# Vatan Gaur v. State of U.P. & Anr

- **Citation:** (2021) 2 ILRA 574
- **Court:** High Court of Judicature at Allahabad
- **Decided:** 2021-01-29
- **Case number:** Application U/S 482 Cr.P.C. No. 15395 of 2020
- **Bench:** Saurabh Shyam Shamshery
- **Source:** https://unisonlegal.in/judgment/allahabad-high-court/vatan-gaur-v-state-of-u-p-anr-46850
- **Pages:** 12

## Headnote

G.A., Mrs. Anjali Upadhya
(अ) फौजदारी कानून - भारतीय दंड संहिता १८६०
- धारा १८८- लोक सेवक द्वारा सम्यक॒ रूप से
प्रख्यापपत आदेश की अवज्ञा, धारा २८८ - ककसी
ननर्ााण को गिराने या उसकी र्रम्र्त करने के
संबंध र्ें उपेक्षा पूणा आचरण , धारा ४२० - छल
करना और संपपि पररदि करने के ललए बेईर्ानी से
उतप्रेररत करना , सावाजननक संपपि नुकसान
ननवारण अगधननयर् 1984 - धारा 3 - लोक
संपपि को नुकसान काया करने वाली ररष्टि के
अपराध िोने पर सजा का प्रावधान , आपरागधक
कानून संशोधन अगधननयर् 1932 - धारा 7 -
ककसी व्यष्तत को रोजिार या व्यवसाय के पूवााग्रि
के ललए छेड़छाड़ करना - उच्चतर् न्यायालय की
शष्ततयां का दायरा व्यापक िै परंतु इनका उपयोि
संयर् एवं सावधानीपूवाक िी ककया जाना चाहिए -
इसके उपयोि से ककसी भी वैधाननक अलभयोजन की
आकष्मर्क र्ृत्यु निीं की जा सकती िै। (परा -
६.०३)
आवेदक प्रश्नगत भूमि का भूस्वािी है - जिसिें
सहअपराधियों के संग व सहितत उक्त भूमि पर
बहुिंजिला भवन का तनिााण ककया व करवाया - जिसके
आवश्यक वैिातनक अनुितत प्राप्त नह ं की गयी - इस
न्यायालय के यथा जस्थतत के आदेश के होते हुए भी भवन
तनिााण करके अविानना का भी िािला बनता प्रतीत
होता है। (परा - ८.०१)
ननणाय : उच्च न्यायालय को उसकी अन्ततनहहत
शजक्तयों का उपयोग संयि व साविानी पूवाक ह करना
चाहहये। अगर प्राथमिकी व वववेचना के दौरान एकत्र
ककये गये साक्ष्य अपराि के कृत्य को प्रथि दृष्तया प्रकट
करते है तो ऐसी पररजस्थततयों िें ककसी भी वैिातनक
अमभयोिन को आकजस्िक िृत्यु प्रदान नह ं की िानी
चाहहए। वतािान प्रकरण िें आवेदक के ववरुद्ि लगाये
गये सभी अपरािों िें उसके सभी कारक प्रथि दृष्टया
उपलब्ि है तथा आक्षेवपत आदेश (आरोप पत्र का संज्ञान
व आवेदक को सम्िन) अवर न्यायालय द्वारा न्यातयक
वववेक का उपयोग करते हुए ववधिनुत्तार पाररत ककये गये
हैं, अतः वतािान प्रकरण िें अन्ततनाहहत शजक्तयों का
उपयोग नह ं ककया िा सकता है। ( परा- ९)
आवेदन ननरमत ककया जाता िै। (E-6)
उद्धृत र्ार्िों की सूची :

## Text

574 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
XV, he would not be competent to revert to
the pre-cognizance stage under Section
156(3) Cr.P.C.

(39.15). If the Magistrate did not
order for police investigation under Section
156(3) Cr.P.C. and took cognizance of the
case, that would not be bar to the exercise
of the power of the Magistrate for directing
the police investigation under Section
202(1) Cr.P.C.

40. Point nos. 1, 2 and 3 as framed in
para 11 of this judgment stands answered
as per para no.39 above.

41. In ''Jitendra Kumar' (Supra) and
''Shiv Mangal Singh' (Supra), relied upon
by the learned counsel for the applicant
also it was held that the Magistrate shall
pass order with due application of judicious
mind.

42. Now coming to the point no.4, as
regards the order under challenge the
learned Magistrate while passing the
impugned order has considered and placed
reliance on the cases of 'Suresh Chand
Jain Vs. State of M.P.', reported in AIR
2001 SC 571 and 'Sukhwasi Vs. State of
U.P.', 2007(6) ALJ 424. The learned
magistrate has recorded that all the facts
and circumstances of the case are in the
knowledge of the applicant. The applicant
is well acquainted with the accused persons
and all the evidence that can be led is in
control of the applicant. Neither any fact is
required to be investigated by police nor
any recovery is needed, and in this regard
the applicant/complainant is competent to
adduce evidence, so there is no need of
investigation of the case by the police.

43. Learned counsel for the applicant
could not demonstrate any legal infirmity
in the order under challenge. The order is
speaking one and has been passed on
judicious application of mind to the facts of
the case and the law applicable thereto.

44. I do not find any illegality in the
order passed by the learned magistrate. The
same is in conformity with lsaw.

45. However, it is clarified that if on
the course of proceedings of the complaint
case the learned Magistrate finds it a fit
case for investigation by the police or such
other person as he thinks fit under Section
202(1) Cr.P.C. for the limited purpose of
satisfying himself for proceeding further
against the accused persons for their
summoning, the dismissal of this petition or
the order under challenge herein, would not
come in the way of exercise of such power
under Section 202(1) Cr.P.C. by the learned
Magistrate.

