि नकए जािे के आिेश के नवरुद्ध अपीि थी। माििीय
सवोच्च न्यायािय िे अपिे निर्दय में िारा 99-ए की
आवश्यकिाओं का नवश्लेर्र् नकया। उक्त निर्दय में प्रनिपानिि
नसद्धांि प्रस्िुि प्रकरर् के निर्दय में िागू िहीं होंगे क्योंनक यह
नवनि का सुस्थानपि नसद्धांि है नक न्यानयक निर्दय नवनि को
नविानयका द्वारा बिाए गए संनवनियों के अिुसार िहीं पढ़ा जािा
चानहए, अनपिु उन्हें उि िथ्यों के प्रकाश में ही पढ़ा जािा
चानहए, नजिके पररप्रेक्ष्य में वह निर्दय निया गया है।

15. प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता िे माििीय सवोच्च
न्यायािय के निर्दय एस. िीिाबद्रन चेरियाि बनाम ई.िी.
िामास्िामी नायकि, ए.आई.आि 1958 एस सी 1032 को
भी प्रस्िुि नकया, नजसमें आरोप यह था नक िानमदक सुिारक
होिे का िावा करिे वािे एक िेिा िे टाउि हॉि में एक
सावदजनिक बैठक अपिे भार्र् में स्पष्ट रूप से कहा नक उिका
इरािा भगवाि गर्ेश की मूनिद को िोड़कर नहंिू समुिाय की
330 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
भाविाओं का अपमाि करिा था और उन्होंिे टाउि हॉि मैिाि
में सावदजनिक रूप से भगवाि गर्ेश की मूनिद को िोड़ निया।
नशकायि में आरोप िगाया गया नक भगवाि गर्ेश की छनव
को िोड़िे का उक्त कायद नहंिू समुिाय के कुछ वगों की िानमदक
भाविाओं का अपमाि करिे के इरािे से नकया गया था, जो
भगवाि गर्ेश को पूजा में रखिे हैं, और नशकायि नकए गए
कायद भारिीय िंड संनहिा की िारा 295 और 295-ए के
अंिगदि अपराि हैं। मनजस्ट्रेट िे आपरानिक प्रनिया संनहिा की
िारा 203 के अंिगदि नशकायि को खाररज करिे हुए कहा नक
आरोपी द्वारा कनथि िौर पर िोड़ी गई गर्ेश की नमट्टी की
आकृनि पनवत्र िहीं है िथा इसकी नकसी भी वगद के व्यनक्तयों
द्वारा पूजा िहीं की जािी थी। मनजस्ट्रेट िे यह भी कहा नक
नसिद इसनिए नक यह आकृनि भगवाि गर्ेश से नमििा-जुििा
था िथा एक वगद द्वारा पूजा में रखा गया था, यह पनवत्र मािी
जािे वािी वस्िु िहीं बि सकिा है िथा अगर कोई व्यनक्त ऐसी
मूनिद के साथ छेड़छाड़ करिा है िो यह अपराि िहीं है। सत्र
न्यायािय और उच्च न्यायािय िे मनजस्ट्रेट के निर्दय को निरस्ि
िहीं नकया।

16. अपीि में माििीय सवोच्च न्यायािय िे कहा नक
िीचे के न्यायािय में नवद्वाि न्यायािीश िे "जकसी िी वगष के
व्यजक्तयों द्वारा पजवत्र मानी जाने वाली जकसी िी वस्तु" शब्िों
को यह कहिे हुए नक केवि मंनिरों में मूनिदयों या त्योहारों के
अवसरों पर जुिूस में िे जािे वािी मूनिदयों को उि शब्िों में
शानमि नकया जािा है, बहुि सीनमि अथद निया है। भारिीय िंड
संनहिा की िारा 295 में अथों को सीनमि करिे के ऐसे कोई
स्पष्ट शब्ि िहीं हैं, और नवद्वाि न्यायािीश िे स्पष्ट रूप से सीमा
के उि शब्िों को प्रयोग करिे में गििी की है। बाइबि या
कुराि या गुरु ग्रंथ सानहब जैसी पनवत्र पुस्िकें भी स्पष्ट रूप से
उि सामान्य शब्िों के िायरे में है। यनि अिीिस्थ न्यायािय
िारा 295 में महत्वपूर्द शब्िों की अपिी व्याख्या में सही थे,
िो ऐसी पनवत्र पुस्िकों को जिािा या अन्यथा िष्ट करिा या
अपनवत्र करिा, िंड कािूि के िायरे में िहीं आएगा। माििीय
सवोच्च न्यायािय िे कहा नक इस िरह की सीनमि व्याख्या
नवनियों की व्याख्या के सभी सुस्थानपि नसद्धांिों के नवरु्िि है।
कोई भी वस्िु, चाहे वह नकििी भी िुच्छ क्यों ि हो, यनि
नकसी भी वगद के व्यनक्तयों द्वारा पनवत्र मािी जािी है, िो वह
िंड िारा के अथद के अंिगदि आिी है। यह नबल्कुि आवश्यक
िही है नक वस्िु पनवत्र होिे के निए वास्िव में उसकी पूजा की
जािी चानहए थी। नकसी वस्िु को व्यनक्तयों के एक वगद द्वारा
उिके द्वारा पूजा नकए नबिा भी पनवत्र मािा जा सकिा है। इस
िारा का उद्देश्य नवनभन्ि िमों या पंथों के व्यनक्तयों की िानमदक
मान्यिाओं का सम्माि करिा है। न्यायाियों को ऐसे मामिों में
बहुि सिकद रहिा होगा, और नवनभन्ि नवश्वासों वािे व्यनक्तयों
के नवनभन्ि वगों की भाविाओं और िानमदक भाविाओं का
उनचि ध्याि िेिा होगा, भिे ही वे उि मान्यिाओं को साझा
करिे हों या िहीं, या वे न्यायािय की राय में िकदसंगि हैं या
िहीं।

17. उपरोक्त निर्दय नकसी भी िरह से आवेिक के
मामिे में मिि िहीं करिा है, अनपिु इसमें कहे गये नसद्धान्ि
प्रथम दृष्टया प्राथी को आरोनपि करिे के आिार प्रिाि करिे हैं।

18. प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता िे माििीय सवोच्च
न्यायािय द्वारा चक्र बेहिा बनाम बालकृष्र् महापात्र,
एआईआि 1963 उडीसा 23 में निए गए निर्दय को प्रस्िुि
नकया, नजसमें यानचकाकिादओं को िारा 298 भा०िं०सं०. के
अन्िगदि इस आरोप पर िोर्ी ठहराया गया था और 15 रुपये
के जुमादिे की सजा सुिाई गई थी, नक उन्होंिे ग्रामीर्ों की
िानमदक भाविाओं को चोट पहुंचािे के इरािे से अशुभ नििों में
िो िेविाओं की पूजा की। माििीय उच्चिम न्यायािय िे कहा
नक यनि कोई अिनिकृि व्यनक्त नकसी अशुभ निि पर नकसी
मंनिर में पूजा करिा है, िो यह कुछ पररनस्थनियों में अन्य
व्यनक्तयों के िागररक अनिकारों का अनििमर् हो सकिा है,
िेनकि यानचकाकिादओं को िारा 298 भा०िं०सं० के अन्िगदि
अपराि का िोर्ी ठहरािे के निए अनभयोजि पक्ष को
सकारात्मक रूप से स्थानपि करिा होगा नक यह कृत्य उिकी
िानमदक भाविाओं को चोट पहुंचािे के इरािे से नकया गया था।
यानचकाकिादओं िे अपिे पुजारी के माध्यम से उनचि िरीके से
पूजा की। नकए गए अिुष्ठािों में कोई कायद िहीं था जो संभविः
नकसी अन्य व्यनक्त की भाविाओं को चोट पहुंचा सकिा था।
पूजा करिे समय यानचकाकिादओं के िानमदक उत्साह को कभी
चुिौिी िहीं िी गई। वे िेविाओं को प्रसन्ि करिा चाहिे थे,
क्योंनक गांव में मवेनशयों की बीमारी का प्रसार था। उिकी
कारदवाई चाहे नकििी भी अिनिकृि क्यों ि हो, उिका नकसी
भी अन्य सह-ग्रामीर्ों की िानमदक भाविाओं को चोट पहुंचािे
का कोई इरािा िहीं था।