46. This petition lacks merit and is
hereby dismissed, with the aforesaid
observations.

47. No orders as to costs.
----------
(2021)02ILR A574
ORIGINAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: ALLAHABAD 29.01.2021

BEFORE

THE HON'BLE SAURABH SHYAM
SHAMSHERY, J.

Application U/S 482 Cr.P.C. No. 15395 of 2020

Vatan Gaur ...Applicant
Versus
State of U.P. & Anr. ...Opposite Parties

Counsel for the Applicant:
Ms. Somya Chaturvedi, Sri Gopal Swaroop
Chaturvedi (Senior Adv.)
2 All. Vatan Gaur Vs. State of U.P. & Anr.
575
Counsel for the Opposite Parties:
G.A., Mrs. Anjali Upadhya
(अ) फौजदारी कानून - भारतीय दंड संहिता १८६०
- धारा १८८- लोक सेवक द्वारा सम्यक॒ रूप से
प्रख्यापपत आदेश की अवज्ञा, धारा २८८ - ककसी
ननर्ााण को गिराने या उसकी र्रम्र्त करने के
संबंध र्ें उपेक्षा पूणा आचरण , धारा ४२० - छल
करना और संपपि पररदि करने के ललए बेईर्ानी से
उतप्रेररत करना , सावाजननक संपपि नुकसान
ननवारण अगधननयर् 1984 - धारा 3 - लोक
संपपि को नुकसान काया करने वाली ररष्टि के
अपराध िोने पर सजा का प्रावधान , आपरागधक
कानून संशोधन अगधननयर् 1932 - धारा 7 -
ककसी व्यष्तत को रोजिार या व्यवसाय के पूवााग्रि
के ललए छेड़छाड़ करना - उच्चतर् न्यायालय की
शष्ततयां का दायरा व्यापक िै परंतु इनका उपयोि
संयर् एवं सावधानीपूवाक िी ककया जाना चाहिए -
इसके उपयोि से ककसी भी वैधाननक अलभयोजन की
आकष्मर्क र्ृत्यु निीं की जा सकती िै। (परा -
६.०३)
आवेदक प्रश्नगत भूमि का भूस्वािी है - जिसिें
सहअपराधियों के संग व सहितत उक्त भूमि पर
बहुिंजिला भवन का तनिााण ककया व करवाया - जिसके
आवश्यक वैिातनक अनुितत प्राप्त नह ं की गयी - इस
न्यायालय के यथा जस्थतत के आदेश के होते हुए भी भवन
तनिााण करके अविानना का भी िािला बनता प्रतीत
होता है। (परा - ८.०१)
ननणाय : उच्च न्यायालय को उसकी अन्ततनहहत
शजक्तयों का उपयोग संयि व साविानी पूवाक ह करना
चाहहये। अगर प्राथमिकी व वववेचना के दौरान एकत्र
ककये गये साक्ष्य अपराि के कृत्य को प्रथि दृष्तया प्रकट
करते है तो ऐसी पररजस्थततयों िें ककसी भी वैिातनक
अमभयोिन को आकजस्िक िृत्यु प्रदान नह ं की िानी
चाहहए। वतािान प्रकरण िें आवेदक के ववरुद्ि लगाये
गये सभी अपरािों िें उसके सभी कारक प्रथि दृष्टया
उपलब्ि है तथा आक्षेवपत आदेश (आरोप पत्र का संज्ञान
व आवेदक को सम्िन) अवर न्यायालय द्वारा न्यातयक
वववेक का उपयोग करते हुए ववधिनुत्तार पाररत ककये गये
हैं, अतः वतािान प्रकरण िें अन्ततनाहहत शजक्तयों का
उपयोग नह ं ककया िा सकता है। ( परा- ९)
आवेदन ननरमत ककया जाता िै। (E-6)
उद्धृत र्ार्िों की सूची :
(Delivered by Hon'ble Saurabh Shyam
Shamshery, J.)