19. उपरोक्त निर्दय भी प्रकरर् के नवशेर् िथ्यों पर
आिाररि है िथा अनभयुक्तों की िोर्नसनद्ध उच्च न्यायािय िे
इस आिार पर निरस्ि नकया नक उन्होंिे उनचि िरीके से पूजा
करके िेविाओं को प्रश्न करिे की चेष्टा की थी। उक्त निर्दय
प्रस्िुि मामिे के िथ्यों पर िागू िहीं होिा है िथा इसका िाभ
प्राथी को िहीं नमिेगा।
11 All. Swami Prasad Maurya Vs. State of U.P. & Anr.
331

20. इसके उत्तर में नवद्वाि अनिररक्त महानिवक्ता िे
माििीय सवोच्च न्यायािय के निर्दय कर्ाषटक िाज्य बनाम
एम िेिेन्द्रप्पा, (2002) 3 एससीसी 892, को प्रस्िुि नकया
नजसमें माििीय सवोच्च न्यायािय िे कहा नक संनहिा की िारा
482 के अंिगदि शनक्त का प्रयोग अपवाि है ि नक नियम। यह
िारा उच्च न्यायािय को कोई िई शनक्तयां प्रिाि िहीं करिी है।
यह केवि उस अंिनिदनहि शनक्त को बचािा है जो संनहिा के
अनिनियमि से पहिे न्यायािय के पास थी। इसमें िीि
पररनस्थनियों की पररकल्पिा की गई है नजिके अंिगदि अंिनिदनहि
अनिकार क्षेत्र का प्रयोग नकया जा सकिा है, अथादि्,

(i) संनहिा के अंिगदि पाररि नकसी आिेश को प्रभावी
बिािे के निए,

(ii) न्यायािय की प्रनिया के िुरुपयोग को रोकिे के
निए, और

(iii) अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरनक्षि करिे के
निए।

अंिनिदनहि क्षेत्रानिकार के प्रयोग को नियंनत्रि करिे के
निए कोई नियम बिािा ि िो संभव है और ि ही वांछिीय है।
संनहिा की िारा 482 के अंिगदि उच्च न्यायािय के पास जो
शनक्तयां हैं, वे बहुि व्यापक हैं और इसके प्रयोग में बहुि
साविािी की आवश्यकिा होिी है। न्यायािय को यह सुनिनिि
करिे के निए साविाि रहिा चानहए नक इस शनक्त का प्रयोग
करिे में उसका निर्दय ठोस नसद्धांिों पर आिाररि है। एक वैि
अनभयोजि को समाप्त करिे के निए अंिनिदनहि शनक्त का
उपयोग िहीं नकया जािा चानहए। नकसी राज्य का सवोच्च
न्यायािय होिे के िािे उच्च न्यायािय को आम िौर पर ऐसे
मामिे में प्रथम दृष्टया निर्दय िेिे से बचिा चानहए जहां पूरे
िथ्य अिूरे और िुंििे हैं, खासकर जब साक्ष्य एकत्र िहीं नकए
गए हैं और न्यायािय के समक्ष पेश िहीं नकए गए हैं और
इसमें शानमि मुद्दे पयादप्त सामग्री के नबिा उिके वास्िनवक
पररप्रेक्ष्य में िहीं िेखे जा सकिे हैं।

21. माििीय सवोच्च न्यायािय के एक अन्य निर्दय
केंद्रीय जाांच ब्यूिो बनाम आयषन दसांह आदि, 2023
एससीसी ऑनलाइन एससी 379 में अविाररि है नक िारा
482 िं०प्र०सं० के अंिगदि शनक्तयों का उपयोग करिे हुए
न्यायािय को िघु नवचारर् (नमिी ट्रायि) करिे की आवश्यकिा
िहीं है। इसमें अनभयोजि/जांच एजेंसी को आरोपों को सानबि
करिे की आवश्यकिा िहीं है। िं०प्र०सं० की िारा 482 के
अंिगदि शनक्तयों का उपयोग करिे समय न्यायािय के पास बहुि
सीनमि अनिकार क्षेत्र है और मात्र यह नवचार करिे की
आवश्यकिा है नक "क्या आरोपी के नवरुद्ध आगे बढ़िे के निए
कोई पयादप्त सामग्री उपिब्ि है, नजसके निए आरोपी पर
मुकिमा चिािे की आवश्यकिा है या िहीं"।