अलभयोजन कथानक:-

1.01 ग्रेटर नोएडा (संक्षेप िें
औ0वव0प्रा0ग्रे0नो0) औद्योधगक ववकास
प्राधिकरण, की ओर से मशकायतकताा
डी0पी0 श्रीवास्तव, सहायक, प्रबन्िक, वका
सककाल 4 औ0वव0प्रा0ग्रे0नो0 ने एक प्रथि
सूचना ररपोटा, िै0 एजक्टव इजक्वपिेन्ट
प्रा0मल0 द्वारा सोतनत्य कुिार व अन्य के
ववरुद्ि भारतीय दंड संहहता 1860 की िारा
188, 288 व 420 व सावाितनक संपवत्त
नुकसान तनवारण अधितनयि 1984 की
िारा 3 व आपराधिक कानून (संशोिन)
अधितनयि 1932 की िारा 7 के अंतगात
इस आशय से दिा कराई कक "ग्रेटर नोएडा
औद्योधगक
ववकास
प्राधिकरण
के
अधिसूधचत क्षेत्र के अंतगात ग्राि शाहबेर
के खसरा संख्या 158अ, 207 कृवि
576 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
उपयोगी भूमि पर बबना िानधचत्र स्वीकृतत
कराये अथवा ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की
अनुितत प्राप्त ककए बबना, असुरक्षक्षत व
भवन ववतनयिावल िें हदए गए प्रावविानों
के ववरुद्ि बहुिंजिले भवनों/फ्लैट्स का
तनिााण कर मलया गया है/ककया िा रहा है,
िो असुरक्षक्षत है, जिसिें कभी भी दुर्ाटना
हो सकती है, जिससे िान-िाल की भार
क्षतत होने की संभावना है। उक्त तनमिात
फ्लैट्स को आबाद िें तनिातत फ्लैट्स बता
कर भोल -भाल िनता को िोखािडी कर
ववक्रय ककया गया है/ववक्रय ककया िा रहा
है। उक्त काया संगहित रुप से अपने अन्य
साधथयों के साथ आधथाक लाभ हेतु कृवित
भूमि को क्षतत पहुुँचाते हुए बडे पैिाने पर
तनिााण कराया िा रहा है, जिसे नगर के
लोगों िें भय एवं आतंक व्याप्त है तथा
जिस कारण लोक व्यवस्था प्रभाववत हो रह
है तथा सुतनयोजित ववकास प्रभाववत हो
रहा है। अवैि तनिााणकतााओं का वववरण
तनम्न प्रकार है। क्र0सं0 ग्राि का नाि
खसरा सं0 अवैि तनिााणकताा का नाि व
पता 1. शाह बेर 158अ, 207 िे0 एजक्टव
इजक्वपिेन्ट
प्रा0मल0
द्वारा
सोतनत्य
कुिार,
पता-88
ियपुररया
एन्कलेव,
कौशाम्बी, गाजियाबाद, अतः भोल -भाल
िनता को िोखािडी कर आधथाक नुकसान
से बचाये िाने एवं असुरक्षक्षत अनाधिकृत
तनिााण के कारण भार िान-िाल के
नुकसान को रोके िाने हेतु उपरोक्त
तनिााण
कतााओं
के
ववरुद्ि
एफ0आई0आर0 दिा करते हुए आवश्यक
कायावाह करने का कष्ट करें।"

1.02 वववेचना के उपरान्त, िांच
अधिकार द्वारा अमभयुक्त द पक कुिार
उफा द पक त्यागी, हदव्यांका होम्स प्रा0मल0
के ववरुद्ि भा0दं0सं0 की िारा 288 व 420
के अंतगात आरोप पत्र 30.05.2019 को
सक्षि न्यायालय को प्रेवित कर हदया गया।

1.03 पत्रावल के अवलोकन से
यह ववहदत होता है कक इसी प्रकरण िें
प्रभार
पुमलस
अधिकाररयों
द्वारा
वववेचनात्िक कायावाह की सिीक्षा ककया
िाने पर पुनः गहनता से वववेचना कराये
िाने की आवश्यकता प्रतीत हुई, अतः
वररष्ि पुमलस अिीक्षक, गौति बुद्ि नगर
ने अपने आदेश हदनांक 09.12.2019 के
द्वारा प्रकरण िें िारा 173(8) दं0प्र0सं0
के अन्तगात अग्रेतर वववेचना ककसी कुशल
वववेचक को आवंहटत करने के आदेश,
थाना प्रभार ववसरख, गौति बुद्ि नगर
को प्रेवित ककया गया।

1.04 इस क्रि िें वववेचक ने
अग्रेतर वववेचना के उपरान्त अनुपूरक
आरोप पत्र हदनांक 04.06.2020 को
आवेदक वतन गौड व सोतनत्य कुिार के
2 All. Vatan Gaur Vs. State of U.P. & Anr.
577
ववरुद्ि भा0दं0सं0 की िारा 420, 188, 288
व सावाितनक संपवत्त नुकसान तनवारण
अधितनयि की िारा 3 आपराधिक कानून
(संशोिन) अधितनयि 1932 के अंतगात
साक्षि न्यायालय को प्रेवित ककया गया।

1.05 सक्षि न्यायालय द्वारा
उपरोक्त वर्णात अनुपूरक आरोप पत्र पर
आदेश
हदनांक
03.07.2020
द्वारा,
अवलोकन के उपरान्त संज्ञान मलया व
अमभयुक्तगण/आवेदक के ववरुद्ि सम्िन
िार करने का आदेश भी हदया।

आक्षेपपत आदेश-

2. आवेदक वतन गौड द्वारा वतािान
आवेदन िो दंड प्रकक्रया संहहता की िारा 482
के अन्तगात इस न्यायालय िें दार्खल की
गई, उपरोक्त वर्णात अनुपूरक आरोप पत्र
हदनांक 04.06.2020 व आदेश हदनांक
03.07.2020 (संज्ञान व सम्िन आदेश)
आक्षेवपत ककये गये हैं।

आवेदक के पक्ष र्ें कथन:-

3. आवेदक के पक्ष िें श्री गोपाल स्वरुप
चतुवेद , वररष्ि अधिवक्ता व सहायक कु0
सौम्या चतुवेद अधिवक्ता ने पुर िोर बहस
की व कथन ककया-

3.01 आरोप पत्र िें वर्णात अपरािों
को आवेदक के द्वारा र्हटत होना वववेचक
द्वारा की गयी वववेचना के द्वारा स्थावपत
नह ं होता है। आवेदक के ववरुद्ि लगाये गये
सभी आरोप अस्पष्ट व बेबुतनयाद है।
वववेचना अनौपचाररक ढंग से कर गई है व
सक्षि न्यायालय ने न्यातयक वववेक का
उपयोग ककये बबना आरोप पत्र का संज्ञान
मलया है व यांबत्रक रुप से आवेदक के ववरुद्ि
सम्िन का आदेश पाररत ककया है।