22. बृांिा किात बनाम िाज्य (एनसीटी दिल्ली),
2022 एससीसी ऑनलाइन दिल्ली 1775 पृष्ठ 162, में
निल्िी उच्च न्यायािय िे कहा नक एक िेिा द्वारा जो भी कायद
नकया जािा है, आम आिमी उसके पिनचन्हों पर चििा है
और जो भी मािक वह अपिे कृत्यों से नििादररि करिा है,
उसका अिुसरर् उसके अिुयानययों द्वारा नकया जािा है। जो
िोग जि िेिा हैं और उच्च पिों पर आसीि हैं, उन्हें अत्यंि
ईमाििारी और उत्तरिानयत्व के साथ व्यवहार करिा चानहए।
भारि जैसे िोकिंत्र में चुिे गए िेिाओं की नजम्मेिारी ि केवि
अपिे निवादचि क्षेत्र के मििािाओं के प्रनि है, बनल्क पूरे
समाज /राष्ट्ट्र और संनविाि के प्रनि भी है। इस प्रकार िेिाओं
को ऐसे कृत्यों या भार्र्ों में शानमि होिा शोभा िहीं िेिा है
जो समुिायों के बीच िरार पैिा करिे हैं, ििाव पैिा करिे हैं,
और समाज में सामानजक िािे-बािे को बानिि करिे हैं।

23. यद्यनप धािा 482 िां०प्र०सां० के अन्िगदि आरोप
पत्र के निरस्िीकरर् की प्राथदिा िय करिे समय इस न्यायािय
को मामिे के गुर्-िोर् पर नवचारर् िहीं करिा होिा है ििानप
चूंनक प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता िे यह िकद नकया है नक प्राथी
िे मात्र श्री राम चररि मािस की चौपाइयों का उद्धरर् िेिे हुए
नववानिि कथि नकया था िथा उसको संनविाि के अिुच्छेि
19 (1)(A) के अन्िगदि ऐसा कथि करिे का मौनिक
अनिकार था, यह स्पष्ट करिा आवश्यक हो जािा है नक
भारिीय संनविाि का अिुच्छेि 19 उनचि प्रनिबंिों के साथ
भार्र् और अनभव्यनक्त की स्विंत्रिा प्रिाि करिा है। उनचि
प्रनिबंिों में सावदजनिक व्यवस्था, शािीििा या िैनिकिा या
न्यायािय की अवमाििा, मािहानि या अपराि के निए
उकसािा शानमि है। ििरि िैिािे वािे भार्र् संप्रिाय नवशेर्
के नखिाि अपरािों को भी उकसािे हैं। अनभव्यनक्त की
स्विंत्रिा का मौनिक अनिकार नकसी भी व्यनक्त को यह
अनिकार िहीं िेिा है नक वह ऐसा कोई कृत्य करे जो एक
िंडिीय अपराि की श्रेर्ी में आ सकिा हो।

24. जहां िक प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता का यह
कथि है नक प्राथी िे श्री राम चररि मािस की चौपाइयों का
उद्धरर् करिे हुए कोई असत्य बाि िहीं कही थी, न्यायािय का
332 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
मि है नक नकसी भी ग्रंथ/अनभिेख में नकए गए कथि सही
पररप्रेक्ष्य में ही पढ़े िथा रखे जािे चानहए िथा कहीं से भी कोई
एक अंश नबिा सम्पूर्द संगि िथ्यों के रखिा सम्पूर्द सत्य कथि
िहीं है िथा कुछ पररनस्थनियों में ऐसा कथि असत्य कथि भी
हो सकिा है। उिाहरर् के निए कोई भी नवनि अथवा नवनिक
प्रानविाि अथवा न्यानयक निर्दय भी हमेशा पूरे ही पढ़े जािे है
िथा नवनि के प्राविािों का अथवा न्यानयक निर्दयों का कोई
अंश नबिा, उसके समस्ि संगि प्राविािों के िहीं प्रस्िुि नकया
जा सकिा है। इसी प्रकार जब श्री राम चररि मािस की कोई
चौपाई उद्धररि की जाए िो यह अनिवायद है नक यह भी ध्याि
में रखा जाए नक उसमें कहा कथि नकस पात्र िे कैसी पररनस्थनि
में नकस व्यनक्त से कहा।