3.02 वररष्ि अधिवक्ता ने यह भी
कथन ककया है कक आवेदक के ववरुद्ि िारा
420 भा0दं0सं0 के अन्तगात कोई अपराि
नह ं बनता है। प्रकरण िें ऐसा कोई भी साक्ष्य
पत्रावल पर नह ं है कक आवेदक ने ककसी के
साथ कोई छल ककया हो या आवेदक द्वारा
ककसी ऐसे प्रवंधचत व्यजक्त को बेइिानी से
उत्प्रेररत कर उक्त व्यजक्त द्वारा कोई संपवत्त
का या ककसी भी िूल्यवान प्रततभूतत का
पररदत्त ककया गया हो। वतािान प्रकरण िें
भा0दं0सं0 की िारा 420 के र्टक उपजस्थत
नह ं है।

3.03 वररष्ि अधिवक्ता ने आगे
यह भी कथन ककया कक वतािान प्रकरण िें
न तो कोई तनिााण धगराया गया है न ह
उसकी िरम्ित कर गई है अतः आवेदक
ने िारा 288 भा0दं0सं0 के अंतगात कोई
अपराि काररत नह ं ककया है और न ह
आवेदक ने लोक सेवक द्वारा सम्यक रुप
से प्रख्यावपत ककसी आदेश की अवज्ञा ह
578 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
की है। आवेदक के ववरुद्ि ककसी लोक
संपवत्त को नुकसान काररत करने के कृत का
कोई भी साक्ष्य नह ं है।

3.04 वररष्ि अधिवक्ता से आगे
कथन ककया कक वववेचना की सािान्य
दैतनकी वववरण िें रोिनािचा हदनांक
29.05.2019 िें वववेचक ने स्पष्ट रुप से
व्यक्त ककया है अमभयोग िें िारा 3
भा0सं0 नु0तनवा0अधि0, िारा 7 सी एल ए
एक्ट व िारा 188 भा0दं0सं0 का होना नह ं
पाया गया तथा अधग्रि वववेचना िारा 288,
420 भा0दं0सं0 िें संपाहदत की िायेगी।
कफर भी ववलोवपत िाराओ िें आरोप पत्र
प्रेवित ककया गया। इससे यह दृजष्ट गोचर
होता है कक वतािान प्रकरण िें वववेचना
सरसर तौर पर की गयी है। अतः वतािान
आवेदन स्वीकार ककया िाये।

4. मशकायतकताा का पक्ष अंिल
उपाध्याय अधिवक्ता ने रखा, उन्होंने कहा
उत्तर प्रदेश सरकार ने शाहबेर गाुँव उत्तर
प्रदेश औद्यौधगक क्षेत्र ववकास अधितनयि
के अन्तगात एक अधिसूधचत गांव र्ोवित
ककया है। अतः कोई भी भवन तनिााण
प्राधिकरण की पूवा अनुितत के बबना नह ं हो
सकता है। प्रकरण िें पञ्चायती भूमि के
सम्बन्ि िें भूमि अधिकिान अधितनयि की
िारा 4 व 6 के अन्तगात अधिसूचना िार
की िा चुकी है जिस पर इस न्यायालय
द्वारा यथा जस्थतत बनाये रखने का आदेश
पाररत ककया है। अतः आवेदक द्वारा उक्त
भूमि पर भवन तनिााण कराने का कृत
न्यायालय की अपभावना का िािला भी है।
प्राधिकरण ने आवेदक को भवन तनिााण
करने
के
मलये
कोई
सहितत/अनुितत/स्वीकृत नह ं द है। अतः
आवेदन तनरस्त ककया िायें। अपने पक्ष से
सिथान िें मलर्खत बहस भी दार्खल की है
िो पूवा िें उल्लेर्खत कथन की पुनरावृवत्त है।

5. वैभव आनन्द, अततररक्त शासकीय
अधिवक्ता ने कहा कक इस न्यायालय की
अंततनाहहत
शजक्तयों
का
उपयोग
असािारण पररजस्थततयों िें ह ककया िाना
चाहहए। वतािान प्रकरण िें आवेदक
प्रश्नगत भूमि का स्वािी है उसके तनदेश
पर ह उक्त भूमि पर भवन तनिााण ककया
गया है िो अवैिातनक है। प्रकरण िें वर्णात
िाराओं के अन्तगात अपराि र्हटत हुआ है
तथा ऐसी पररजस्थततयां नह ं है िहाुँ
दं0प्र0सं0 के अन्तगात ककसी आदेश को
प्रभावी कराना हो या ककसी न्यायालय की
कायावाह का दुरुपयोग तनवाररत करना हो
या न्याय के उदेश्यों की प्राजप्त सुतनजश्चत
करने की आवश्यकता हो अतः वतािान
आवेदन तनरस्त ककया िाना चाहहये।
2 All. Vatan Gaur Vs. State of U.P. & Anr.
579

पवश्लेषण:-

6. उच्च न्यायालय की अंतननाहित
शष्ततयां

6.01
भारतीय
दंड
प्रकक्रया
संहहता, की िारा 482, उच्च न्यायालय की
अन्ततनाहहत शजक्तयों की व्यावृवत्त के
प्राविान के सम्बंि िें है िो तनम्न है ;-

"इस संहहता की कोई बात उच्च
न्यायालय की ऐसे आदेश देने की
अन्ततनाहहत शजक्त को सीमित या प्रभाववत
करने वाल न सिझी िाएगी िैसे इस
संहहता के अिीन ककसी आदेश को प्रभावी
करने के मलए या ककसी न्यायालय की
कायावाह का दुरुपयोग तनवाररत करने के
मलए या ककसी अन्य प्रकार से न्याय के
उद्देश्यों की प्राजप्त सुतनजश्चत करने के
मलए आवश्यक हो।"