25. प्राथी द्वारा कही गई चौपाई 'ढोि गंवार सूद्र पसु
िारी, सकि िाड़िा के अनिकारी' समुद्र िे श्री रामचंद्र जी से इस
आशय के साथ कही नक वह स्वयं एक जड़-बुनद्ध है िथा वह
इस कारर् से की गई भूि की क्षमा मांग रहा है ऐसी पररनस्थनि
में स्वयं को जड़-बुनद्ध माििे वािे एक पात्र द्वारा कहा गया
कथि जब समस्ि संगि िथ्यों के संिभद के नबिा प्रस्िुि नकया
जािा है िो यह सत्य का सही नवरुपर् िहीं कहा जा सकिा है।

26. उक्त चौपाई की व्याख्या करिे हुए कुछ नवद्वािों िे
कहा है नक यहां 'िाड़ि' शब्ि का अथद सीख अथवा नशक्षा िेिा
है िथा चौपाई का सही अथद यह है नक इसमें कहे गए सभी
प्रकार के पात्र भी सीख (नशक्षा) पािे के अनिकारी है।

27. इसी प्रकार से िूसरी नववानिि चौपाई "पूनजअ नबप्र
सीि गुि हीिा, सूद्र ि गुि गि ज्ञाि प्रवीिा" के नवर्य में भी
नवद्वािों के नवनभन्ि मि हैं। नवशेर्िः नवप्र के अथद को िेकर
कुछ नवद्वािों का माििा है नक नवप्र से िात्पयद ऐसे व्यनक्तयों से
है नजन्हें ब्रह्म ज्ञाि है िथा यह नकसी जानि नवशेर् में जन्म निए
व्यनक्तयों को इंनगि िहीं करिा है।

28. प्राथी का मि इससे नभन्ि हो सकिा है, क्योंनक
यह सही है नक प्राथी को भी अन्य व्यनक्तयों की िरह उक्त ग्रंथ
की अपिी एक स्विंत्र समीक्षा करिे का अनिकार है, नकन्िु
स्विंत्र समीक्षा अथवा स्वस्थ आिोचिा का िात्पयद यह िहीं है
नक ऐसे शब्िों का प्रयोग नकया जाए नजससे िोग अपराि
काररि करिे को प्रेररि होिे िगें।

29. जहां िक प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता का यह िकद
है नक प्रथम सूचिा ररपोटद, बयाि अथवा आरोप पत्र में आरोप
की निनथ, समय व स्थाि अंनकि िहीं नकया गया है, यह
कनमयां आरोप पत्र के निरस्िीकरर् का आिार िहीं हो सकिी
हैं, क्योंनक इस स्िर पर न्यायािय को मात्र यह िेखिा है नक
क्या प्रथम दृष्टया आरोप काररि होिा प्रिीि होिा है और
अनभयुक्तगर् के नवचारर् का पयादप्त आिार है अथवा िहीं।

30. प्राथी के नवरुद्ध िारा 153, 295, 298, 505
भा०िं०सं० के अपराि काररि करिे का आरोप, नजिके
प्रानविाि निम्िवि हैः-