6.02.
उच्च
न्यायालय
की
अंततनाहहत शजक्तयों को इस संहहता के
ककसी प्राविान से सीमित नह ं ककया िा
सकता है। यह वो अंततनाहहत शजक्तयां हैं,
िो इस संहहता के तहत ककसी भी आदेश
को प्रभावी करने के मलए, या ककसी
न्यायालय की प्रकक्रया का दुरुपयोग रोकने
के मलए या अन्यथा सुरक्षक्षत करने के मलए
या न्याय की प्राजप्त के मलए आवश्यक हों।
यह शजक्तयां इस संहहता के तहत उच्च
न्यायालय को नह ं प्राप्त होती हैं, बजल्क
यह
शजक्तयां
उच्च
न्यायालय
िें
अन्ततनाहहत हैं, जिसे िात्र संहहता के एक
प्राविान द्वारा र्ोवित ककया गया है।

6.03. उच्चति न्यायालय ने कई
ववधिक दृष्टांत िें यह प्रततपाहदत ककया है ,
कक इन शजक्तयाुँ का दायरा व्यापक है,
परंतु
इनका
उपयोग
संयि
एवि्
साविानीपूवाक ह ककया िाना चाहहए।
इसके उपयोग से ककसी भी वैिातनक
अमभयोिन की आकजस्िक िृत्यु नह ं की
िा सकती है।

6.04. इस िारा के तहत तनहहत
शजक्तयों का उपयोग करते हुए ये िाुँचने के
मलये की कोई प्राथमिकी ककसी प्रथिदृष्ट्या
संज्ञेय अपराि को प्रकट करती है या नह ं ,
उच्च न्यायालय ना तो ककसी िाुँच संस्था
और ना ह अपील य न्यायालय की तरह
काया कर सकता है। इन शजक्तयों के
अन्तगात ककसी साक्ष्य की प्रिार्णता की
िाुँच नह ं की िा सकती है, क्योंकक, इसका
क्षेत्राधिकार उस न्यायालय का है, जिसके
द्वारा पर क्षण ककया िा रहा है या ककया
िायेगा ।अन्वेिण के दौरान या आरोप पत्र
दायर होने पर उच्च न्यायालय इस पहलू
को भी नह ं देख सकता है कक आरोपी की
ओर से िािले िें अपेक्षक्षत िानमसक तत्त्व
या आशय िौिूद था या उसका क्या बचाव
580 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
है और न ह िारा १६१ के तहत अमभलेर्खत
बयानों का आुँकलन कर आरजम्भक स्तर
पर ह ककसी पर क्षण को ववफल कर सकता
है।

6.05. उच्चति न्यायालय ने
बहुिा कहा है कक वो पररजस्थततयॉ जिनके
होने पर इन अन्ततनाहहत शजक्तयों का
उपयोग ककया िा सकता है, उसकी कोई
संपूणा सूची तो नह ं बनायी िा सकती,
परन्तु
कुछ
क्षेर्णयॉं
उदाहरणाथा
तनम्नमलर्खत है:-

क) िहां प्राथमिकी या मशकायत
िें लगाए गए आरोप को अगर उनके प्रत्यक्ष
रुप िें िाना िाये और संपूणाता िें स्वीकार
ककया िाये, तब भी, अमभयुक्त के ववरुद्ि
प्रथि दृष्टया कोई अपराि नह ं बनता है;

ख) िहां प्राथमिकी और संलग्न
सािधग्रयो (यहद कोई हो,), एक संज्ञेय
अपराि को उद्दााहटत नह ं करते हैं, तथा
संहहता की िारा 156 (1) के तहत पुमलस
अधिकाररयों द्वारा अन्वेिण करने का कोई
औधचत्य साबबत न होता हो;

ग) िहां प्राथमिकी या 'मशकायत
िें लगाए गए अवववाहदत आरोप और उसके
सिथान िें एकत्र ककए गए साक्ष्य ककसी भी
अपराि के कृत्य का होना प्रकट नह ं होता हैं
और आरोपी के ववरूद्ि कोई भी प्रकरण नह ं
बनता हैं;

र्) िहां प्राथमिकी िें आरोप
संज्ञेय अपराि तनमिात नह ं करते हैं व केवल
गैर-संज्ञेय अपराि तनमिात करते हैं, पुमलस
अधिकार द्वारा िजिस्रेट के आदेश के
बबना ककसी भी िांच की अनुितत नह ं है
िैसा कक संहहता की िारा 155 (2) के तहत
पररकजल्पत है;

ड) िहां प्राथमिकी या मशकायत
िें लगाए गए आरोप इतने असंगत और
स्वाभाववक रूप से असंभव हैं जिनके
आिार पर कोई भी वववेकशील व्यजक्त
कभी भी न्यायसंगत तनष्किा पर नह ं पहुंच
सकता है कक अमभयुक्त के र्खलाफ
कायावाह के मलए पयााप्त आिार िौिूद है;

च)
िहां
ककसी
संहहता
या
संबंधित
अधितनयि
(जिसके
तहत
आपराधिक कायावाह शुरू की गई है) के
ककसी भी प्राविान के तहत कानूनी प्रकक्रया
की शुरुआत या िार रहने पर कानूनी
तनिेि लगाया गया हो, और/या िहां
संहहता
या
संबंधित
अधितनयि
के
प्राविान,पीडडत पक्ष की मशकायत के मलए
प्रभावी प्रततकार प्रदान करते हो ।

छ) िहां आपराधिक कायावाह
स्पष्टतः दुभाावनापूणा हो और/या िहां
कायावाह ववद्वेिपूणा रूप से आरोपी से
अधिक प्रततशोि लेने के मलए , परोक्ष
उद्देश्य से की िाती है और जिसका लक्ष्य,
2 All. Vatan Gaur Vs. State of U.P. & Anr.
581
तनिी और व्यजक्तगत मशकायत के कारण
उसे अपिातनत करना हो। आपराधिक
मशकायत को तब भी सिाप्त ककया िा
सकता है िब िािला अतनवाया रूप से
द वानी प्रकृतत का हो और उसे एक
अपराधिक अपराि का रूप हदया गया हो
यहद कधथत अपराि के तत्व, मशकायत िें
प्रथि दृष्टया भी उपलब्ि न हो।क्योंकक इस
तरह की कायावाह िार रखने पर
न्यायालय की प्रकक्रया का दुरुपयोग होगा।

7. प्रकरण िें उल्लेर्खत अपराि के
वववरण तनम्न है

"420.-छल करना और संपपि
पररदि करने के ललए बेईर्ानी से उत्प्रेररत
करना- िो कोई छल करेगा, या तद्द्वारा उस
व्यजक्त को, जिसे प्रवंधचत ककया गया है,
बेईिानी से उत्प्रेररत करेगा कक वह कोई
संपवत्त ककसी व्यजक्त को पररदत्त कर दे, या
ककसी भी िूल्यवान प्रततभूतत को या ककसी
चीि को, िो हस्ताक्षररत या िुद्ांककत है,
और िो िूल्यवान प्रततभूतत िें संपररवततात
ककये िाने योग्य है पूणातः या अंशत: रच दे,
पररवततात कर दे, या नष्ट कर दे, वह दोनो िें
से ककसी भाुँतत के कारावास से, जिसकी
अवधि सात विा तक की हो सकेगी, दंडडत
ककया िाएगा और वह िुिााने से भी दंडनीय
होगा।

188. लोकसेवक द्वारा सम्यक्
रुप से प्रख्यापपत आदेश की अवज्ञा- िो
कोई यह िानते हुए कक वह ऐसे लोक-सेवक
द्वारा प्रख्यावपत ककसी आदेश से, िो ऐसे
आदेश को प्रख्यावपत करने के मलए
ववधिपूवाक सशक्त है, वह कोई काया करने
से ववरत रहने के मलए या अपने कब्िे िें
की, या अपने प्रबंिािीन, ककसी संपवत्त के
बारे िें कोई ववशेि व्यवस्था करने के मलए
तनहदाष्ट ककया गया है, ऐसे तनदेश की
अवज्ञा करेगा ।

यहद ऐसी अवज्ञा ववधिपूवाक
तनयोजित ककन्ह व्यजक्तयों को बािा,
क्षोभ, या क्षतत, अथवा बािा क्षोभ या क्षतत
की िोर्खि, काररत करे, या काररत करने
की प्रवृवत्त रखती हो, तो वह सादा कारावास
से, जिसकी अवधि एक िास तक की हो
सकेगी, या िुिाने से, िो दो सौ रुपये तक
का हो सकेगा, या दोनो से ,दंडडत ककया
िाएगा।

और यहद ऐसी अवज्ञा िानव
िीवन, स्वास््य, या क्षेि को संकट काररत
करे, या काररत करने की प्रवृवत्त रखती हो,
या बल्वा या दंगा काररत करती हो, या
काररत करने की प्रवृवत्त रखती हो, तो वह
दोनो िें से ककसी भाुँतत के कारावास से,
जिसकी अवधि छ: िास तक की हो सकेगी,
या िुिाने से, िो एक हिार रूपये तक का
582 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया िाएगा
।

मपटिीकरण- यह आवश्यक नह ं
है कक अपरािी का आशय अपहातन उत्पन्न
करने का हो या उसके ध्यान िें यह हो कक
उसकी अवज्ञा करने से अपहातन होना
संभाव्य है। यह पयााप्त है कक जिस आदेश
की वह अवज्ञा करता है उस आदेश का उसे
ज्ञान है, और यह भी ज्ञान है कक उसके
अवज्ञा करने से अपहातन उत्पन्न होती या
होनी संभाव्य है।

288. ककसी ननर्ााण को गिराने या
उसकी र्रम्र्त करने के सम्बध र्ें
उपेक्षापूणा आचरण- िो कोई ककसी तनिााण
को धगराने या उसकी िरम्ित करने िें उस
तनिााण की ऐसी व्यवस्था करने का, िो उस
तनिााण के या उसके ककसी भाग के धगरने से
िानव िीवन को ककसी अधिसम्भाव्य संकट
से बचाने के मलये पयााप्त हो िानते हुये या
उपेक्षापूवाक लोप करेगा, वह दोनों िें से
ककसी भाुँतत के कारावास से, जिसकी अवधि
छह िास तक की हो सकेगी, या िुिााने से
िो एक हिार रुपये तक का हो सकेगा, या
दोनों से दजडडत ककया िायेगा।

3. लोक संपपि को नुकसान काररत
करने वाली ररष्टि-(1) िो कोई उपिारा (2)
िें तनहदाष्ट प्रकार की लोक संपवत्त से मभन्न
ककसी लोक संपवत्त की बाबत कोई काया
करके ररजष्ट करेगा, वह कारावास से,
जिसकी अवधि पांच विा तक की हो सकेगी,
और िुिााने से, दजडडत ककया िाएगा।

(2) िो कोई ऐसी ककसी संपवत्त की
बाबत िो-

(क) कोई ऐसा भवन, प्रततष्िान या
अन्य संपवत्त है, जिसका उपयोग िल,
प्रकाश, शजक्त या ऊिाा के उत्पादन, ववतरण
या प्रदान के संबंि िें ककया िाता है;

(ख) कोई तेल प्रततष्िान है;

(ग) कोई िल संकिा है;