"धािा 153 :-बल्वा किाने के आिय से स्वैरिता से
प्रकोपन देना - यशद बल्वा शकया जाए- यशद बल्वा न
शकया जाए - जो कोई अव ध बात करने द्वारा जकसी व्यजक्त
को पररद्वेर् से या स्व ररता से प्रकोजपत इस आशय से या यह
सम्िाव्य जानते हुए करेगा जक ऐसे प्रकोपन के पररणामस्वरूप
बल्वे का अपराध जकया जाएगा, यजद ऐसे प्रकोपन के
पररणामस्वरूप बल्वे का अपराध जकया जाए, तो वह दोनों में से
जकसी िांजत के कारावास से, जजसकी अवजध एक वर्ष तक की
हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, और यजद बल्वे का
अपराध न जकया जाए, तो वह दोनों में से जकसी िांजत के
कारावास से, जजसकी अवजध छह मास तक को हो सकेगी, या
जुमाषने से, या दोनों से, दजडर्त जकया जाएगा।

धािा 295 :-शकसी वगथ के धिथ का अपिान किने
के आिय से उपासना के स्र्ान को क्षशत किना या
अपशवत्र किना- जो कोई जकसी उपासना के स्थान को
या व्यजक्तयों के जकसी वगष द्वारा पजवत्र मानी गई जकसी
वस्तु को नष्ट, नुकसानग्रस्त या अपजवत्र इस आशय से
करेगा जक जकसी वगष के धमष का तदद्वारा अपमान जकया
जाए या यह सम्िाव्य जानते हुए करेगा जक व्यजक्तयों का
कोई वगष ऐसे नाश, नुकसान या अपजवत्र जकए जाने को
अपने धमष के प्रजत अपमान समझेगा, वह दोनों में से
जकसी िांजत के कारावास से, जजसकी अवजध दो वर्ष
तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दजडर्त जकया
जाएगा।

धािा 298 :-धाशिथक भावनाओिं को ठेस पह ुँचाने के
शविशिथत आिय से िब्द उच्चारित किना आशद- जो कोई
जकसी व्यजक्त की धाजमषक िावनाओं को ठेस पहुूँचाने के
जवमजशषत आशय से उसकी गोचरता में कोई शब्द उच्चाररत
करेगा या कोई ध्वजन करेगा या उसकी दृजष्टगोचरता में, कोई
अंगजवक्षेप करेगा, या कोई वस्तु रिेगा, वह दोनों में से जकसी
11 All. Swami Prasad Maurya Vs. State of U.P. & Anr.
333
िांजत के कारावास से, जजसकी अवजध एक वर्ष तक की हो,
सकेगी, या जुमाने से, या दोनों से, दजडर्त जकया जाएगा।

धािा 505 :- िोक रिशि-कािक वक्तव्य-

(1) जो कोई शकसी कर्न, जनश्रुशत या रिपोटथ को
-

(क) इस आशय से जकया जजससे यह सम्िाव्य हो जक,
िारत की सेना, नौसेना या वायुसेना का कोई ऑर्ीसर,स जनक
(नाजवक या वायुस जनक) जवद्रोह करे या अन्यथा वह अपने उस
नाते अपने कतषव्य की अवहेलना करे, या उसके पालन में
असर्ल रहे, अथवा

(ि) इस आशय से जक, या जजससे यह सम्िाव्य हो
जक, लोक के जकसी िाग को ऐसा िय या संत्रास काररत हो
जजससे कोई व्यजक्त रायय के जवरुद्ध या लोक प्रशाजन्त के जवरुद्ध
अपराध करने के जलए उत्प्रेररत हो, अथवा

(ग) इस आशय से जक, या जजससे यह सम्िाव्य हो जक,
उससे व्यजक्तयों का कोई वगष या समुदाय जकसी दूसरे वगष या
समुदाय के जवरुद्ध अपराध करने के जलए उद्दौश जकया जाए,
रचेगा, प्रकाजशत करेगा या पररचाजलत करेगा, वह कारावास से,
जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुमाषने से, या दोनों से,
दजडर्त जकया जाएगा।