(र्) कोई खान या कारखाना है;

(ङ) लोक पररवहन या दूर-संचार
का कोई सािन है या उसके संबंि िें उपयोग
ककया िाने वाला कोई भवन, प्रततष्िान या
अन्य संपवत्त है,

कोई काया करके ररजष्ट करेगा,
वह किोर कारावास से, जिसकी अवधि
छह िास से कि की नह ं होगी ककन्तु
पांच विा तक की हो सकेगी, और िुिााने
से, दजडडत ककया िाएगा:

परन्तु न्यायालय, ऐसे कारणों
से िो उसके तनणाय िें लेखबद्ि ककए
िाएंगे, छह िास से कि की ककसी
अवधि के कारावास का दडडादेश दे
सकेगा।"
2 All. Vatan Gaur Vs. State of U.P. & Anr.
583

8. प्रकरण िें सवाप्रथि यह ववचार
करना है कक त्यों व पररजस्थततयों िें
आरोप पत्र िें वर्णात अपराि क्या प्रथि
दृष्टया प्रकट होते या नह ं?

8.01 पत्रावल पर उपजस्थत
दस्तावेि व प्रततद्वंद बहस से यह ववहदत
है कक आवेदक प्रश्नगत भूमि का भूस्वािी
है। जिसिें सहअपराधियों के संग व
सहितत से उक्त भूमि पर बहुिंजिला भवन
का तनिााण ककया व करवाया है, जिसके
मलए आवश्यक वैिातनक अनुितत प्राप्त
नह ं की गयी है तथा इस न्यायालय के यथा
जस्थतत के आदेश के होते हुए भी भवन
तनिााण करके अविानना का भी िािला
बनता प्रतीत होता है। आवेदक के वररष्ि
अधिवक्ता पत्रावल पर भवन तनिााण के
मलये आवश्यक अनुितत/सहितत/स्वीकृतत
हदखाने िें असफल रहे हैं।

8.02 िारा 288 भा0दं0सं0 के
अंतवस्तु का ध्यानपूवाक अवलोकन से यह
ववहदत है कक यह िारा ककसी तनिााण को
धगराने या उसकी िरम्ित करने के सम्बंि
िें ककसी अधिसम्भाव्य संकट से बचाने की
व्यवस्था िें उपेक्षापूणा आचरण को अपराि
बनाता है। वतािान प्रकरण िें प्रश्नगत
भवन की तनिााण सम्बन्िी कोई वैिातनक
सहितत या स्वीकृतत न होने के कारण उस
तनिााण के गुणवत्ता की पुजष्ट नह ं की िा
सकती है। यह भी ववहदत है आवेदक ने
सहअपरािी के साथ सिझौता कर भवन
का तनिााण कराया है। अतः यह कहा िा
सकता है कक तनिााण के ककसी भाग के
धगरने की अधिसम्भाव्य संकट से बचाने
की व्यवस्था की उपेक्षा की है। अब प्रश्न
यह है कक क्या ककसी 'तनिााण' की
'िरम्ित' करने िें 'नवीन तनिााण' भी
सजम्िमलत है की नह ं। िरम्ित करवाने
का तात्पया केवल िरम्ित करवाना नह ं हो
सकता इसके अंतगात सभी प्रकार के नवीन
तनिााण भी आवश्यक रुप से शामिल होते
है, अतः आवेदक भूमि का स्वािी है और
उसकी सहितत से ह सह अपराधियों द्वारा
भवन का तनिााण कराया गया है तथा
अधिसम्भाव्य संकट से बचाने के मलये कोई
भी वैिातनक व आवश्यक स्वीकृतत प्राप्त
नह ं कर । अतः िारा 288 भा0दं0सं0 के
अन्तगात उसके ववरुद्ि भी प्रथि दृष्टया
अपराि बनता है। वतािान प्रकरण िें प्रथि
दृष्टया िारा 288 भा0दं0सं0 के अन्तगात
अपराि काररत ककया िाना प्रदमशात होता
है।

8.03 पत्रावल पर उपजस्थत
दस्तावेि यह दशााते है कक भूमि पर तनमिात
भवन िें बने फ्लेट्स को ग्राहकों को बेचा
गया है। उनके साथ पंिीकृत करारनािें का
584 INDIAN LAW REPORTS ALLAHABAD SERIES
भी उल्लेख है। अतः यह ववहदत है कक
आवेदक ने यह िानते हुए भी कक भवन का
तनिााण गैरकानूनी है, छल करके ग्राहकों
को बेइिानी से फ्लेट्स की पंिीकरण,
िूल्य लेकर मलया। इस अपराि के मलये
मशकायतकताा का स्वयं पीडडत होना
आवश्यक नह ं है। आवेदक का आशय
प्रारम्भ से ह छल करने का था। अतः
वतािान प्रकरण िें िारा 420 भा0दं0सं0 के
अन्तगात
भी
प्रथि
दृष्टया
अपराि
दृजष्टगत होता है।

8.04 िारा 415 भा0दं0सं0 ''छल'
को पररभावित करती है, जिसके अनुसार
यहद कोई ककसी व्यजक्त को कपट पूवाक या
बेइिानी से उत्प्रेररत कर प्रवंधचत करता है
जिसके कारण ऐसा काया या लोप उस
व्यजक्त को शार ररक, िानमसक, ख्यातत
संबंिी या सांपवत्तक नुकसान या अपहातन
काररत होनी संभाव्य भी हो तो वह व्यजक्त
छल करता है। वतािान प्रकरण िें आवेदक
ने
सह
आपररधियों
के
संग
ऐसा
भवन/फ्लैट्स
का
तनिााण
ककया
या
करवाया है, जिसकी न तो कोई स्वीकृतत न
सहितत और न ह कोई अनुितत है अतः
तनिााण पूणा रुप से अवैि है, और ऐसी
िानकार होने के बाविूद आवेदक ने कपट
पूवाक और बेईिानी करके भोले भाले
ग्राहकों से छल करके उन्हे ये अवैि फ्लैट्स
िूल्य के बदले बेचे। अतः वतािान प्रकरण
िें िारा 415 भा0दं0सं0 के सभी र्टक
प्रथि दृष्टया उपजस्थत है।