(2) शवशभन्न वगों िें ित्रुता, घृणा या वैिनस्य पैदा
या सम्प्प्रवशतथत किने वािे कर्न. जो कोई जनश्रुजत या
संत्रासकारी समाचार अन्तजवष्ट करने वाले जकसी कथन या ररपोटष
को इस आशय से जक, या जजससे यह सम्िाव्य हो जक,
जवजिन्न धाजमषक, मूलवंशीय, िार्ाई या प्रादेजशक समूहों या
जाजतयों या समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा या व मनस्य की
िावनाएं, धमष, मूलवंश, जन्म स्थान, जनवास स्थान, िार्ा, जाजत
या समुदाय के आधारों पर या अन्य जकसी िी आधार पर प दा
या संप्रवजतषत हो, रचेगा, प्रकाजशत करेगा, या पररचाजलत करेगा,
वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, या जुमाषने
से, या दोनों से, दजडर्त जकया जाएगा।

(3) पूजा के स्र्ान आशद िें शकया गया उपधािा
(2) के अधीन अपिाध. - जो कोई उपधारा (2) में जवजनजदष्ट
अपराध जकसी पूजा के स्थान में या जकसी जमाव में, जो
धाजमषक पूजा या धाजमषक कमष करने में लगा हुआ हो, करेगा,
वह कारावास से जो पांच वर्ष तक का हो सकेगा, दजडर्त
जकया जाएगा और जुमाषने से िी दडर्नीय होगा।

अपवाद.- ऐसा कोई कचन, जनश्रुजत या ररपोटष इस धारा
के अथष के अन्तगषत अपराध की कोजट में नहीं आती, जब उसे
रचने वाले, प्रकाजशत करने वाले या पररचाजलत करने वाले
व्यजक्त के पास इस जवश्वास के जलए युजक्तयुक्त आधार हो जक
ऐसा कथन, जनश्रुजत या ररपोटष सत्य ह और वह उसे
सद्भावपूवषक तथा पूवोक ज से जकसी आशय के जबना] रचता ह ,
प्रकाजशत करता ह या पररचाजलत करता ह ।)"

31. जब हम िारा 482 िं०प्र०सं० के अंिगदि
न्यायािय को प्राप्त क्षेत्रानिकार की सीमाओं में रहिे हुए मामिे
के िथ्यों को िेखिे हैं िो प्रथम दृष्टया यह प्रिीि होिा है नक
प्राथी द्वारा श्री राम मािस पर निए गए बयाि के कारर् पूरे
भारि में कुछ अन्य िेिागर् िे एक राय होकर श्री राम चररि
मािस की प्रनियां जिाई और समस्ि ब्राह्मर् संगठिों व नहन्िू
समाज के प्रनि गंिी-गंिी गानियां िीं, अपमाि जिक शब्िों का
प्रयोग नकया िथा समस्ि मािस प्रेनमयों के प्रनि अभद्रिा की।
इस कारर् से जि मािस में कािी आिोश एवं अशांनि का
वािावरर् उत्पन्ि हो गया िथा नहन्िू िमद के नवनभन्ि वगों में
शत्रुिा एवं वैमिस्य का भाव पैिा हो गया।

32. प्रथम दृष्टया ऐसा प्रिीि होिा है नक प्राथी के
उपरोक्त िथ्यों से िोगों में बिवा करािे का प्रकोपि उत्पन्ि
हुआ। उक्त कृत्यों से श्री राम चररि मािस, जो एक बड़े वगद
द्वारा पनवत्र ग्रंथ मािा जािा है, को जिा कर िुकसाि पहुाँचाया
गया िथा उसका अपमाि नकया गया, नजसे एक बड़े वगद िे
अपिे िमद का अपमाि मािा। प्राथी द्वारा कहे गए कथि प्रथम
दृष्टया इस आशय से कहे गए प्रिीि होिे हैं या उसके कथिों से
यह संभाव्य प्रिीि होिा है नक उससे व्यनक्तयों का एक वगद
िूसरे वगद के नवरुद्ध अपराि करिे के निए उद्दीप्त हो जाए। अिः
प्रथम दृष्टया प्राथी द्वारा िारा 153, 295, 298 िथा
505(1)(ग) भा०िं०सं० के अन्िगदि अपराि का काररि होिा
प्रिीि होिा है।

33. प्राथी कनथि आरोपों के निए िोर्ी है या िहीं,
यह इस न्यायािय को इस स्िर पर िहीं िेखिा है और यह
नवचारर् के िौराि साक्ष्य िेकर नवचारर् न्यायािय िय करेगा।

34. प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता िे िकद निया नक िारा
196 िं०प्र०सं० के अन्िगदि केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार
अथवा नजिा मनजस्ट्रेट की स्वीकृनि के नबिा प्राथी के नवरुद्ध
अनभयोजि िहीं चिाया जा सकिा है।

35. िारा 196 (1-क)(क) प्रानविानिि करिी है नक
कोई न्यायािय भा०िं०सं०, 1860 की िारा 153(ख) या
िारा 505 की उप-िारा (2) या उप-िारा (3) के अिीि
334 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
िण्डिीय नकसी अपराि का संज्ञाि केंद्रीय सरकार या राज्य
सरकार या नजिा मनजस्ट्रेट की पूवद स्वकृनि से ही िेगा अन्यथा
िहीं। प्राथी के नवरुद्ध कनथि अपराि िारा 505 की उप-
िारा(1) के अिीि आिे हैं िथा उक्त अपराि के निए िारा
196 में अनभयोजि स्वीकृनि िेिे की आवश्यकिा िहीं है।
अिः प्राथी के नवद्वाि अनिवक्ता का यह िकद भी बिहीि है।

36. उपरोक्त समीक्षा के दृनष्टगि न्यायािय का यह मि
है नक प्राथदिा पत्र अन्िगदि िारा 482 िं०प्र०सं० बिहीि है।

37. िििुसार, प्राथदिा पत्र दनिस्त नकया जािा है।

38. यह स्पष्ट नकया जािा है नक नवचारर् न्यायािय
प्रकरर् को गुर्-िोर् के आिार पर, साक्ष्यों िथा नवनि के
अिुसार इस आिेश में कहे गए नकसी भी िथ्य से प्रभानवि हुए
नबिा निर्ीि करेगा।
----------
(2023) 11 ILRA 334
ORIGINAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: LUCKNOW 21.11.2023

BEFORE

THE HON'BLE SAURABH LAVANIA, J.

Application u/s 482 No. 11375 of 2023

Mathura Prasad @ Mathura ...Applicant
Versus
State of U.P. & Anr. ...Opp. Parties

Counsel for the Applicant:
Yogeshwar Sharan Srivastava

Counsel for the Opp. Parties:
G.A.

(A) Criminal Law - The Code of Criminal
Procedure, 1973 - Section 482 - Inherent
power - Section 233(3) - trial court can
reject an application on three grounds:
vexatious intention, intention to delay the
trial, and intention to defeat the ends of
justice - Indian Penal Code, 1860 - the
relevancy of the witnesses is to be shown,
pleaded and proved. (Para -18, 20)
Applications
preferred
by
petitioner
for
summoning - Head Moharrir, Prabhari Adhikari
(Ayudh) and other witnesses
 - relevancy to
call witnesses not indicated in application -
rejected by trial court.

HELD:-Applications have been moved with an
intention to delay the trial, as the FIR was
lodged way back on 14.04.1997 i.e. about 25
years back. Application has rightly been rejected
by trial court (Para -22, 23)

Application u/s 482 Cr.P.C. dismissed. (E7)

(Delivered by Hon'ble Saurabh Lavania, J.)

1. Heard learned counsel for the
applicant and learned AGA for the State
and perused the record.

2. The present petition has been filed
for the following main relief:-

"For the facts reasons and
circumstances
mentioned
in
the
accompanying
affidavit,
it
is
most
respectfully prayed that this Hon'ble Court
may kindly be pleased to quash the order
dated 17/10/2023, passed by Learned
Additional District and Session Judge
Court No. 05/ Special Judge (Gangster
Act.) Gonda, (State Vs. Ramesh and Ors.)
in Session Trial No. 198 of 2003, in the
interest of justice."

3. Brief facts of the case, as indicated,
are to the effect that an FIR was registered
by the police on 14.07.1997 at about 13.40,
with regard to an incident occurred in the
night of 13/14.04.1997. The prosecution
story narrated in the FIR, in short, is that
the named accused persons including the
petitioner came to the house of the
informant namely Vasudev Mishra, in the
night of 13/14.04.1997 at about 2:30 A.M.
and assaulted the sons of the informant