8.05 िारा 188 भा0दं0सं0 के
अनुसार लोक सेवक द्वारा सम्यक रुप से
प्रख्यावपत आदेश की अवज्ञा अपराि है।
आवेदक ने ऐसे भवन का तनिााण ककया है।
जिसके मलए कोई भी सहितत या अनुितत
नह ं द गई है तथा ऐसा करने से िानव
िीवन को संकट हो सकता है। िो,
लोकसेवक
द्वारा
सिय-सिय
पर
प्रख्यावपत आदेशों का अवेज्ञा है, अतः
आवेदक के ववरुद्ि िारा 188 भा0दं0सं0
के अन्तगात भी प्रथि दृष्टया अपराि दृजष्ट
गोचर होता है।

8.06 सावाितनक संपवत्त नुकसान
तनवारण अधितनयि 1984 की िारा 3 के
अंतगात लोक संपवत्त को नुकसान काररत
करने वाल ररजष्ट के अपराि होने पर सिा
का प्राविान वर्णात ककया गया है। वतािान
प्रकरण िें प्रश्नगत भूमि मशकायतकताा
ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के कब्िे/तनयन्त्रण
िें है व उस पर यथा जस्थतत बनाये रखे
रहने का आदेश लंबबत है, कफर भी आवेदक
ने इस पर सह अपरािी के संग बबना ककसी
अनुितत से तनिााण ककया अतः उपरोक्त
िारा के अन्तगात भी प्रथिदृष्टया अपराि
दृजष्टगत होता है।
2 All. Avinash Kumar & Ors. Vs. State of U.P. & Anr.
585

9. िैसा पूवा िें उल्लेर्खत ककया गया है
कक उच्च न्यायालय को उसकी अन्ततनाहहत
शजक्तयों का उपयोग संयि व साविानी पूवाक
ह करना चाहहये। अगर प्राथमिकी व वववेचना
के दौरान एकत्र ककये गये साक्ष्य अपराि के
कृत्य को प्रथि दृष्टतया प्रकट करते है तो ऐसी
पररजस्थततयों
िें
ककसी
भी
वैिातनक
अमभयोिन को आकजस्िक िृत्यु प्रदान नह ं
की िानी चाहहए। पूवा िें ववश्वेलिण ककया
गया है कक वतािान प्रकरण िें आवेदक के
ववरुद्ि लगाये गये सभी अपरािों िें उसके
सभी कारक प्रथि दृष्टया उपलब्ि है तथा
आक्षेवपत आदेश (आरोप पत्र का संज्ञान व
आवेदक को सम्िन) अवर न्यायालय द्वारा
न्यातयक वववेक का उपयोग करते हुए
ववधिनुसार पाररत ककये गये हैं, अतः वतािान
प्रकरण िें अन्ततनाहहत शजक्तयों का उपयोग
नह ं ककया िा सकता है।

10. अतः आवेदन तनरस्त ककया िाता है।
----------
(2021)02ILR A585
ORIGINAL JURISDICTION
CRIMINAL SIDE
DATED: ALLAHABAD 20.11.2020

BEFORE

THE HON'BLE SHAMIM AHMED, J.

Application U/S 482 Cr.P.C. No. 16458 of 2020

Avinash Kumar & Ors. ...Applicants
Versus
State of U.P. & Anr. ...Opposite Parties
Counsel for the Applicants:
Sri Sanjay Kumar Pal, Sri Jai Prakash Singh

Counsel for the Opposite Parties:
A.G.A.

(A) Criminal Law - Indian Penal Code,
1860 - Section 504 - , Section 506 -
Intentional insult with intent to provoce
breach
of
peace
,
Section
395
-
Punishment for dacoity, Code of criminal
procedure, 1973 - Section 173 - Report of
police
officer
on
completion
of
investigation - Court can take cognizance
of
an
offence
only
when
condition
requisite for initiation of proceedings
before it as set out in Chapter XIV of the
Code are fulfilled - Otherwise, the Court
does not obtain jurisdiction to try the
offences under section 190 (1) of the
Cr.P.C.(Para -14)

First information report lodged against the
applicants - charge-sheet submitted by the
Investigating Officer under sections 504, 506
IPC - Magistrate had taken cognizance on the
charge-sheet - cognizance was taken on the
prined proforma by filling the sections of IPC,
dates and number - in the said proforma the
learned Magistrate without assigning any reason
has mentioned the sections 504, 506 and 395
IPC - summoned the applicants for facing trial.
(Para - 4,7)

HELD:- In view of the above, the conduct of
the judicial officers concerned in passing orders
on printed proforma by filling up the blanks
without
application
of
judicial
mind
is
objectionable and deserves to be deprecated.
The summoning of an accused in a criminal case
is a serious matter and the order must reflect
that Magistrate had applied his mind to the facts
as well as law applicable thereto, whereas the
impugned summoning order was passed in
mechanical manner without application of
judicial mind. (Para - 25)

Application u/s 482 Cr.P.C. allowed. (E-6)

List of Cases cited:-

1. Dilawar Vs St.of Har. , (2018) 16 SCC 521